विज्ञान प्रोद्योगिकी

भारतीय मूल की इंजीनियर ने बदली पवन ऊर्जा की गणित

 

स्वाति शिंदे गोले

पेंसिल्वेनिया के यूनिवर्सिटी पार्क में एक शांत दोपहर को, एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की छात्रा दिव्या त्यागी (22) उन समीकरणों में डूबी हुई थीं, जिन्होंने पीढ़ियों से एयरोडायनमिक्स के वैज्ञानिकों को उलझा रखा था। यह पहेली पहली बार सौ साल से अधिक पहले ब्रिटिश शोधकर्ता हर्मन ग्लॉवर्ट ने प्रस्तुत की थी। इसका मूल प्रश्न यह था कि हवा से टर्बाइन किस तरह ऊर्जा निकालते हैं। दिव्या त्यागी ने इस पुरानी चुनौती को एक नए दृष्टिकोण से हल किया।

उनका शोध विंड एनर्जी साइंस में प्रकाशित हुआ है। यह नया सूत्र सेट इंजीनियरों को सुरक्षित और अधिक कुशल टर्बाइन बनाने में मदद कर सकता है। “ग्लॉवर्ट का काम शानदार था, लेकिन कुछ पहलू ऐसे थे जिन्हें उन्होंने नहीं छुआ। मैं देखना चाहती थी कि क्या इस समस्या को एक अलग रास्ते से हल किया जा सकता है,” दिव्या कहती हैं।

शुरुआती जिज्ञासा

दिव्या त्यागी का जन्म कैलिफोर्निया के लागुना हिल्स में भारतीय प्रवासी माता-पिता के घर हुआ। वे चीजें कैसे काम करती हैं, इस बारे में लगातार सवाल पूछती रहती थीं। एक STEM-केंद्रित हाई स्कूल ने उनकी क्षमता को बढ़ाया, लेकिन विमानन उनके लिए जुनून बन गया।
वे एयरपोर्ट की खिड़कियों पर घंटों तक विमानों को उड़ते और उतरते देखती रहीं—इसीने उन्हें एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की ओर खींचा।

पेन स्टेट यूनिवर्सिटी पहुँचकर उन्होंने श्रेयर ऑनर्स कॉलेज में प्रवेश लिया और जूनियर वर्ष में प्रोफेसर स्वेन श्मिट्ज़ के शोध समूह से जुड़ गईं। श्मिट्ज़ लंबे समय से यह सोच रहे थे कि क्या ग्लॉवर्ट के सौ साल पुराने ऑप्टिमाइजेशन मॉडल को आगे बढ़ाया जा सकता है। तीन छात्रों ने कोशिश की और हार मान ली। दिव्या नहीं मानीं।

ग्लॉवर्ट की समस्या पावर कोएफिशिएंट को परिभाषित करती थी—यानी टर्बाइन हवा की ऊर्जा को बिजली में कितनी कुशलता से बदलती है। लेकिन पुराना मॉडल केवल पावर पर आधारित था और ब्लेड पर लगने वाले संरचनात्मक भार (थ्रस्ट और बेंडिंग मोमेंट) को नजरअंदाज करता था। आज की टर्बाइन्स को इन भारी संरचनात्मक बलों के बीच खुद को संतुलित करते हुए हवा के झोंकों का सामना करना पड़ता है—विशेषकर अपतटीय (ऑफशोर) पवन संयंत्रों में, जहाँ बड़े ब्लेड और तेज हवा होती है।

दिव्या कहती हैं, “इन भारों को नजरअंदाज कर देना सिद्धांततः ठीक लगता है, लेकिन असल दुनिया में यही तय करता है कि टर्बाइन तेज हवाओं में टिकेगी या टूट जाएगी।” समस्या को नए ढंग से देखने की जरूरत थी—और दिव्या ने वही किया।

नई राह बनाते हुए

कैलकुलस ऑफ वैरिएशंस का उपयोग करते हुए दिव्या ने ग्लॉवर्ट के ऑप्टिमम को फिर से व्याख्यायित किया और दो पूर्व अज्ञात विश्लेषणात्मक (ऐनालिटिकल) समाधानों को प्रस्तुत किया।
इन नए सूत्रों में थ्रस्ट कोएफिशिएंट और रूट बेंडिंग मोमेंट को अधिकतम शक्ति पर सटीक रूप से व्यक्त किया गया है। शोधकर्ता वर्षों से इन गणनाओं के लिए केवल अनुमान लगाते आए थे, लेकिन दिव्या ने इन्हें सटीक रूप में हल कर दिया।

“व्यवहार में टर्बाइन को अपनी संरचना पर अतिरिक्त भार नहीं डालने दिया जाता। इष्टतम प्रदर्शन पर भार जानना इंजीनियरों को बेहतर मशीनें बनाने में मदद करता है,” वे कहती हैं।

श्मिट्ज़ उनके दृष्टिकोण को “सरल और सुंदर” बताते हैं और मानते हैं कि इसे व्यापक रूप से पढ़ाया जाएगा। इन परिणामों का महत्व काफी बड़ा है। पावर कोएफिशिएंट में केवल 1% वृद्धि से पड़ोस के कई टर्बाइन संयंत्र अधिक बिजली पैदा कर सकते हैं—और दिव्या का यह नया सूत्र इस लाभ को संरचनात्मक तनाव से सीधा जोड़कर दिखाता है।

आगे की दिशा

यह अध्ययन अभी पूरा नहीं हुआ है। दिव्या अब शोध के दूसरे हिस्से पर काम कर रही हैं, जिसमें संरचनात्मक सीमाओं—जैसे थ्रस्ट या बेंडिंग मोमेंट—को पार किए बिना अधिकतम शक्ति कैसे निकाली जाए, इसका अध्ययन है।
अब सवाल यह नहीं कि अधिकतम पावर कैसे मिले, बल्कि यह कि सुरक्षा सीमाएं पार किए बिना अधिकतम पावर कैसे हासिल की जाए।

2024 में स्नातक करने के बाद दिव्या पेन स्टेट में ही यूएस नेवी फंडेड PIPELINE प्रोग्राम के तहत मास्टर करने लगीं। उनका वर्तमान शोध कंप्यूटेशनल फ्लूइड डायनेमिक्स पर आधारित है, जिसमें वे यह अध्ययन कर रही हैं कि हेलीकॉप्टर का ‘वेक’ जहाजों के डेक पर हवा के प्रवाह को कैसे प्रभावित करता है — खासकर पायलटों की सुरक्षित लैंडिंग के लिए।

“यह एक कठिन सीखने की प्रक्रिया थी… इतना सारा गणित! लेकिन जब आप किसी नए क्षेत्र की बुनियाद बनते देखते हैं, तो संतोष मिलता है,” वे मुस्कुराकर कहती हैं।

स्नातक होने के बाद दिव्या विमानन या अंतरिक्ष अनुसंधान में करियर बनाना चाहती हैं, लेकिन उनका पवन ऊर्जा का शोध भी दुनिया भर के इंजीनियरों की मदद कर सकता है।

वे कहती हैं,
“ग्लॉवर्ट का काम सौ साल चला। अगर मेरा योगदान भी कुछ सार्थक साबित हो जाए, तो शायद यह भी लंबे समय तक चले।”

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