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अन्न के कटोरे (तराई) में धान की खेती पर लगी पाबंदी

रुद्रपुर/काशीपुर: उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जिले को राज्य का ‘अनाज का कटोरा’ (Food Bowl) कहा जाता है, लेकिन आज यही क्षेत्र एक गंभीर पर्यावरणीय और आर्थिक दोराहे पर खड़ा है। प्रशासन ने गिरते भूजल स्तर को बचाने के लिए आगामी 1 फरवरी से 30 अप्रैल के बीच ग्रीष्मकालीन धान (Summer Paddy) की खेती पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया है।

​यह कदम जितना पर्यावरण के लिए अनिवार्य बताया जा रहा है, उतना ही यह छोटे और सीमांत किसानों की खाद्य सुरक्षा के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।

1. वैज्ञानिक कारण: क्यों जरूरी है प्रतिबंध?

​वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो गर्मी के महीनों में धान उगाना भूजल के लिए ‘आत्मघाती’ कदम माना जाता है।

  • अत्यधिक जल उपभोग: गर्मियों में वाष्पीकरण की उच्च दर के कारण, धान की फसल को मानसून के मुकाबले दो से तीन गुना अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है। आंकड़ों के अनुसार, 1 किलो ग्रीष्मकालीन धान उगाने के लिए लगभग 4,000 से 5,000 लीटर पानी की खपत होती है।
  • खतरनाक गिरावट: पिछले 10 वर्षों में इस क्षेत्र के भूजल स्तर में 70 फीट की गिरावट आई है। जिले के जसपुर और काशीपुर जैसे प्रमुख कृषि क्षेत्र अब “अति-दोहन” (Over-exploited) की श्रेणी में हैं। यदि इसे नहीं रोका गया, तो भविष्य में पीने के पानी का संकट भी पैदा हो जाएगा।

2. आर्थिक प्रभाव: ‘अन्नदाता’ पर बोझ

​इस प्रतिबंध का सीधा असर ऊधम सिंह नगर के लगभग 15,000 किसानों पर पड़ेगा।

  • वित्तीय नुकसान: अनुमान है कि लगभग 22,000 हेक्टेयर भूमि पर धान की खेती रुकने से क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को 150 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है।
  • छोटे किसानों की खाद्य सुरक्षा: छोटे और सीमांत किसान अपनी साल भर की जरूरतों और ऋणों को चुकाने के लिए ग्रीष्मकालीन फसल पर निर्भर रहते हैं। धान न केवल उनके लिए नकदी का स्रोत है, बल्कि पशुओं के लिए चारे (पुआल) का मुख्य आधार भी है। प्रतिबंध से उनके सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है।

3. ‘जल संरक्षण बनाम किसान कल्याण’: एक संतुलित दृष्टिकोण

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल प्रतिबंध लगाना काफी नहीं है, सरकार को निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:

  • MSP की गारंटी: यदि किसान धान छोड़ते हैं, तो उन्हें मक्का, मूंग या सूरजमुखी जैसी वैकल्पिक फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सुरक्षित बाजार दिया जाना चाहिए।
  • जल संचयन तकनीक: सीधी बुवाई (Direct Seeded Rice – DSR) और ‘लेजर लैंड लेवलिंग’ जैसी तकनीकों को बढ़ावा देना चाहिए जिससे पानी की 20-30% बचत हो सके।
  • वित्तीय मुआवजा: चूंकि किसान समाज के लिए अपना भूजल बचा रहे हैं, इसलिए उन्हें प्रति एकड़ ‘प्रोत्साहन राशि’ मिलनी चाहिए ताकि उनकी खाद्य सुरक्षा प्रभावित न हो।

​पानी भी बचे और किसान की थाली भी भरी रहे

​वर्तमान में स्थिति यह है कि ऊधम सिंह नगर में भूजल का दोहन 100% से अधिक हो रहा है, जबकि पुनर्भरण (Recharge) बहुत कम है। प्रशासन का “जीरो टॉलरेंस” रुख जल सुरक्षा के लिए तो ठीक है, लेकिन छोटे किसानों के लिए यह एक कड़ा इम्तिहान है। नीति निर्माताओं को अब ऐसी योजना लानी होगी जहाँ “बूंद-बूंद पानी भी बचे और किसान की थाली भी भरी रहे।”

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