एपस्टीन विवाद : अंतर लोकतांत्रिक देशों में

-अरुण श्रीवास्तव देहरादून
दावा दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने का पर मानक की कसौटियों के तमाम बिंदुओं पर हम फिसड्डी साबित हो रहे हैं। अब ताज़े मामले में एपस्टीन फाइल को ही ले लीजिए। तथ्य उजागर हुए दुनिया के सबसे पुराने लोकतांत्रिक देश अमेरिका में तो उसकी लपटें आईं दुनिया के सबसे पुराने लोकतांत्रिक देश भारत तक पर हम हर स्तर पर ख़ामोशी की चादर ओढ़े हुए हैं। सोचिए अगर यह मामला विश्वगुरु बनने के मुहाने पर खड़े भारत में उजागर होता तो क्या हम अमेरिका की ही तरह लोकतांत्रिक होते?
एपस्टीन मामले में भारत को लेकर अब तक की जो सबसे बड़ी बात सामने आई है वो ये कि अब तक 2013 से पहले किसी भारतीय के साथ एपस्टीन से दूर-दूर तक नाते का खुलासा नहीं हुआ है। लेकिन इस बात की पक्की जानकारी है कि 2003 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन जब भारत आए तब अपने साथ यात्रा में एक सेक्स ट्रैफिकर उनके साथ थी। लेकिन ताज्जुब है कि विश्वगुरु बनने के मुहाने पर खड़े भारत की मीडिया को या तो इसकी भनक नहीं लगी या खबर इतनी गंभीर नहीं लगी जबकि दावा पल-पल की खबरें होने का करता है। हालांकि क्लिंटन का ये दौरा आधिकारिक नहीं था।
अब तक कि जानकारी के अनुसार एपस्टीन ने 2014 में केंद्र में सरकार बदलने के बाद भारतियों से मित्रता गढ़नी शुरू कर दी। हालांकि बहुत कम लोग जानते होंगे उसके खिलाफ मामला 2005 में ही खुल गया था जब एक नाबालिग ने एपस्टीम पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। यानि एक घोषित यौन अपराधी लगातार विश्व की राजनीति में सक्रिय था और कथित विश्वगुरु बेख़बर था।
एक दूसरी बात जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है वो ये कि इस मामले में सबसे मजबूत गवाह वर्जीनिया गिऊफ्रे थी जिसने एपस्टीन पर आरोप लगाया था कि उसने मुझे 16 साल की उम्र में दुनिया भर के कई नामचीन पुरुषों के साथ संबंध बनाने को मजबूर किया गया। इसमें शामिल पुरुषों के ब्रिटेन के प्रिंस एंड्रयू समेत कई खरबपति नेता और शिक्षाविद् शामिल हैं। वर्जीनिया ने 41 की उम्र में इसी साल सुसाइड कर लिया था।
एपस्टीन की गिरफ्तारी को सालों बीत चुके हैं। कथित तौर पर उसने जेल में ही 2009 में 11 महीने की सजा के बाद सुसाइड कर लिया था। लेकिन अब भी एक गवाह बची हुई है। वह है ब्रिटिश सोशलाइट घिसलेन मैक्सवेल। जिस पर एपस्टीन द्वारा यौन शोषण के लिए नाबालिग लड़कियों की भर्ती करने का आरोप लगाया। यह वह सेक्स ट्रैफिकर थी जिसे लेकर क्लिंटन भारत आए थे और गुजरात समेत तमाम जगहों पर ले गए थे।
मैक्सवेल को 2001 के अंत में दोषी ठहराया गया था और वह 20 साल की जेल की सजा काट रही हैं। मैक्सवेल जब भारत में आई उस वक्त यूपीए की सरकार नहीं थी।
लोकतंत्र क्या होता है पश्चिमी देशों से सीखे : अमेरिका में सेक्स फ्री है, वहां इसे किसी महिला के मान-सम्मान और गंगा जैसी पवित्रता से नहीं जोड़ा जाता।
2006 में एक अनाम महिला अमेरिका के फेडरल कोर्ट जाती है जिसमें वह आरोप लगाती है कि 2004-2005 में जब वह नाबालिग (14) थी, तब एपस्टीन ने उसे मसाज देने के लिए भर्ती किया और अपने घर बुलाया। वहां उसका यौन शोषण किया था। इसके एवज में अब उसे 50 मिलियन डॉलर का मुआवजा दिया जाए।
वैसे कुछ इसी तरह काज्ञमामला आसाराम बापू, राम रहीम और
उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मंत्री स्वामी चिन्मयानंद का भी रहा। वे भी इसी तरह की शौक के शिकार थे। तो तत्कालीन विधायक कुलदीप सेंगर सत्ता की हनक के चलते लंबे समय तक दाग रहित थे। सत्तारूढ़ दल का धार्मिक झुकाव ने तो चिन्मयानंद को बेदाग कर दिया।
बहरहाल जब जांच आगे बढ़ी तो ऐसे ही 50 से अधिक मामले आए जिसमें एपस्टीन धोखे से या जबरन नाबालिग लड़कियों को अपने रिसोर्ट में बुलाता और अपने ग्राहकों को पेश करता था। इसकी जांच हुई और एपस्टीन 2019 में जेल गया जहां संदिग्ध अवस्था में उसकी मौत हो गई….। अपने भारत में भी आसाराम बापू और राम-रहीम एड़ी-चोटी का जोर लगाने के बाद ही जेल गए थे। राम-रहीम तो बार-बार पैरोल और फर्लो पर छोड़ दिया जाता है वो भी चुनाव नजदीक आने के समय।
एक नज़र दोनों देशों के लोकतंत्रात्मक अंतर पर : अमेरिका में दो सांसदों ने एक बिल पेश किया जिसमें कहा गया कि एपस्टीन से संबंधित सारे दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं…
इसके बावजूद कि वे जानते थे कि इसमें अमेरिका और दुनिया के ढेरों बड़े नाम वाले लोग, जैसे डोनल्ड ट्रंप, बिल क्लिंटन, बिल गेट्स जैसे लोग फंस सकते हैं। हाऊस आफ रिप्रेजेंटेटिव ने 01 के मुकाबले 470 वोटों से और सीनेट ने निर्विरोध इसे पास कर दिया। यहां तक कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के सभी सांसदों ने भी इसका समर्थन किया। क्या अपने देश में कभी संभव था। विश्व के सबसे पुराने लोकतांत्रिक देश अमेरिका में तो एपस्टीन फाइल का सच तो सामने आ गया पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में क्या सच है क्या झूठ इसका पता कभी चल पाएगा। हत्या व बलात्कार के बाद हत्या के तमाम मामलों का सच नं कभी बाहर आ पाया है और शायद ही आ पाये।
गौर करने वाली बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप खुद फंसे होने के बावजूद इस बिल पर हस्ताक्षर करने के सिवा कुछ नहीं कर सके। अपने उस देश जो विश्वगुरु बनने के मुहाने पर खड़ा है उसमें यह संभव है क्या ?
चर्चा है कि एपस्टीम फाइल की 95 लाख से अधिक फोटो सार्वजनिक होगी और तिथि भी लिखी थी कुछ हुई भी। अपने यहां कभी हो पाएगी क्या? रेवंत रेड्डी का पूर्ण सत्य सामने आ पाएगा क्या? जज लोया की हत्या के हत्यारों को जनता ज़ान पाएगी क्या? उत्तराखंड में सत्तारूढ़ दल से जुड़े उस वीआईपी का नाम तो जनता ज़ान ही नहीं पाई जिसकी खिदमत के लिए न जाने पर अर्पिता भंडारी को अपनी जान गंवानी पड़ी।
भारत में एपस्टीन जैसे बड़े पैमाने पर सेक्स ट्रैफिकिंग या उच्च-स्तरीय सेक्स स्कैंडल कई हुए हैं, हालांकि कोई बिल्कुल समान नहीं। सबसे करीबी उदाहरण 1992 का अजमेर ब्लैकमेल कांड है। इसमें स्कूल-कॉलेज की लड़कियों को ब्लैकमेल कर यौन शोषण किया गया। प्रमुख भारतीय सेक्स स्कैंडल अजमेर कांड में प्रभावशाली लोगों ने लड़कियों को फंसाया, वीडियो बनाकर ब्लैकमेल किया। इसे भारत का सबसे बड़ा सेक्स स्कैंडल माना जाता है। कई आरोपी राजनेता और व्यवसायी थे। 1994 में महाराष्ट्र के जलगांव में स्कूल-कॉलेज लड़कियों के रेप का मामला सामने आया। ताज़ा मामला प्रज्वल रेवन्ना का है। 28 सौ से अधिक वीडियो में महिलाओं के यौन शोषण का आरोप है। इस मामले में नाममात्र की हलचल हुई। सत्तारूढ़ दल तो ख़ामोश रहा ही विज्ञापन के रास्ते सरकारों से उपकृत होने वाले मीडिया ने भी ख़ामोशी की चादर ओढ़े रहा। यही मीडिया “तंदूर” कांड में सिर के बल खड़ा हो गया था। निर्भया कांड में भी भूचाल ला दिया था। उसके बाद कठुआ कांड, कुलदीप सेंगर बलात्कार मामले में सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहा तो हाथरस बलात्कार मामले में तो मीडिया नंगा सा हो गया। मीडिया में “ज़ान” निर्भया कांड में भी दिखाई दी इन दिनों तो सांप सूंघ जाता है। उस समय के सबसे बड़े या नंबर दो के मीडिया घराने ने तो निर्भया की मां को अपनी स्क्रीन पर इस तरह से पेश किया जैसे किसी देश की प्रमुख हों।
अन्य देशों और विश्व गुरु बनने के मुहाने पर खड़े भारत फ़र्क सिर्फ़ यह है कि अमेरिका सहित अन्य लोकतांत्रिक देशों में इसे “लोकतंत्र की विफलता” माना जाता है और
भारत में “विवाद, काल्पनिक, टुकड़े टुकड़े गैंग की साजिश” कहकर आगे बढ़ जाया जाता है जैसे कि बढ़ गया है। अमेरिका, ब्रिटेन व नार्वे सहित कई अन्य देशों में इस्तीफे हुए पर विश्व गुरु बनने के मुहाने पर खड़े भारत में उन लोगों के कानों में जूं तक नहीं रेंगी, रेंगी थी तो राफेल डील पर भी नहीं। रेंगती भी तो कैसे …। अपने पहले कार्यकाल में ही सरकार में नंबर दो पर रहे राजनाथ सिंह ने तो साफ़ साफ़ कह दिया था कि भाजपा में इस्तीफे नहीं होते। ( लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी हैं)
