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भारत की रक्षा क्षमता में ऐतिहासिक बढ़ोतरी: डीएसी ने 3.60 लाख करोड़ रुपये के प्रस्तावों को मंजूरी दी

 

वायुसेना को मिलेंगे 114 राफेल लड़ाकू विमान, नौसेना और सेना की ताकत बढ़ेगी

 

नई दिल्ली, 12 फरवरी : रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने आज सुरक्षा बलों की युद्धक तत्परता को मजबूत करने के लिए लगभग 3.60 लाख करोड़ रुपये मूल्य के पूंजीगत अधिग्रहण प्रस्तावों को आवश्यकता स्वीकृति (Acceptance of Necessity – AoN) प्रदान की। यह हाल के वर्षों में भारत की सबसे बड़ी रक्षा खरीद पहलों में से एक है, जो ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देगी।

प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, इन प्रस्तावों से भारतीय वायुसेना (आईएएफ), भारतीय सेना, भारतीय नौसेना और भारतीय तटरक्षक बल (आईसीजी) की परिचालन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

वायुसेना के लिए प्रमुख स्वीकृतियां:

मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (एमआरएफए) – राफेल: 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को मंजूरी। अधिकांश विमानों का निर्माण भारत में होगा, जिससे हवाई वर्चस्व, लंबी दूरी के आक्रामक हमलों और निवारक क्षमता में बड़ा इजाफा होगा।

लड़ाकू मिसाइलें (कॉम्बेट मिसाइल्स): गहरी मारक क्षमता और उच्च सटीकता वाली मिसाइलें, जिनमें से ज्यादातर भारत में बनींगी। ये जमीनी हमलों की क्षमता बढ़ाएंगी।

एयर-शिप आधारित उच्च ऊंचाई वाले छद्म उपग्रह (एएस-एचएपीएस): निरंतर खुफिया जानकारी, निगरानी, टोही, इलेक्ट्रॉनिक खुफिया, दूरसंचार और रिमोट सेंसिंग के लिए उपयोगी।

भारतीय सेना के लिए:

विभव एंटी-टैंक माइंस: दुश्मन की मशीनीकृत सेनाओं की गति रोकने के लिए एंटी-टैंक बाधा प्रणाली के रूप में।

बख्तरबंद रिकवरी वाहन (एआरवी), टी-72 टैंक और बीएमपी-II के नवीनीकरण: उपकरणों का सेवा जीवन बढ़ेगा, जिससे तत्परता और परिचालन प्रभावशीलता सुनिश्चित होगी।

भारतीय नौसेना के लिए:

4 मेगावाट समुद्री गैस टरबाइन आधारित विद्युत जनरेटर: रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 की मेक-आई श्रेणी के तहत, विदेशी निर्भरता कम कर आत्मनिर्भरता बढ़ाएगा।

पी-8आई लंबी दूरी के समुद्री टोही विमान: पनडुब्बी रोधी युद्ध, समुद्री निगरानी और हमले की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि। (कुछ रिपोर्टों में अतिरिक्त 6 पी-8आई का जिक्र है।)

भारतीय तटरक्षक बल (आईसीजी) के लिए:

डॉर्नियर विमानों के लिए इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल/इन्फ्रारेड प्रणाली: समुद्री निगरानी क्षमता को मजबूत करेगा।

ये स्वीकृतियां रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, स्वदेशी उत्पादन और आधुनिकीकरण पर केंद्रित हैं। भुगतान कई वित्तीय वर्षों में फैला होगा, और AoN अधिग्रहण प्रक्रिया का पहला महत्वपूर्ण कदम है।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, ये कदम भारत की सशस्त्र बलों को क्षेत्रीय चुनौतियों से निपटने के लिए अधिक सक्षम बनाएंगे और राष्ट्रीय सुरक्षा को नई मजबूती प्रदान करेंगे।

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