सुप्रीम कोर्ट का उलझन भरा रुख: उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को ज़मानत से इंकार क्यों?
-J. S.R –
दिल्ली दंगों के आरोपी और यूएपीए (UAPA) के तहत बंद उमार ख़ालिद और शरजील इमाम को सुप्रीम कोर्ट द्वारा ज़मानत से इंकार किए जाने के फैसले ने नई बहस छेड़ दी है। चिंता की वजह सिर्फ यह नहीं है कि उन्हें ज़मानत नहीं मिली, बल्कि यह है कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के ही पहले दिए गए निर्णयों और उस सिद्धांत से अलग दिखाई देता है, जिसमें अदालत ने बार-बार कहा है— “जेल नहीं, ज़मानत ही नियम है।”
सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुकी है कि यह सिद्धांत यूएपीए और पीएमएलए जैसे कड़े कानूनों पर भी लागू होता है, जहाँ ज़मानत काफ़ी मुश्किल मानी जाती है। ऐसे में अदालत का अपने ही रुख से हटना निचली अदालतों के लिए भी उलझन पैदा कर सकता है।
अदालत के पहले के फैसले क्या कहते थे?
इसी हफ्ते एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी के तेज़ और निष्पक्ष मुकदमे का अधिकार मौलिक अधिकार है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि सिर्फ यह कहकर ज़मानत नहीं रोकी जा सकती कि अपराध गंभीर है।
बार-बार सुप्रीम कोर्ट ने यह संकेत दिया कि ज़मानत न देना सज़ा का विकल्प नहीं बनना चाहिए।
2022 में Antil बनाम CBI मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत के दायरे को और बढ़ाने के निर्देश दिए थे।
दिल्ली की शराब नीति से जुड़े पीएमएलए मामले में भी अदालत ने कहा था कि लंबी अवधि तक हिरासत और मुकदमे में देरी को ज़मानत के पक्ष में माना जाना चाहिए।
एक यूएपीए मामले में बिहार के एक रिटायर्ड कांस्टेबल की ज़मानत न देने को अदालत ने अनुच्छेद 21 के उल्लंघन जैसा बताया था।
फिर ख़ालिद और इमाम के मामले में क्या बदला?
इन दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही पुराने तर्कों से अलग रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि दोनों को अब तक जिस अवधि तक जेल में रखा गया है, वह अभी “संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य सीमा से अधिक” नहीं है।
अब सवाल यह उठता है कि “लंबी अवधि” की परिभाषा क्या है?
क्या पाँच साल की जेल — जो ख़ालिद और इमाम झेल रहे हैं — पर्याप्त लंबी नहीं मानी जाएगी? जब मुकदमा शुरू नहीं हुआ या बहुत धीमा चल रहा हो, तो इतने लंबे समय तक जेल में रखना क्या उचित है?
एक और उलझन — आतंक की परिभाषा पर विचार क्यों?
दूसरा बड़ा सवाल यह है कि अदालत ने ज़मानत पर सुनवाई के दौरान ही आतंक की परिभाषा पर चर्चा क्यों शुरू कर दी?
ऐसा करके अदालत ने मानो आरोपियों की पहले ही श्रेणीकरण कर दिया, जबकि मुकदमा अभी चला ही नहीं है। यह रुख अदालत के पहले दिए गए उस बयान से अलग दिखाई देता है कि —
“अनुमान (inference) सबूत (evidence) नहीं होता।”
और अदालत पहले यह भी कह चुकी है कि जांच एजेंसी ज़मानत के दौरान सबूतों के आधार पर दोष सिद्ध करने जैसी दलीलें नहीं दे सकती, क्योंकि असली परीक्षण तो मुकदमे में होना चाहिए।
क्या एक साल और इंतज़ार करना न्यायसंगत होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वे एक साल बाद फिर ज़मानत के लिए आवेदन कर सकते हैं।
लेकिन सवाल यह है कि पहले ही पाँच साल जेल में बिताने के बाद एक और साल का इंतज़ार — क्या यह उचित है?
खासतौर पर तब, जब अदालत खुद कई फ़ैसलों में लंबी अवधि की हिरासत को मानवाधिकारों के खिलाफ़ बता चुकी है।
बड़ा सवाल — न्यायिक सिद्धांत स्थिर रहेंगे या बदलते रहेंगे?
यह मामला सिर्फ दो आरोपियों का नहीं है। इससे देश भर की अदालतों को यह संकेत मिलता है कि क्या अदालतें अपने ही बनाए न्यायिक सिद्धांतों पर कायम रहेंगी या हर मामले में अलग-अलग मानदंड अपनाए जाएँगे?
यूएपीए जैसे कड़े कानूनों में ज़मानत पहले ही मुश्किल होती है। यदि अदालतें यह भी तय न कर पाएं कि न्याय और स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बने, तो यह पूरी न्यायिक प्रक्रिया को उलझा देता है।
संक्षेप में कहा जाए तो —
सुप्रीम कोर्ट ने पहले “ज़मानत ही नियम है” कहा था
लंबी हिरासत को अनुच्छेद 21 का उल्लंघन माना था
लेकिन इस मामले में वही तर्क लागू नहीं किए । इससे न्यायिक स्थिरता और पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं
