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हिंद महासागर में डिएगो गार्सिया: क्या अमेरिका वेनेज़ुएला जैसी रणनीति अपना सकता है?

जयसिंह रावत-
हिंद महासागर लंबे समय तक वैश्विक राजनीति के हाशिये पर माना जाता रहा, लेकिन इक्कीसवीं सदी में यह महासागर धीरे-धीरे महाशक्तियों के रणनीतिक टकराव का केंद्र बन गया है। इसी महासागर के मध्य स्थित डिएगो गार्सिया द्वीप एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। अमेरिका के  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने इस सवाल को जन्म दिया है कि क्या अमेरिका हिंद महासागर में भी वैसी ही आक्रामक रणनीति अपना सकता है, जैसी उसने लैटिन अमेरिका के कुछ देशों, विशेषकर वेनेज़ुएला, के मामले में अपनाई है।
डिएगो गार्सिया चागोस द्वीपसमूह का सबसे बड़ा द्वीप है, जो भौगोलिक रूप से अफ्रीका और एशिया के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थिति में स्थित है। यह द्वीप कभी मॉरीशस का हिस्सा था, लेकिन 1960 के दशक में ब्रिटेन ने इसे मॉरीशस से अलग कर ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी घोषित कर दिया। इसी प्रक्रिया में चागोस के मूल निवासियों को जबरन उनके घरों से बेदखल कर दिया गया। लगभग दो हजार चागोसियों को मॉरीशस और सेशेल्स में विस्थापित किया गया, जिससे यह मामला आधुनिक इतिहास के सबसे विवादास्पद उपनिवेशवादी कृत्यों में गिना जाने लगा।
ब्रिटेन ने डिएगो गार्सिया को अमेरिका को सैन्य उपयोग के लिए सौंप दिया। इसके बाद यह द्वीप धीरे-धीरे अमेरिकी सैन्य ढांचे का एक अत्यंत अहम हिस्सा बन गया। शीत युद्ध के दौरान इसका उपयोग सोवियत संघ की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया गया, लेकिन शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भी इसकी उपयोगिता कम नहीं हुई। अफगानिस्तान और इराक युद्धों से लेकर आतंकवाद विरोधी अभियानों तक, डिएगो गार्सिया अमेरिकी सैन्य अभियानों का एक प्रमुख लॉजिस्टिक और ऑपरेशनल केंद्र रहा है। जबकि इंदिरा गांधी शासन काल  से भारत हिंद महासागर में अमेरिकी सैन्य वर्चस्व का विरोधी रहा है।
आज डिएगो गार्सिया में अमेरिकी नौसेना और वायुसेना की संयुक्त मौजूदगी है। यहां लंबी दूरी तक मार करने वाले बमवर्षक विमान, निगरानी प्रणालियां और खुफिया सुविधाएं तैनात हैं। अनुमान है कि लगभग चार हजार अमेरिकी और ब्रिटिश सैन्यकर्मी तथा नागरिक ठेकेदार यहां कार्यरत हैं। अमेरिकी रणनीतिक दृष्टि से यह अड्डा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां से पश्चिम एशिया, अफ्रीका और दक्षिण एशिया—तीनों क्षेत्रों पर एक साथ नजर रखी जा सकती है।
हाल के वर्षों में चागोस द्वीपसमूह की संप्रभुता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बढ़ता गया। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और संयुक्त राष्ट्र महासभा ने स्पष्ट रूप से कहा कि चागोस को मॉरीशस से अलग करना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन था। इसके बाद 2024 में ब्रिटेन ने औपचारिक रूप से यह स्वीकार किया कि चागोस द्वीपसमूह की संप्रभुता मॉरीशस को लौटाई जाएगी। हालांकि इस समझौते में यह शर्त भी शामिल रही कि डिएगो गार्सिया पर अमेरिका और ब्रिटेन का सैन्य उपयोग जारी रहेगा।
यहीं से विवाद का नया चरण शुरू होता है। डोनाल्ड ट्रंप ने इस फैसले को रणनीतिक भूल बताया और कहा कि इससे चीन और रूस को अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है। ट्रंप के बयान में यह आशंका झलकती है कि अमेरिका डिएगो गार्सिया पर अपने सैन्य नियंत्रण को किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने देना चाहता। इसी संदर्भ में यह सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका इस क्षेत्र में संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय सहमति की अनदेखी कर सकता है।
भारतीय महासागर की वर्तमान राजनीति को चीन के बढ़ते प्रभाव के बिना नहीं समझा जा सकता। चीन ने पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह, अफ्रीका के जिबूती में सैन्य अड्डे और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत बड़े निवेशों के जरिए इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत की है। ऐसे में डिएगो गार्सिया अमेरिका के लिए चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने का एक अहम साधन बन जाता है।
भारत के लिए भी यह स्थिति साधारण नहीं है। भारतीय महासागर भारत की ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार और सामरिक सुरक्षा की जीवनरेखा है। एक ओर भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर वह नहीं चाहेगा कि यह महासागर किसी एक महाशक्ति का प्रभाव क्षेत्र बन जाए। डिएगो गार्सिया पर अत्यधिक सैन्यीकरण क्षेत्रीय संतुलन को अस्थिर कर सकता है। इंदिरा गांधी सदैव अमेरिका के इस सैन्य मनसूबे के प्रति आशंकित रही थी और समय समय पर भारत का विरोध भी मुखर होता रहा है।

पश्चिम एशिया के संदर्भ में भी डिएगो गार्सिया का महत्व बढ़ जाता है। यह द्वीप फारस की खाड़ी से अपेक्षाकृत निकट है और ईरान के साथ बढ़ते तनाव की स्थिति में अमेरिका के लिए एक सुरक्षित सैन्य आधार प्रदान करता है। हालांकि यही स्थिति इस द्वीप को संभावित संघर्ष की स्थिति में एक संवेदनशील लक्ष्य भी बनाती है।
डिएगो गार्सिया आज केवल एक सैन्य अड्डा नहीं, बल्कि उपनिवेशवाद की विरासत, अंतरराष्ट्रीय कानून की सीमाओं और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा का प्रतीक बन चुका है। चागोस के मूल निवासियों का पुनर्वास और अधिकार अब भी अधूरा प्रश्न है, जबकि वैश्विक शक्तियां इस द्वीप को रणनीतिक मोहरे के रूप में देख रही हैं।
हिंद महासागर में कोई प्रत्यक्ष युद्ध नहीं दिखता, लेकिन शक्ति संतुलन की अदृश्य लड़ाई तेज हो चुकी है। डिएगो गार्सिया इसका केंद्र बिंदु है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह महासागर सहयोग और साझा सुरक्षा का क्षेत्र बनता है या फिर महाशक्तियों की टकराव भरी राजनीति का अगला मैदान। (ये विचार लेखक के निजी है- एडमिन)

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