सूर्य के रहस्यों को उजागर करने की एक रोमांचक यात्रा, कोडईकनाल टॉवर टनल टेलीस्कोप

-ज्योति रावत
सूर्य, हमारा निकटतम तारा, अपनी रहस्यमयी प्रकृति से वैज्ञानिकों को हमेशा आकर्षित करता रहा है। कोडईकनाल टॉवर टनल टेलीस्कोप, जो भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA) द्वारा संचालित है, ने सूर्य के चुंबकीय क्षेत्रों की गहन जांच के लिए एक नया द्वार खोला है। इस टेलीस्कोप के डेटा ने सौर मंडल की विभिन्न परतों में चुंबकीय क्षेत्रों के अध्ययन को संभव बनाया है, जो सूर्य की गतिशीलता और उसकी रहस्यमयी प्रक्रियाओं को समझने में महत्वपूर्ण साबित हो रहा है।
सूर्य का चुंबकीय नृत्य: एक जटिल पहेली
सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र एक ऐसी शक्ति है जो इस तारे की आंतरिक और बाहरी परतों को जोड़ती है। यह ऊर्जा और पदार्थ को सूर्य की गहराइयों से इसके बाहरी वायुमंडल, यानी कोरोना, तक ले जाता है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक “कोरोनल हीटिंग समस्या” के रूप में जानते हैं, जो सूर्य के बाहरी वायुमंडल के असामान्य रूप से गर्म होने का कारण समझने की कोशिश करती है। इसके अलावा, यह चुंबकीय क्षेत्र सौर पवन का भी प्रमुख कारक है, जो अंतरिक्ष मौसम को प्रभावित करता है और पृथ्वी पर तकनीकी प्रणालियों को भी।
इन जटिल प्रक्रियाओं को समझने के लिए सूर्य की विभिन्न परतों में चुंबकीय क्षेत्रों को मापना आवश्यक है। कोडईकनाल टॉवर टनल टेलीस्कोप इस चुनौती को स्वीकार करता है। यह बहुरेखीय स्पेक्ट्रोपोलरिमेट्री नामक एक उन्नत तकनीक का उपयोग करता है, जो सूर्य की विभिन्न परतों में चुंबकीय क्षेत्रों को मापने में सक्षम है। यह तकनीक सूर्य के चारों ओर बनने वाली स्पेक्ट्रल लाइनों की तीव्रता और ध्रुवीकरण को मापकर चुंबकीय क्षेत्र की ताकत का अनुमान लगाती है। हाल के अध्ययनों ने इस तकनीक की मदद से सूर्य की सतह पर होने वाली घटनाओं जैसे सौर लपटों, सूर्यबिंदुओं, और क्रोमोस्फेरिक भिन्नताओं की जटिल संरचनाओं को समझने में महत्वपूर्ण प्रगति की है।

कोडईकनाल सौर वेधशाला: एक ऐतिहासिक विरासत
कोडईकनाल सौर वेधशाला (KSO), जो भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान द्वारा संचालित है, 1909 में एवरशेड प्रभाव की खोज के लिए प्रसिद्ध है। यह प्रभाव सूर्य के सनस्पॉट्स में पदार्थ की गति को समझने में महत्वपूर्ण था। आज, यह वेधशाला कोडईकनाल टॉवर टनल टेलीस्कोप के माध्यम से सूर्य के चुंबकीय रहस्यों को उजागर करने में अग्रणी भूमिका निभा रही है।
हाल ही में, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के तहत कार्यरत IIA के खगोलविदों ने इस टेलीस्कोप का उपयोग करके एक जटिल सनस्पॉट का अध्ययन किया। इस अध्ययन में हाइड्रोजन-एल्फा (Hα) और कैल्शियम II-8662 Å स्पेक्ट्रल लाइनों का एक साथ अवलोकन किया गया। इस सनस्पॉट में कई गहरी छायाएँ (umbra) और एक उपछाया (penumbra) शामिल थीं, जो सूर्य की सतह पर होने वाली गतिशील प्रक्रियाओं को समझने के लिए एक आदर्श मंच प्रदान करती हैं।
टनल टेलीस्कोप: तकनीकी चमत्कार
कोडईकनाल टॉवर टनल टेलीस्कोप की डिज़ाइन अपने आप में एक इंजीनियरिंग उपलब्धि है। इसमें तीन दर्पणों की प्रणाली है:
प्राथमिक दर्पण (M1): सूर्य की गति को ट्रैक करता है।
द्वितीयक दर्पण (M2): सूर्य की रोशनी को नीचे की ओर निर्देशित करता है।
तृतीयक दर्पण (M3): प्रकाश किरणों को क्षैतिज रूप से संरेखित करता है।
इस प्रणाली को कोयलोस्टेट कहा जाता है, जो सूर्य जैसे गतिमान खगोलीय पिंड पर नजर रखने में सक्षम है। टेलीस्कोप में एक 38 सेंटीमीटर का एक्रोमेटिक डबलट लेंस है, जो 36 मीटर की दूरी पर सूर्य की छवि को 5.5 आर्कसेकंड प्रति मिलीमीटर के पैमाने पर फोकस करता है। यह उच्च-रिज़ॉल्यूशन इमेजिंग सूर्य की सतह और वायुमंडल की बारीक संरचनाओं को देखने में मदद करती है।
हाइड्रोजन–एल्फा: क्रोमोस्फेयर का एक शक्तिशाली दूत
सूर्य के क्रोमोस्फेयर (वायुमंडल की मध्य परत) में चुंबकीय क्षेत्र को मापने के लिए आमतौर पर कैल्शियम II 8542 Å और हीलियम I 10830 Å लाइनों का उपयोग किया जाता है। हालांकि, इन लाइनों की कुछ सीमाएँ हैं, जो उनकी उपयोगिता को सीमित करती हैं। इस अध्ययन में, हाइड्रोजन-एल्फा (Hα) लाइन (6562.8 Å) ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
IIA में पीएचडी छात्र और इस अध्ययन के प्रमुख लेखक हर्ष माथुर बताते हैं, “Hα लाइन क्रोमोस्फेरिक चुंबकीय क्षेत्रों को मापने में एक शक्तिशाली उपकरण है। यह स्थानीय तापमान के उतार-चढ़ाव के प्रति कम संवेदनशील होती है, जिससे सौर लपटों जैसे गतिशील घटनाओं में चुंबकीय क्षेत्रों की जांच करना आसान हो जाता है।” यह विशेषता Hα को क्रोमोस्फेयर की जटिल संरचनाओं को समझने के लिए एक आदर्श विकल्प बनाती है।
अध्ययन के निष्कर्ष: सूर्य की परतों में गहराई से झांकना
द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में प्रकाशन के लिए स्वीकृत इस अध्ययन ने Hα और कैल्शियम II-8662 Å लाइनों के एक साथ अवलोकनों के माध्यम से सूर्य के लाइन-ऑफ-साइट (LOS) चुंबकीय क्षेत्र का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। परिणामों से पता चला कि Hα लाइन कैल्शियम II लाइन की तुलना में कमजोर चुंबकीय क्षेत्रों का अनुमान लगाती है, जो यह संकेत देता है कि Hα सूर्य की उच्च वायुमंडलीय परतों को मापती है।
अध्ययन में फोटोस्फेयर (सूर्य की सतह) में चुंबकीय क्षेत्र की ताकत 2000 गॉस और क्रोमोस्फेयर में 500 गॉस पाई गई। यह भी देखा गया कि Hα लाइन स्थानीय तापमान वृद्धि वाले क्षेत्रों में क्रोमोस्फेरिक चुंबकीय क्षेत्रों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है। यह अध्ययन Hα लाइन को क्रोमोस्फेरिक डायग्नोस्टिक टूल के रूप में स्थापित करता है, खासकर जब अन्य स्पेक्ट्रल लाइनें सूर्य की गहरी परतों तक सीमित रहती हैं।
भविष्य की राह: उन्नत टेलीस्कोप और गहन शोध
इस अध्ययन के प्रधान अन्वेषक डॉ. के. नागराजू कहते हैं, “क्रोमोस्फेयर की जटिल चुंबकीय संरचनाओं को समझने के लिए बहुरेखीय दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण है।” सह-लेखक डॉ. जयंत जोशी जोड़ते हैं, “उच्च स्थानिक और वर्णक्रमीय रिज़ॉल्यूशन वाले उन्नत टेलीस्कोप, जैसे डेनियल के. इनौये सोलर टेलीस्कोप (DKIST), यूरोपीय सोलर टेलीस्कोप (EST), और प्रस्तावित नेशनल लार्ज सोलर टेलीस्कोप (NLST), क्रोमोस्फेरिक चुंबकीय क्षेत्रों की गहरी समझ प्रदान करेंगे।”
नेशनल लार्ज सोलर टेलीस्कोप (NLST) भारत के लद्दाख में मेराक गांव में प्रस्तावित एक 2-मीटर क्लास का ऑप्टिकल और nikट-अवरक्त अवलोकन सुविधा है। यह परियोजना सूर्य के चुंबकीय क्षेत्रों और उनकी गतिशीलता को और अधिक विस्तार से समझने में महत्वपूर्ण योगदान देगी।
एक वैश्विक प्रयास
इस अध्ययन में भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के शोधकर्ता हर्ष माथुर, डॉ. के. नागराजू, और डॉ. जयंत जोशी के साथ-साथ अमेरिका के लैबोरेटरी फॉर एटमोस्फेरिक एंड स्पेस फिजिक्स, बोल्डर से डॉ. राहुल यादव शामिल थे। यह सहयोग सूर्य के चुंबकीय रहस्यों को सुलझाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
कोडईकनाल टॉवर टनल टेलीस्कोप और इस तरह के अध्ययन सूर्य की जटिल प्रक्रियाओं को समझने में एक नया अध्याय शुरू कर रहे हैं। यह शोध न केवल सौर विज्ञान को आगे बढ़ा रहा है, बल्कि अंतरिक्ष मौसम और इसके पृथ्वी पर प्रभावों को समझने में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। भविष्य में, और अधिक उन्नत टेलीस्कोप और तकनीकों के साथ, हम सूर्य के इन रहस्यों को और गहराई से उजागर कर पाएंगे।
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अधिक जानकारी के लिए कृपया हर्ष माथुर से harsh.mathur@iiap.res.in. संपर्क करें।
इसका प्रकाशन पूर्व लेख पढ़ने के लिये उपलब्ध है : https://arxiv.org/pdf/2406.02083.
इस लेख की डीओआई है: https://doi.org/10.3847/1538-4357/ad54ba
