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उत्तराखंड में UPNL संविदा कर्मचारियों की हड़ताल: राज्याधीन सेवाओं पर 6 महीने की पाबंदी लगी

देहरादून, 19 नवंबर : उत्तराखंड सरकार ने राज्याधीन सेवाओं में आगामी छह महीनों के लिए किसी भी प्रकार की हड़ताल पर सख्त पाबंदी लगा दी है। यह कदम हाल ही में उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम लिमिटेड (UPNL) के करीब 22,000 संविदा कर्मचारियों की राज्यव्यापी हड़ताल के बीच आया है, जो अपनी सेवाओं के नियमितीकरण और समान वेतन की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं। विशेषज्ञों और कर्मचारी संगठनों का मानना है कि यह प्रतिबंध विशेष रूप से UPNL कर्मियों के आंदोलन को दबाने के उद्देश्य से लगाया गया है, क्योंकि हड़ताल से स्वास्थ्य, परिवहन, ऊर्जा और अन्य आवश्यक सेवाओं में व्यापक व्यवधान हो रहा है।

अधिसूचना का विवरण

कार्मिक विभाग के सचिव श्री शैलेश बगोली ने मंगलवार (19 नवंबर) को एक अधिसूचना जारी की, जिसमें उत्तर प्रदेश अत्यावश्यक सेवाओं का अनुरक्षण अधिनियम, 1966 (जो उत्तराखंड में यथावत लागू है) की धारा 3(1) के तहत तत्काल प्रभाव से 6 महीने (19 नवंबर 2025 से 18 मई 2026 तक) के लिए राज्याधीन सेवाओं में हड़ताल निषिद्ध करने का आदेश दिया गया है। अधिसूचना में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह कदम लोकहित में उठाया जा रहा है, ताकि प्रशासनिक कार्यों में बाधा न पहुंचे।

  • प्रभावित क्षेत्र: यह प्रतिबंध सभी सरकारी विभागों, निगमों और राज्याधीन संस्थानों पर लागू होगा, जिसमें UPNL जैसे आउटसोर्स्ड कर्मचारी भी शामिल हैं।
  • उल्लंघना पर कार्रवाई: हड़ताल करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है, जिसमें जुर्माना, सेवा समाप्ति या आपराधिक मुकदमा हो सकता है।
  • पृष्ठभूमि: इसी तरह का प्रतिबंध जून 2023 में भी लगाया गया था, जब चारधाम यात्रा और मानसून के दौरान संभावित आपदाओं को देखते हुए सरकार ने सतर्कता बरती थी। लेकिन वर्तमान आदेश का समय UPNL हड़ताल से सीधा जुड़ा लगता है।

अधिसूचना जारी होने के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। X (पूर्व ट्विटर) पर कई यूजर्स ने इसे “कर्मचारी-विरोधी” बताते हुए सरकार की आलोचना की, जबकि कुछ ने आवश्यक सेवाओं की निरंतरता का समर्थन किया।

UPNL संविदा कर्मचारियों की हड़ताल: मांगें और प्रभाव

UPNL के संविदा कर्मचारी, जो मुख्य रूप से पूर्व सैनिकों के कल्याण के नाम पर विभिन्न सरकारी विभागों (जैसे अस्पतालों, स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों) में आउटसोर्स्ड के रूप में कार्यरत हैं, पिछले कई वर्षों से अपनी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। नवंबर 2025 में शुरू हुई यह हड़ताल 11 नवंबर से अनिश्चितकालीन हो गई, जब सुप्रीम कोर्ट के अक्टूबर 2024 के आदेश के बावजूद सरकार ने उनके नियमितीकरण पर अमल नहीं किया।

  • मुख्य मांगें:
    • सेवाओं का नियमितीकरण: कई कर्मचारी 2005 से सेवा दे रहे हैं, लेकिन स्थायी नौकरी, पेंशन और अन्य लाभ नहीं मिल रहे। सुप्रीम कोर्ट ने “समान कार्य के लिए समान वेतन” का निर्देश दिया था, लेकिन सरकार ने इसे लागू नहीं किया।
    • वेतन वृद्धि और बकाया भुगतान: कई मामलों में 5-6 महीने का वेतन बकाया है। हाल ही में सुशीला तिवारी अस्पताल (हल्द्वानी) में 600 UPNL कर्मचारियों ने वेतन न मिलने पर हड़ताल की थी।
    • नौकरी की सुरक्षा: अक्सर सेवा समाप्ति का डर, खासकर नए भर्ती प्रक्रियाओं के दौरान।
  • हड़ताल का प्रभाव:
    • स्वास्थ्य सेवाएं: देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज और हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल में लंबी कतारें, टेस्ट रिपोर्ट में देरी, और राजस्व में कमी। मरीजों को निजी लैबों की ओर रुख करना पड़ रहा है।
    • अन्य विभाग: परिवहन, ऊर्जा और शिक्षा में व्यवधान। 13 नवंबर को देहरादून के परेड ग्राउंड पर 2,000 से अधिक कर्मचारियों ने धरना दिया, जहां पुलिस कार्रवाई में कई घायल हुए।
    • राज्यव्यापी: पूरे उत्तराखंड में 22,000 कर्मचारी प्रभावित, जिससे दैनिक सेवाओं पर असर पड़ा।

कर्मचारी यूनियन के महासचिव प्रमोद सिंह गुसाईं ने कहा, “हम कोर्ट के आदेश का पालन कराने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। सरकार की वादाखिलाफी से मजबूरन हड़ताल करनी पड़ी।” वहीं, राज्य समन्वयक विनोद गोडियाल ने बताया कि कैबिनेट की ओर से गठित उप-समिति के फैसले को खारिज कर दिया गया है, क्योंकि यह लिखित आश्वासन नहीं दे रही।

प्रतिक्रियाएं और आगे की संभावनाएं

  • कर्मचारी संगठनों की प्रतिक्रिया: UPNL यूनियन ने पाबंदी को “असंवैधानिक” बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती देने की योजना बनाई है। वे कहते हैं कि यह उनके मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19) का उल्लंघन है।
  • सरकार का पक्ष: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार का कहना है कि यह कदम “प्रशासनिक स्थिरता” के लिए जरूरी है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि UPNL मुद्दे पर उप-समिति जल्द रिपोर्ट देगी, लेकिन हड़ताल के दौरान वार्ता संभव नहीं।
  • राजनीतिक रंग: विपक्ष (कांग्रेस) ने इसे “श्रमिक-दमनकारी” नीति बताया है। X पर #UPNLStrike और #UttarakhandBanOnStrike जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।

यह प्रतिबंध UPNL हड़ताल को तुरंत प्रभावित कर सकता है, लेकिन कर्मचारी संगठन इसे “अस्थायी रुकावट” मान रहे हैं। यदि मांगें पूरी न हुईं, तो अदालती लड़ाई तेज हो सकती है। सरकार और कर्मचारियों के बीच जल्द वार्ता की उम्मीद है, ताकि आवश्यक सेवाएं बहाल रहें।

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