एनडीए का दांव: उपराष्ट्रपति पद पर सी.पी. राधाकृष्णन की उम्मीदवारी
–उषा रावत
एनडीए ने उपराष्ट्रपति पद के लिए महाराष्ट्र के राज्यपाल और भाजपा के वरिष्ठ नेता सी.पी. राधाकृष्णन को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। संसदीय चुनावी गणित को देखते हुए उनकी जीत लगभग तय मानी जा रही है, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से इस नामांकन के कई संकेत और निहितार्थ हैं। दक्षिण भारत से ताल्लुक रखने वाले राधाकृष्णन भाजपा के उन नेताओं में गिने जाते हैं जिन्होंने संगठन और संसदीय राजनीति दोनों में सक्रिय भूमिका निभाई है। उनका नाम यह दर्शाता है कि भाजपा और एनडीए अब क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक संतुलन को लेकर अधिक सतर्क रणनीति अपना रहे हैं।
राधाकृष्णन का राजनीतिक सफर
सी.पी. राधाकृष्णन तमिलनाडु के कोयंबतूर से भाजपा की राजनीति में उभरे और दो बार लोकसभा सांसद भी रहे। पार्टी संगठन में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। लंबे समय से भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहने के बाद उन्हें संवैधानिक जिम्मेदारियाँ भी दी गईं। वे पहले झारखंड और तेलंगाना/पुडुचेरी का अतिरिक्त प्रभार संभाल चुके हैं और इस समय महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं। इस पृष्ठभूमि के कारण उन्हें प्रशासनिक अनुभव, संतुलित छवि और संसदीय परंपराओं की समझ रखने वाला नेता माना जाता है।
चुनावी गणित
उपराष्ट्रपति का चुनाव राष्ट्रपति चुनाव की तरह व्यापक इलेक्टोरल कॉलेज से नहीं होता, बल्कि केवल लोकसभा और राज्यसभा के निर्वाचित और मनोनीत सदस्य मतदान करते हैं। एनडीए के पास वर्तमान में संसद में स्पष्ट बहुमत है। भाजपा अकेले ही लोकसभा में 240 से अधिक सांसदों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है और उसके सहयोगियों सहित बहुमत काफी आरामदायक स्थिति में है। ऐसे में राधाकृष्णन की जीत में कोई बड़ी बाधा नहीं दिख रही। विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक यदि साझा उम्मीदवार भी खड़ा करता है, तो भी संसदीय अंकगणित उसके पक्ष में नहीं जाता। इसलिए चुनावी परिणाम लगभग तय माने जा रहे हैं, हालांकि विपक्ष इस मौके का इस्तेमाल राजनीतिक संदेश देने के लिए ज़रूर कर सकता है।
दक्षिण भारत का संदेश
भाजपा का दक्षिण भारत में आधार अब भी सीमित है। तमिलनाडु में पार्टी का जनाधार अपेक्षाकृत कमजोर है और डीएमके-कांग्रेस गठबंधन हावी है। ऐसे में तमिलनाडु से आने वाले एक वरिष्ठ भाजपा नेता को उपराष्ट्रपति पद पर नामित करना यह संकेत है कि पार्टी दक्षिण को भी राष्ट्रीय सत्ता-ढाँचे में उचित स्थान देना चाहती है। यह कदम न सिर्फ भाजपा की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है बल्कि एनडीए सहयोगियों को यह संदेश भी देता है कि क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने की कोशिश की जा रही है।
विपक्ष की चुनौती और दुविधा
इंडिया ब्लॉक के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इस चुनाव में किस हद तक गंभीरता से मुकाबला करता है। संसदीय गणित विपक्ष के पक्ष में नहीं है, लेकिन यदि वह एक साझा और सम्मानजनक चेहरा उतारता है, तो वह कम से कम राजनीतिक संदेश देने और अपनी एकजुटता दिखाने में सफल हो सकता है। दूसरी तरफ यदि विपक्ष अलग-अलग नामों पर बिखरा रहता है, तो एनडीए को और अधिक राजनीतिक बढ़त मिल सकती है। फिलहाल विपक्षी दलों में इस बात पर मंथन जारी है कि क्या किसी वरिष्ठ नेता या गैर-राजनीतिक प्रतिष्ठित व्यक्ति को मैदान में उतारकर सरकार को चुनौती दी जाए।
अनुभव बनाम प्रतीक
उपराष्ट्रपति का पद संवैधानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे राज्यसभा के सभापति भी होते हैं। संसद के ऊपरी सदन को चलाना, सरकार और विपक्ष के बीच संतुलन बनाए रखना और संसदीय परंपराओं का संरक्षण करना इस पद का सबसे अहम दायित्व है। राधाकृष्णन का नाम इसी कसौटी पर खरा उतरता है। राज्यपाल के तौर पर उनकी छवि अपेक्षाकृत संतुलित रही है और वे संगठनात्मक निष्ठा के साथ-साथ प्रशासनिक परिपक्वता भी रखते हैं।
एनडीए की रणनीति
एनडीए ने राष्ट्रपति पद के चुनाव में पहले ही द्रौपदी मुर्मू को सामने रखकर सामाजिक और क्षेत्रीय संदेश दिया था। अब उपराष्ट्रपति पद पर दक्षिण भारत के एक वरिष्ठ नेता को नामित कर उसने एक और संतुलन साधने की कोशिश की है। यह साफ संकेत है कि भाजपा अब केवल हिंदी पट्टी पर निर्भर न रहकर अपनी राजनीति को व्यापक राष्ट्रीय स्वरूप देने के प्रयास में है। इसके अलावा, राधाकृष्णन का नाम अपेक्षाकृत विवाद-मुक्त है, जिससे चुनावी प्रक्रिया में अनावश्यक टकराव की गुंजाइश भी कम हो जाती है।
संसद के वोट समीकरणों के आधार पर जीत निश्चित
कुल मिलाकर यह तय माना जा रहा है कि संसद के वोट समीकरणों के आधार पर सी.पी. राधाकृष्णन देश के अगले उपराष्ट्रपति होंगे। लेकिन राजनीति में इस चुनाव का महत्व परिणाम से अधिक संदेश में निहित है। दक्षिण भारत को प्रतिनिधित्व देना, एक अनुभवी और संगठन-सिद्ध नेता को चुनना और विपक्ष को सीमित विकल्पों में धकेलना — ये सभी तत्व मिलकर इस चुनाव को प्रतीकात्मक बनाते हैं। विपक्ष चाहे जो भी रणनीति बनाए, एनडीए ने यह साबित कर दिया है कि वह संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों को भी अपनी व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मानकर चल रहा है।
