बिहार की हताशा के साये में गोदियाल का अभिनंदन
–दिनेश शास्त्री-
कांग्रेस के नए प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल का विधिवत राजतिलक रविवार को राजधानी देहरादून के कांग्रेस भवन में होगा। समारोह की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा चुका है और पार्टी के हर खास नेता की समारोह में शिरकत सुनिश्चित करने के लिए प्रयास जारी हैं। वैसे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर गोदियाल की ताजपोशी से अनेक संदेश एक साथ गए हैं। गढ़वाल और कुमाऊं के बीच संतुलन का प्रयास भी किया गया है।
इससे पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर करन महरा थे तो साथ में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य और उपनेता प्रतिपक्ष भी कुमाऊं से ही थे। गढ़वाल उस लिहाज से हाशिए पर था। करन महरा अल्मोड़ा जिले से हैं तो यशपाल आर्य को समूचे कुमाऊं में कांग्रेस का सर्वमान्य दलित चेहरा भी गिना जाता है जबकि भुवन कापड़ी उधमसिंह नगर जिले की खटीमा सीट से विधायक हैं। उनकी सबसे बड़ी योग्यता यह है कि वे मुख्यमंत्री को पराजित कर विधानसभा पहुंचे थे।
2025 में परिस्थितियां क्या होंगी, इस बारे में कुछ कहना अभी जल्दबाजी होगी लेकिन गोदियाल की नियुक्ति के साथ ही उधमसिंह नगर और पिथौरागढ़ से जो विरोध के स्वर उभरे हैं, वह शानदार भोज में कंकड़ की तरह कांग्रेस को चुभ सकते हैं। उधमसिंह नगर में जिलाध्यक्ष पद पर हिमांशु गाबा की नियुक्ति ने एकाएक सियासी पारा बढ़ा दिया।
कांग्रेस के बड़े नेता तिलकराज बेहड ने सीधे न सही संकेत में ही अपनी नाराजगी भरी प्रतिक्रिया दी तो उनके बेटे सौरभ बेहड़ ने एक दर्जन पार्षदों के साथ कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा कर एक तरह से हलचल मचा दी। उनकी नाराजगी गोदियाल से नहीं बल्कि हिमांशु गाबा की नियुक्ति से है। उनका कहना है कि जब संगठन सृजन के दौरान रायशुमारी की गई तो हिमांशु गाबा कांग्रेसजनों की पसंद ही नहीं थे। दरअसल हिमांशु गाबा को नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य का करीबी गिना जाता है।
बेहड़ खेमे की नाराजगी का कारण भी यही है। विद्रोह की खबर फैलते ही कांग्रेस के पुराने चावल की तरह गिने जाने वाले हरदा ने मोर्चा संभाला और तुरंत तिलकराज बेहड़ से मिलने पहुंचे और आग में पानी डालने की कोशिश की। शुरुआती दौर में हरदा अपनी कोशिश में सफल जरूर हुए हैं किंतु आने वाले समय में यथास्थिति बनी रहेगी, इसमें संदेह है।
उधर पिथौरागढ़ में मुकेश पंत की ताजपोशी पर भी नाराजगी से स्वर उभरे हैं। हालांकि वहां उधमसिंह नगर की तरह विद्रोह तो नहीं हुआ किंतु मयूख महर की नाराजगी छन छन कर कांग्रेस में व्यक्त की जा रही है। मुकेश पंत ने हालांकि नियुक्ति के बाद खुद महर से मुलाकात कर स्थिति सामान्य बनाने की कोशिश की लेकिन राख में दबी चिंगारी खत्म हो गई हो, इसकी गारंटी फिलहाल तो नहीं मिलती।
आपको याद होगा पिछले दिनों कांग्रेस ने संगठन सृजन के नाम से पूरे देश में अभियान चलाया था और हर जिले में रायशुमारी कर अपनी रिपोर्ट आलाकमान को सौंपी थी। उसी रिपोर्ट के आधार पर जिला अध्यक्ष और महानगर अध्यक्ष नियुक्त हुए। रुद्रपुर में इसी संगठन सृजन अभियान के दौरान लात घूंसे चले थे, कुछ लोगों के कपड़े फटे। तिलकराज बेहड़ ने उसी बात को इंगित किया कि हमलावर लोगों को ही तरजीह मिली और कुछ बड़े नेताओं ने उन्हें शह दी। उनका इशारा साफ समझा जा सकता है।
अन्य जिलों में भी रायशुमारी के दौरान गुटीय नेताओं ने अपने अपने मत व्यक्त जरूर किए लेकिन रुद्रपुर जैसा प्रकरण कहीं और दिखा नहीं। अलबत्ता संगठन में जगह न मिलने से जिलों में वंचित लोगों में असंतोष होना स्वाभाविक है किंतु यह असंतोष कदाचित मुखरित नहीं हुआ और प्रदेश अध्यक्ष पद पर गणेश गोदियाल की नियुक्ति के बाद उन सभी को संतुष्ट देखा जा सकता है। गोदियाल कांग्रेस के सबसे संभ्रांत चेहरा हैं, इसमें दो राय नहीं हैं।
हरदा का कार्ड उत्तराखंड में कांग्रेस के शीर्ष पुरुष हरीश रावत यानी हरदा ने पिछले दिनों अपनी राय वक्त करते हुए कहा था कि वे चाहते हैं कि ब्राह्मणों को संगठन में जगह दी जानी चाहिए। उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए कांग्रेस नेतृत्व ने नियुक्तियां भी की। यह अलग बात है कि जब जब ब्राह्मण समुदाय के नेताओं को मौका मिला तो उनके नट बोल्ट कसने का काम भी बदस्तूर होता रहा। यही राजनीति है।
हरदा ने अगस्त माह में जब देहरादून जिले के जिला पंचायत सदस्यों का अभिनंदन समारोह हुआ तो उसमें प्रीतम सिंह को नेतृत्व देने की पैरवी की थी, फिर अचानक क्या हुआ कि हरदा का ब्राह्मण प्रेम जागा और प्रदेश अध्यक्ष पद पर गणेश गोदियाल की नियुक्ति हो गई और उधर प्रीतम सिंह निपट गए। राजनीति की इस तरह की बारीकियां समझना आसान नहीं होता और दूसरे जो कुछ प्रकट रूप से कहा जाता है, उसके पीछे सचमुच वही मंशा भी हो, यह जरूरी नहीं होता। सच तो यह है कि उसके पीछे दूर का गणित होता है।
प्रीतम और हरक दोनों को मौका : कांग्रेस ने संगठन सृजन की इस कवायद में प्रीतम सिंह और हरक सिंह रावत दोनों का मान रखने की कोशिश की गई है। दोनों नेताओं को 2027 के चुनाव के मद्देनजर जिम्मेदारी दी गई है। प्रीतम को कैंपेन कमेटी की जिम्मेदारी दी गई तो हरक सिंह रावत को चुनाव अभियान का दायित्व देकर चेहरा बनाया गया है, यह अलग बात है कि जब चुनाव आता है तो इस तरह की कमेटियां केवल कागज तक रह जाती हैं जबकि निर्णय कोई और लेता है।
यह अलग बात है कि हाईकमान की नजर में ये चेहरे महत्व जरूर रखते हैं। इस लिहाज से प्रीतम और हरक को संतुष्ट रखना कई संकेत देता है। एक संदेश तो यह है कि हरक सिंह रावत को टॉप कमेटी का इंचार्ज बनाने से शायद शीर्ष पुरुष के साथ संबंधों में जमी बर्फ पिघल गई है और प्रीतम की जो पैरवी की गई थी, उसकी पूरी न सही आधी भरपाई तो हो गई।
बहरहाल रविवार को अभिनंदन समारोह की तैयारी हो चुकी है। सभी जिलों के नवनियुक्त जिलाध्यक्ष भी इसमें आ रहे हैं। इसके लिए कांग्रेस भवन में बाकायदा दो मंच बनाए जा रहे हैं। लेकिन बिहार चुनाव नतीजों ने इस उत्साह को थोड़ा फीका जरूर कर दिया है।
हालांकि उत्तराखंड और बिहार के मिजाज में कहीं कोई साम्य नहीं है। दोनों का मिजाज, परिस्थिति, कलेवर – फ्लेवर सब कुछ अलग है। बिहार में कांग्रेस राजद के पीछे चलने वाली पार्टी थी और वहां उसकी हैसियत पहले से कम थी लेकिन उत्तराखंड में कांग्रेस एक बड़ी फोर्स है और उसका इतना जनाधार भी है कि नेता अगर ठीक से चले तो बदलाव की बयार भी ला सकते हैं। इतनी सक्षम तो प्रदेश में कांग्रेस है ही।
जनमुद्दों के साथ उसने लंबा संघर्ष किया है, इसलिए सत्ता प्रतिष्ठान के विरुद्ध लोहा लेने की क़ुब्बत यहां कांग्रेस के पास मौजूद है। अगर ऐसा न होता तो मंगलौर और बदरीनाथ विधानसभा उपचुनाव में उसे लोग सिर आंख पर नहीं बिठाते। बदरीनाथ में कांग्रेस के सामने हैवीवेट राजेंद्र भंडारी थे, तो मंगलौर में काजी के सामने हरियाणा के पूर्व मंत्री करतार सिंह भड़ाना को खड़ा किया गया था। वहां जीत बेशक मामूली अंतर से हुई हो लेकिन जीत तो जीत होती है और कांग्रेस थोड़ी भी चूक करती तो भाजपा पहली बार वहां कमल खिला सकती थी।
निष्कर्ष यह की बिहार चुनाव में कांग्रेस की करारी पराजय के साये में हो रहे इस समारोह से कांग्रेस प्रदेश में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कर सकती है। गोदियाल का चयन निरर्थक नहीं होगा और सत्तारूढ़ भाजपा के लिए 2027 का मैदान आसान नहीं होगा। पूर्व स्थिति में कांग्रेस जरूर अपेक्षा के अनुरूप परिणाम नहीं देती किंतु फिलवक्त गोदियाल के आने से कांग्रेस में जोश आया है। उत्साह से लबरेज कांग्रेस के पास इस समय पाने के लिए पूरा आसमान है।
गोदियाल को भी अपनी उपादेयता सिद्ध करनी है और पार्टी क्षत्रपों को एकजुट रखने की चुनौती भी है। अगर उन्हें खुले हाथ काम करने का मौका मिला तो गोदियाल बिहार की पीड़ा को तिरोहित कर सकते हैं। यह बात भरोसे के साथ कही जा सकती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि रविवार के समारोह के बाद प्रदेश कांग्रेस नये रूप रंग और आक्रामकता के साथ दिख सकती है।
