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अग्निपथ से बदला रक्षा बजट 2026-27 का गणित

 

नयी दिल्ली, 8 फरबरी। केंद्र सरकार के नवीनतम बजट में रक्षा क्षेत्र को लेकर जो संकेत दिए गए हैं, वे केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारत की सैन्य संरचना, रोजगार नीति और औद्योगिक रणनीति में गहरे बदलाव की ओर इशारा करते हैं। बजट में अग्निपथ योजना और घरेलू रक्षा उत्पादन पर विशेष जोर देकर सरकार ने रक्षा खर्च को नियंत्रित करने का स्पष्ट संदेश दिया है।
रक्षा बजट का गणित
वित्त वर्ष 2026-27 के लिए रक्षा बजट लगभग ₹6.81 लाख करोड़ रखा गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 6 प्रतिशत की नाममात्र वृद्धि दर्शाता है। लेकिन महंगाई और वेतन-संबंधी खर्चों को ध्यान में रखें तो यह वृद्धि वास्तविक अर्थों में सीमित ही मानी जाएगी। गौरतलब है कि रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा अब भी राजस्व व्यय—यानी वेतन, पेंशन और प्रशासनिक खर्च—में चला जाता है।
अग्निपथ योजना: खर्च घटाने का औज़ार
अग्निपथ योजना को सरकार केवल सैन्य सुधार के रूप में नहीं, बल्कि वित्तीय अनुशासन के साधन के रूप में भी देख रही है। चार वर्ष की सेवा अवधि और सीमित पेंशन दायित्व के कारण दीर्घकाल में वेतन और पेंशन खर्च में भारी कमी आने की संभावना है।
सरकारी अनुमानों के अनुसार, यदि पारंपरिक भर्ती मॉडल जारी रहता, तो अगले दो दशकों में रक्षा पेंशन का बोझ कई गुना बढ़ सकता था। अग्निपथ के तहत केवल 25 प्रतिशत जवानों को स्थायी सेवा मिलने से यह दबाव नियंत्रित किया जा सकेगा। हालांकि, यह सवाल अभी अनुत्तरित है कि चार वर्ष बाद बाहर होने वाले हजारों अग्निवीरों का नागरिक अर्थव्यवस्था में समायोजन कैसे होगा।
घरेलू रक्षा उद्योग पर बढ़ता भरोसा
बजट का एक और महत्वपूर्ण पहलू है देश के भीतर रक्षा खरीद पर बढ़ता जोर। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत सरकार अब आयातित हथियारों की बजाय स्वदेशी उत्पादन को प्राथमिकता दे रही है। वर्ष 2026-27 में घरेलू रक्षा उद्योग के लिए लगभग ₹1.3 लाख करोड़ से अधिक का प्रावधान इसी दिशा का संकेत है।
इसका लाभ यह है कि:
विदेशी मुद्रा की बचत होगी
निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार बढ़ेगा
रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भरता आएगी
लेकिन आलोचक यह भी इंगित करते हैं कि भारत का रक्षा उत्पादन तंत्र अभी तकनीकी आत्मनिर्भरता के उस स्तर पर नहीं पहुँचा है, जहाँ अत्याधुनिक हथियार प्रणालियाँ पूरी तरह स्वदेशी रूप से तैयार की जा सकें।
पूंजीगत बनाम राजस्व व्यय का द्वंद्व
रक्षा विशेषज्ञों की चिंता यह है कि बजट में पूंजीगत व्यय—यानी नए हथियार, विमान, युद्धपोत—की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत सीमित बनी हुई है। जबकि चीन और पाकिस्तान दोनों ही अपने सैन्य आधुनिकीकरण पर आक्रामक निवेश कर रहे हैं। ऐसे में केवल खर्च नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं होगा; सैन्य क्षमता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है।
रणनीतिक संतुलन की चुनौती
सरकार का तर्क है कि सीमित संसाधनों में अधिकतम परिणाम हासिल करने के लिए स्मार्ट सैन्य मॉडल अपनाना आवश्यक है। अग्निपथ, तकनीक-आधारित युद्ध प्रणाली, ड्रोन और साइबर क्षमताओं पर जोर इसी सोच का हिस्सा है। परंतु जमीनी सच्चाई यह भी है कि भारत जैसे भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील देश में मानव संसाधन और अनुभव का महत्व कम नहीं किया जा सकता।
संतुलन साधना आसान नहीं
रक्षा बजट 2026-27 यह स्पष्ट करता है कि सरकार अब रक्षा क्षेत्र को केवल “अधिक खर्च” के नजरिए से नहीं, बल्कि दक्षता, आत्मनिर्भरता और दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता के नजरिए से देख रही है। अग्निपथ योजना और घरेलू खरीद नीति इस रणनीति के मुख्य स्तंभ हैं।
हालांकि, यह संतुलन साधना आसान नहीं होगा। यदि खर्च नियंत्रण के साथ-साथ सैन्य क्षमता, जवानों का मनोबल और दीर्घकालिक सुरक्षा जरूरतें समान रूप से साधी नहीं गईं, तो यह रणनीति भविष्य में नए सवाल भी खड़े कर सकती है।

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