आगामी विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा सक्रिय, कांग्रेस संगठनात्मक अंतर्कलह में उलझी
–गौचर से दिग्पाल गुसाईं-
आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर जहां भाजपा ने अपनी सक्रियता तेज कर दी है, वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस अभी भी आपसी अंतर्कलह और संगठनात्मक कमजोरी से जूझती नजर आ रही है। हैरानी की बात यह है कि चुनाव नजदीक होने के बावजूद कांग्रेस अब तक अपना ठोस सांगठनिक ढांचा तैयार नहीं कर पाई है।
वर्तमान सरकार का कार्यकाल फरवरी 2027 में पूरा हो रहा है और उससे पहले चुनाव कराना संवैधानिक आवश्यकता है। लेकिन जनवरी 2027 से अप्रैल तक प्रस्तावित महाकुंभ के चलते पूरा प्रशासनिक तंत्र और पुलिस बल उसमें व्यस्त रहेगा, जिससे उस अवधि में चुनाव कराना बड़ी चुनौती साबित होगा। इससे पहले अगस्त 2026 में जनपद चमोली में नंदा देवी राजजात का आयोजन प्रस्तावित है, जिसे स्थानीय स्तर पर कुंभ से कम नहीं माना जाता। ऐसे में सरकार के पास अक्टूबर-नवंबर 2026 में चुनाव कराने का विकल्प ही शेष रह जाता है।
इसी पृष्ठभूमि में सरकार द्वारा प्रशासन के माध्यम से गांव-गांव जाकर “जन-जन की सरकार, जनता के द्वार” जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इसके साथ ही सांसद खेल महाकुंभ जैसे आयोजनों को भी इसी कड़ी से जोड़कर देखा जा रहा है। इससे स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि सरकार पूरी तरह चुनावी मोड में आ चुकी है। भाजपा ने न केवल अपनी गतिविधियां बढ़ाई हैं, बल्कि संगठनात्मक ढांचे को भी मजबूत किया है। उत्तराखंड क्रांति दल भी चुनावी तैयारियों को लेकर खासा सक्रिय दिखाई दे रहा है।
इसके उलट कांग्रेस की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। सूत्रों के अनुसार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने जनपद चमोली और रुद्रप्रयाग में संभावित उम्मीदवारों को तैयारी में जुटने के संकेत दे दिए हैं, लेकिन जिन कार्यकर्ताओं और संगठन के बल पर पार्टी को चुनावी मैदान में उतरना है, वह ढांचा फिलहाल मृतप्राय नजर आ रहा है।
जनपद चमोली की कर्णप्रयाग विधानसभा क्षेत्र की बात करें तो पिछले वर्ष हुए निकाय चुनावों में गैरसैंण और गौचर में कथित गलत टिकट वितरण को लेकर कांग्रेस के एक बड़े गुट ने पार्टी से दूरी बना ली थी। गौचर के पूर्व नगर अध्यक्ष सुनील पंवार के साथ बड़ी संख्या में कार्यकर्ता अलग हो गए थे। यह भी चर्चा है कि गैरसैंण नगर पंचायत के अध्यक्ष भी फिलहाल पार्टी लाइन से इतर अपनी अलग राह पर चल रहे हैं।
गौचर को पारंपरिक रूप से कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन निकाय चुनाव को एक वर्ष बीत जाने के बावजूद पार्टी वहां अपनी खोई हुई जमीन वापस नहीं पा सकी है। नुकसान की भरपाई के लिए सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य जगदीश कनवासी को अध्यक्ष पद सौंपा गया, लेकिन आज तक अन्य पदों पर नियुक्तियां नहीं हो सकी हैं। इसका सीधा असर पार्टी की गतिविधियों पर दिखता है, जब कांग्रेस का कोई कार्यक्रम होता है तो गिनती के लोग ही नजर आते हैं।
निकाय चुनाव में नाराज हुए नेताओं और कार्यकर्ताओं को मनाने की दिशा में भी अब तक कांग्रेस के किसी छोटे-बड़े नेता ने ठोस पहल नहीं की है। यही स्थिति अन्य क्षेत्रों में भी देखने को मिल रही है। ऐसे हालात में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कांग्रेस इस तरह भाजपा का प्रभावी मुकाबला कर पाएगी—संभावनाएं फिलहाल कमजोर ही नजर आती हैं।
नाम न छापने की शर्त पर कांग्रेस के एक कद्दावर नेता ने बताया कि कर्णप्रयाग विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रहे मुकेश नेगी ने जिस व्यक्ति को पालिका अध्यक्ष का टिकट दिलवाने में अहम भूमिका निभाई थी, वही आज उनसे दूरी बनाए हुए है। यह तथ्य भी पार्टी के भीतर गहराते असंतोष की ओर इशारा करता है।
