पर्यावरण

केंद्रीय बजट 2026–27: उत्तराखंड की  पारिस्थितिकी और आपदा प्रबंधन से जुड़ी चिंताओं की अनदेखी

देहरादून, 2 फरबरी। केंद्रीय बजट 2026–27 में एक बार फिर उत्तराखंड या व्यापक भारतीय हिमालयी क्षेत्र के लिए कोई स्पष्ट, समर्पित आवंटन या विशिष्ट नीति ढांचा नहीं दिखाई देता। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब यह क्षेत्र बार-बार जलवायु परिवर्तन से प्रेरित आपदाओं और बढ़ते पारिस्थितिक दबाव का सामना कर रहा है।

बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए देहरादून स्थित सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटीज़ (SDC) फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल ने कहा कि पिछले एक दशक में विशेषकर हिमालयी राज्यों​ और खास तौर पर उत्तराखंड​ में बादल फटने की घटनाएँ, भूस्खलन, आकस्मिक बाढ़, वनाग्नि, ग्लेशियरों की अस्थिरता और बुनियादी ढांचे को नुकसान जैसी घटनाएँ लगातार बढ़ी हैं। ये अब अलग-थलग प्राकृतिक घटनाएँ नहीं रहीं, बल्कि एक गहराते जलवायु ​और मानवीय गतिविधयों द्वारा पैदा हुए संकट का हिस्सा हैं, जिसका असमान बोझ नाज़ुक पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र और समुदायों पर पड़ रहा है। इसके बावजूद, केंद्रीय बजट हिमालय को अब भी सामान्य, राष्ट्रीय योजनाओं​ जैसे बुनियादी ढांचा, पर्यटन या ग्रामीण रोजगार​ के दायरे में ही देखता है, जबकि क्षेत्र की विशिष्ट पारिस्थितिक, भौगोलिक, जलवायवीय और आपदा-संबंधी लागतों को मान्यता नहीं देता।

अनूप नौटियाल ने यह भी रेखांकित किया कि ग्रीन बोनस, हिमालयी राज्यों के लिए पारिस्थितिक क्षतिपूर्ति, पर्वतीय क्षेत्रों के लिए विशेष आपदा जोखिम सूचकांक, या समर्पित हिमालयी लचीलापन और अनुकूलन कोष जैसी मांगें​ जो बार-बार राज्य सरकारों, विशेषज्ञों और नागरिक समाज द्वारा उठाई जाती रही हैं​ बजट भाषण या प्रमुख आवंटनों में कहीं दिखाई नहीं देतीं।

यह कमी विशेष रूप से तब और स्पष्ट हो जाती है, जब हाल ही में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य की फ्लोटिंग पॉपुलेशन​ जैसे चारधाम यात्रा, बड़े धार्मिक आयोजन और आगामी कुंभ मेला​ से जुड़ी चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया था। मुख्यमंत्री ने इन आयोजनों से राज्य के बुनियादी ढांचे पर पड़ने वाले भारी दबाव को रेखांकित किया था, लेकिन केंद्रीय बजट में इन वास्तविकताओं से निपटने के लिए किसी विशेष वित्तीय सहायता या अलग आवंटन का कोई संकेत नहीं मिलता।

बजट पर आगे टिप्पणी करते हुए अनूप नौटियाल ने कहा कि केंद्रीय बजट एक बार फिर हिमालय को एक विशिष्ट पारिस्थितिक और आपदा-संवेदनशील क्षेत्र के रूप में स्वीकार करने का अवसर चूक गया है। उत्तराखंड सहित अन्य हिमालयी राज्य राष्ट्रीय स्तर पर जल स्रोतों की सुरक्षा, जैव विविधता के संरक्षण और जलवायु स्थिरता में अहम भूमिका निभाते हैं, लेकिन इस भूमिका के लिए उन्हें कोई समर्पित वित्तीय मान्यता नहीं मिलती। पर्याप्त ग्रीन या संरक्षण-आधारित आवंटन, पर्वत-विशेष आपदा ढांचे और जलवायु अनुकूलन फंडिंग के बिना ​पर्वतीय राज्यों को लगातार हाशिए पर धकेला जा रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि सामान्य योजनाओं पर निर्भरता जलवायु परिवर्तन, अनियोजित पर्यटन और नाज़ुक पर्वतीय क्षेत्रों में तेज़ी से हो रहे बुनियादी ढांचे के विस्तार के प्रभावों को समझने और संबोधित करने में विफल रहती है।

अनूप नौटियाल ने चिंता व्यक्त की कि जैसे-जैसे जलवायु जोखिम बढ़ेंगे, निष्क्रियता की कीमत केवल हिमालयी राज्य ही नहीं, बल्कि पूरा देश चुकाएगा, जो जल सुरक्षा, जलवायु विनियमन और पारिस्थितिक संतुलन के लिए हिमालय पर निर्भर है। केंद्रीय बजट 2026–27 एक बार फिर यह याद दिलाता है कि इस सच्चाई को स्वीकार करना अब और टाला नहीं जा सकता।

अंत में उन्होंने कहा कि बजट की यह चुप्पी इस बात को और मजबूत करती है कि हिमालयी राज्यों को एक साझा मंच पर आकर​, चाहे वह पारिस्थितिक क्षतिपूर्ति हो, आपदा वित्तपोषण हो या सतत विकास के मार्ग​ अपनी सामूहिक मांगों को स्पष्ट रूप से सामने रखना होगा। वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियाँ भले ही इस समन्वय को कठिन बनाती हों, लेकिन एकजुट हिमालयी आवाज़ ही राष्ट्रीय नीतियों को ज़मीनी सच्चाइयों से जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम है।

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