बीडी सिंह मुक्ति चाहते हैं बदरी-केदार समिति के प्रबंधन से: व्यवस्थाएं फिर चरमराने का खतरा

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देहरादून, 31 मई (उहि)। बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिरों की व्यवस्थाओं के विशेषज्ञ माने जाने वाले मुख्य कार्यकारी अधिकारी बी.डी. सिंह अब अपने मूल विभाग में लौटना चाहते हैं। सिंह भारतीय वन सेवा (आइएफएस) के 2012 बैच के अधिकारी हैं और उसी साल से मंदिर समिति का प्रबंधन संभाल रहे हैं। अगर बी.डी. सिंह को रिलीव कर उनके मूल विभाग में लौटा दिया जाता है तो चार धाम यात्रियों की इस अप्रत्याशित भीड़ के चलते हिन्दुओं के सर्वोच्च धाम की व्यवस्था गड़बड़ा सकती है। मंदिर समिति बदरीनाथ और केदारनाथ समेत उत्तराखण्ड के 51 अन्य विख्यात मंदिरों का प्रबंधन भी करती है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार बीडी सिंह ने स्वास्थ्य कारणों से मंदिर समिति के मुख्य कार्यकारी के दायित्व से मुक्ति चाही है, ताकि वह अपने मूल विभाग में अपने कार्यकाल की सेवाएं दे सकें। वन विभाग में उनका वर्तमान पद प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) का है, और कुछ समय बाद उन्हें वन संरक्षक बनना है। पूछे जाने पर बी.डी. सिंह ने अपनी इच्छा की पुष्टि करते हुये बताया कि वह अपने विभाग में वापसी के लिये काफी पहले लिखित में भी आवेदन कर चुके हैं और एक बार उनकी पोस्टिंग भी तय हो चुकी थी, लेकिन उनकी पोस्टिंग का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया गया।
बीडी सिंह बदरीनाथ-केदारनाथ तीर्थ यात्रा के लिये कितने जरूरी हैं, इसका अन्दाजा इस बात से लग जाता है कि 15 जनवरी 2020 को त्रिवेन्द्र सिंह रावत के मुख्यमंत्रित्व में जब पण्डे-पुजारियों के भारी विरोध के बावजूद बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री सहित राज्य के 53 मंदिरों के प्रबंधन के लिये चारधाम देवस्थानम बोर्ड बना तो बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति अधिनियम 1939 स्वतः ही समाप्त हो गया और उसके साथ ही समिति की जगह बोर्ड ने कार्यभार ग्रहण कर दिया। बोर्ड का मुख्य कार्यकारी अधिकारी गढ़वाल का कमिश्नर होता था। लेकिन कमिश्नर को मंदिरों के प्रबंधन और यात्रा संचालन का अनुभव नहीं था। जबकि बीडी सिंह वापस अपने मूल विभाग लौट गये थे। समस्या का समाधान करने के लिये चार धाम बोर्ड द्वारा प्रस्ताव पारित कर बीडी सिंह को अतिरिक्त मुख्य कार्याधिकारी के पद पर वापस लाना पड़ा।
उत्तराखण्ड की विश्व विख्यात चारधाम यात्रा के इस महत्वपूर्ण संस्थान में डेपुटेशन पर बीडी सिंह की नियुक्ति 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूड़ी ने यह सोच कर की थी कि बीडी सिंह उसी माणा गांव के मूल निवासी हैं, जिसके क्षेत्र में बदरीनाथ मंदिर स्थित है। बदरीनाथ माणा निवासियों का ईस्टदेव भी है। सदियों से बिना माणा गांव के बदरीनाथ मंदिर के कपाट खुलने और बंद होने की धार्मिक औपचारिकताएं पूरी नहीं होती। मंदिर के कपाट खुलते समय भी माणावासियों की पम्परागत मौजूदगी रहती है। जब कपाट बंद होते हैं तो माणा गांव की कुंवारी कन्याओं द्वारा बुने गये ऊनी कम्बल (घृत कंबल) को घी में भिगो कर बदरीनाथ की पद्मासन वाली शालिगराम की प्रतिमा पर लपेटी जाती है। जिस दिन कपाट खुलते हैं तो प्रतिमा को कंबल से अनावृत कर कंबल के टुकड़ों या रेशों को प्रसाद के तौर पर बांटा जाता है।
भुवन चन्द्र खण्डूड़ी सरकार ने बीडी सिंह की नियुक्ति केवल एक साल के लिये की थी। उसी दौरान राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ तो विजय बहुगुणा के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बन गयी। विजय बहुगुणा सरकार ने बीडी सिंह के अनुभव और बदरीनाथ का ही निवासी होने के नाते उनका कार्यकाल पूरे पांच साल तक के लिये बढ़ा दिया। बीडी सिंह कहते हैं कि बदरीनाथ उनके पूर्वजों के जमाने से उनका ईस्टदेव रहा। इसलिये उनका इन मंदिरों के साथ भावनात्मक लगाव भी है। इसीलिये वह इस पद पर प्रतिनियुक्ति भत्ते के साथ ही टीए डीए तक नहीं लेते। लेकिन निरन्तर हाइ एल्टिट्यूट में सेवा देने के कारण अब स्वास्थ्य कारणों से वह देहरादून में अपने मूल विभाग में तैनाती चाहते हैं।
बीडी सिंह सोशियल मीडिया में अपने ऊपर लगे अनियमितता के आरोपों से भी आहत हैं। उनका कहना है कि मंदिर समिति द्वारा सभी प्रस्ताव पारित करने और समिति के अध्यक्षों के अनुमोदन के उपरान्त ही उन्होंने सभी कार्य सम्पादित करवाये हैं। वर्ष 2013 की आपदा से पूर्व बदरीनाथ-केदारनाथ मन्दिर समिति की बोर्ड बैठक में प्रस्ताव पारित किया गया था कि यात्रा के प्रचार-प्रसार हेतु प्रचार सामग्री तैयार की जाय। इसके लिये एसेंड कम्पनी को बोर्ड द्वारा चयनित किया गया। जनपद पौड़ी के बिन्सर महादेव मन्दिर पर समिति का पैसा खर्च होने के आरोप पर उनका कहना है कि यह फैसला भी बोर्ड का था।
मन्दिर समिति के एई को ईई के रूप में पदोन्नति पर उन्होंने बताया कि आपदा के बाद मन्दिर समिति के बहुत से भवन आदि क्षतिग्रस्त हो गये थे,जिनका पुनर्निर्माण कार्य किया जाना यात्रा संचालन के लिए अति आवश्यक था। इस हेतु मन्दिर समिति के तत्कालीन अध्यक्ष द्वारा शासन से अधिशासी अभियन्ता का पद स्वीकृत कराकर इस पद पर अनिल ध्यानी को नामित किया गया।
बोर्ड बैठक में पारित प्रस्ताव के अनुसार सदस्यगणों द्वारा चयनित मंदिरों के जीणोद्धार के लिये तत्कालीन मंदिर समिति के अध्यक्ष स्व.मोहन प्रसाद थपलियाल की स्वीकृति के उपरान्त ही सदस्यों को आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी गयी। इसी प्रकार फिल्म कैसेट और घड़ियों की खरीद समिति के अध्यक्ष के निर्देशानुसार क्रय समिति के माध्यम से क्रय की गयी। उन्होंने बताया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा दिये गये निर्देश के अनुपालन में चौलाय की खेती को प्रोत्साहित करने एवं लोकल लोगों को रोजगार देने के उद्देश्य से धाम में चौलाई के लड्डू के विक्रय का कार्यक्रम चलाया गया।

 

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