सावधान : धूम्रपान से अधिक जानलेवा है तम्बाकू चबाना
Tobacco chewing directly causes cancers of the mouth, tongue, gums, throat, esophagus, and pancreas due to the presence of carcinogens like tobacco-specific nitrosamines (TSNAs).
– उत्तराखंड हिमालय.इन डेस्क-
गावों और नगरों की गलियों में अब सिर्फ सिगरेट का धुआँ नहीं, बल्कि छोटे-छोटे पाउचों में बिकने वाला चबाने वाला तंबाकू (Smokeless Tobacco) भी मौत बाँट रहा है। एक हालिया अध्ययन ने चेताया है कि तंबाकू चबाना सिगरेट पीने से कहीं अधिक तेजी से कैंसर को जन्म दे रहा है। यह अध्ययन दिल्ली के लोक नायक अस्पताल में अगस्त 2023 से जून 2024 के बीच किया गया।
🔹 अध्ययन के प्रमुख तथ्य
स्थान: लोक नायक अस्पताल, दिल्ली
अवधि: अगस्त 2023 से जून 2024
नमूना आकार: 116 मरीज (18 वर्ष से अधिक आयु के, जिनमें कैंसर की पुष्टि हुई)
औसत आयु: 47.9 वर्ष
60 वर्ष से कम उम्र: लगभग 80% मरीज
लिंग: 87.9% पुरुष
सामाजिक-आर्थिक स्थिति: 97.4% मरीज निचले या निम्न वर्ग से थे
आय: 31% मरीजों के पास कोई आय नहीं थी
भौगोलिक पृष्ठभूमि: आधे से अधिक मरीज उत्तर प्रदेश और बिहार से थे
🔹 अध्ययन के निष्कर्ष
शोधकर्ताओं ने पाया कि तंबाकू चबाने की आदत (खैनी, जर्दा, गुटखा आदि) से मुँह का कैंसर (Oral Cancer) तेजी से बढ़ रहा है। तंबाकू के सेवन से संबंधित अधिकांश मरीज आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से आते हैं, जो कम कीमत और आसान उपलब्धता के कारण इन उत्पादों का अधिक उपयोग करते हैं।
🔹 तंबाकू सेवन के चलन
भारत में स्मोकलेस (चबाने वाला) तंबाकू सिगरेट से अधिक प्रचलित है।
बिड़ी का उपयोग सिगरेट से अधिक है, विशेष रूप से निम्न-आय वर्ग में।
इनकी कम कीमत और आसान उपलब्धता गरीब वर्ग के लोगों को इसकी लत लगाने में अहम भूमिका निभाती है।
🔹 जागरूकता की कमी
- केवल 66.4% लोगों को पता था कि तंबाकू मुँह का कैंसर पैदा करता है।
- शेष लोगों को लगता था कि तंबाकू केवल “सामान्य नुकसान” पहुंचाता है।
- वर्तमान चेतावनी लेबल केवल “Tobacco Causes Painful Death” तक सीमित हैं, जिनमें ओरल कैंसर का सीधा उल्लेख नहीं होता।
- तंबाकू उत्पादों पर बने चित्रात्मक चेतावनी संदेश अस्पष्ट और कम गुणवत्ता वाले पाए गए।
🔹 वैश्विक और भारतीय संदर्भ
विश्व स्तर पर हर तीन में से एक मुँह का कैंसर मामला चबाने वाले तंबाकू से जुड़ा हुआ है, और भारत भी इसी वैश्विक पैटर्न का अनुसरण कर रहा है।
🔹 अध्ययन का महत्व
शोधकर्ताओं ने कहा कि मुँह का कैंसर रोके जाने योग्य बीमारी है, लेकिन कम आय वर्गों में जानकारी और जागरूकता की भारी कमी है। सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों को विशेष रूप से गरीब और ग्रामीण वर्गों तक पहुँचाने की जरूरत है, क्योंकि ये लोग सस्ते और हानिकारक तंबाकू उत्पादों पर निर्भर हैं।
🔹 विशेषज्ञों की राय
अध्ययन से जुड़े डॉक्टरों — डॉ. मोंगियाम मेघाचंद्रा सिंह, डॉ. अमोद लक्ष्मीकांत बोरले और डॉ. अनुरिता श्रीवास्तव — ने कहा कि तंबाकू चबाने से कैंसर का खतरा बहुत अधिक है क्योंकि यह लंबे समय तक मुँह और गले के ऊतकों के संपर्क में रहता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान चेतावनियाँ आम जनता के लिए स्पष्ट और भयप्रद नहीं हैं।
भारत में सिगरेट पर रोक और नियंत्रण के बावजूद, चबाने वाले तंबाकू उत्पादों की बिक्री और उपयोग तेजी से बढ़ रहे हैं। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से गरीब और अशिक्षित वर्गों में गहरी जड़ें जमा चुकी है।
अध्ययन स्पष्ट रूप से बताता है कि —
> “अगर तंबाकू के सेवन पर सख्त नियंत्रण और जागरूकता अभियान तुरंत नहीं चलाए गए, तो भारत में मुँह का कैंसर एक मूक महामारी बन जाएगा।”
