जलवायु परिवर्तन से भविष्य में चने में जड़ सड़न जैसी मिट्टी जनित बीमारियों का खतरा बढ़ेगा
– WITH PIB INPUT-
भारतीय वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में चने की फसल में जड़ सड़न जैसी मिट्टी जनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। अनुसंधान से यह सामने आया है कि उच्च तापमान, सूखे की स्थिति और मिट्टी में नमी की कमी शुष्क जड़ सड़न (ड्राई रूट रॉट—डीआरआर) रोग के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा करती हैं। यह रोग चने की जड़ों और तने को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाता है।
शुष्क जड़ सड़न के प्रभाव से पौधों की शक्ति कम हो जाती है, पत्तियों का हरा रंग फीका पड़ने लगता है, वृद्धि धीमी हो जाती है और अंततः तना सूखकर मर जाता है। जब जड़ों को व्यापक नुकसान होता है, तो पौधे अचानक मुरझा जाते हैं और फिर सूख जाते हैं।
वैश्विक औसत तापमान में हो रही वृद्धि के कारण फसलों में नए प्रकार के रोगाणुओं के सक्रिय होने की आशंका जताई जा रही है। इन्हीं में से एक है मैक्रोफोमिना फेजोलिना, जो एक मिट्टी जनित नेक्रोट्रोफिक कवक है और चने में जड़ सड़न रोग का प्रमुख कारण बनता है। वर्तमान में भारत के मध्य और दक्षिणी राज्यों को डीआरआर से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र माना गया है, जहाँ चने की फसल का लगभग 5 से 35 प्रतिशत हिस्सा इस रोग से प्रभावित होता है।
इस रोग की विनाशकारी क्षमता और निकट भविष्य में इसके महामारी का रूप लेने की संभावना को देखते हुए इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (आईसीआरआईएसएटी) में डॉ. ममता शर्मा के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने चने में डीआरआर रोग से जुड़े वैज्ञानिक पहलुओं का गहन अध्ययन किया।
अध्ययन में यह पाया गया कि 30 से 35 डिग्री सेल्सियस के बीच तापमान, सूखे की स्थिति तथा मिट्टी में 60 प्रतिशत से कम नमी शुष्क जड़ सड़न रोग के लिए अत्यंत अनुकूल होती है। यह शोध आईसीआरआईएसएटी के जलवायु परिवर्तन उत्कृष्टता केंद्र में किया गया, जिसे भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग का समर्थन प्राप्त है। अध्ययन के निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय पत्रिका फ्रंटियर्स इन प्लांट साइंस में प्रकाशित किए गए हैं।
वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि मैक्रोफोमिना फेजोलिना अत्यधिक प्रतिकूल परिस्थितियों—जैसे उच्च तापमान, अत्यधिक सूखा, मिट्टी के पीएच और नमी में चरम बदलाव—में भी जीवित रहने की क्षमता रखता है। विशेष रूप से चने की फसल में फूल आने और फली बनने की अवस्था के दौरान यह रोग अधिक तीव्र हो जाता है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अध्ययन रोग प्रतिरोधी किस्मों के विकास और बेहतर प्रबंधन रणनीतियों को तैयार करने में सहायक सिद्ध होगा। आणविक स्तर पर किए गए अध्ययनों में वैज्ञानिकों ने चने की कुछ ऐसे जीनों की पहचान की है, जो काइटिनेस और एंडोकाइटिनेस जैसे एंजाइमों के लिए उत्तरदायी हैं और डीआरआर संक्रमण के विरुद्ध आंशिक सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं।
आईसीआरआईएसएटी ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के सहयोग से इस प्रकार के घातक पौध रोगों से निपटने के लिए निरंतर निगरानी, उन्नत पहचान तकनीक, पूर्वानुमान मॉडल के विकास और परीक्षण जैसे बहु-आयामी उपाय भी अपनाए हैं।
