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कॉलेजियम, तबादले और सवाल: न्यायपालिका का आत्ममंथन

-जयसिंह रावत-
सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा न्यायाधीश द्वारा कॉलेजियम व्यवस्था पर की गई सार्वजनिक टिप्पणी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि न्यायपालिका की जवाबदेही कैसे तय हो और कौन तय करे? यह बहस नई नहीं है, लेकिन मौजूदा संदर्भ में इसका महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि यह टिप्पणी किसी सैद्धांतिक विमर्श में नहीं, बल्कि न्यायाधीश के अपने तबादले से जुड़े एक ठोस निर्णय के बाद सामने आई है।
उक्त न्यायाधीश का तबादला कॉलेजियम द्वारा उस समय किया गया, जब सरकार ने इस संबंध में सुझाव भेजा था। कॉलेजियम ने उस सुझाव को स्वीकार करते हुए न्यायाधीश को एक स्थान से बिल्कुल भिन्न न्यायालय में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया। इसी निर्णय की पृष्ठभूमि में न्यायाधीश की टिप्पणी आई, जिसने कॉलेजियम की कार्यप्रणाली और उसकी स्वतंत्रता पर बहस को फिर से सतह पर ला दिया।
कॉलेजियम प्रणाली, जो किसी कानून से नहीं बल्कि न्यायिक व्याख्याओं से विकसित हुई है, को न्यायपालिका की स्वतंत्रता का रक्षक माना जाता है। इसका उद्देश्य न्यायिक नियुक्तियों और तबादलों को कार्यपालिका के प्रभाव से बचाना था। लेकिन इसके साथ-साथ इस पर पारदर्शिता की कमी, स्पष्ट मानकों के अभाव और आंतरिक जवाबदेही न होने के आरोप भी लंबे समय से लगते रहे हैं। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश लुई ब्रैंडिस का कथन—
“Sunlight is said to be the best of disinfectants”—
यह संकेत देता है कि बंद दरवाज़ों के पीछे लिए गए फैसले, चाहे नीयत कितनी ही सही क्यों न हो, संदेह को जन्म देते हैं।
यह पहला अवसर नहीं है जब न्यायाधीशों के तबादलों को लेकर प्रश्न उठे हों। अतीत में भी ऐसे वाकये सामने आए हैं, जिनसे यह धारणा बनी कि कुछ तबादले सरकार की प्रशासनिक या राजनीतिक सहूलियत के अनुरूप किए गए। भले ही इन मामलों में प्रत्यक्ष प्रमाण सामने न आए हों, लेकिन ऐसी आशंकाएँ स्वयं न्यायपालिका की छवि के लिए चुनौती बन जाती हैं। इसी कारण तबादलों की प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता की माँग समय-समय पर उठती रही है।
इस बार मामला इसलिए भी अलग है क्योंकि आलोचना न्यायपालिका के भीतर से आई है। आमतौर पर न्यायाधीश अपने विचार फैसलों के माध्यम से व्यक्त करते हैं, न कि सार्वजनिक मंचों पर। जब कोई न्यायाधीश अपने तबादले जैसे संवेदनशील विषय पर टिप्पणी करता है, तो यह केवल व्यक्तिगत असहमति नहीं, बल्कि संस्थागत असंतोष का संकेत भी माना जाता है। हालांकि, अमेरिकी विधिवेता जस्टिस बेंजामिन कार्डोज़ो की यह चेतावनी भी याद रखनी होगी—
“The judge is not a knight-errant roaming at will in pursuit of his own ideal of beauty or goodness.”
अर्थात् न्यायिक असहमति भी संस्थागत मर्यादा के दायरे में ही सबसे प्रभावी होती है।
न्यायपालिका की साख केवल संवैधानिक शक्ति से नहीं, बल्कि जन-विश्वास, संयम और संस्थागत एकता से बनती है। न्यायाधीशों के बीच सार्वजनिक मतभेद, विशेषकर तबादलों जैसे विषयों पर, न्यायपालिका की सामूहिक छवि को प्रभावित कर सकते हैं। अमेरिका के संविधान-निर्माता अलेक्ज़ेंडर हैमिल्टन के शब्दों में—
“The judiciary has neither force nor will, but merely judgment.”
इसलिए न्यायपालिका की सबसे बड़ी पूँजी उसका विवेक और नैतिक अधिकार ही है।
यह कहना भी गलत होगा कि न्यायपालिका आलोचना से ऊपर है। लोकतंत्र में हर संस्था को आत्ममंथन और समीक्षा से गुजरना चाहिए। ब्रिटिश विचारक लॉर्ड एक्टन का कथन—
“Power tends to corrupt, and absolute power corrupts absolutely”—
यह याद दिलाता है कि किसी भी व्यवस्था में असीमित अधिकार अंततः प्रश्नों को जन्म देते हैं। लेकिन आलोचना का तरीका, मंच और समय उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं जितना उसका विषय, विशेषकर तब जब मामला संवैधानिक संस्थाओं का हो।
यह पूरा प्रसंग हमें बताता है कि न्यायिक सुधार किसी एक न्यायाधीश या एक तबादले तक सीमित नहीं हो सकता। कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता, स्पष्ट मानदंड और आंतरिक संवाद की आवश्यकता है, ताकि न तो सरकार के प्रभाव की आशंका बने और न ही न्यायपालिका के भीतर असंतोष सार्वजनिक विवाद का रूप ले। न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना के शब्दों में—
“संविधान केवल काग़ज़ का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक जीवन-पद्धति है।”
न्यायिक संस्थाओं को भी उसी जीवन-पद्धति की भावना के साथ कार्य करना होगा।
अंततः प्रश्न किसी न्यायाधीश को कठघरे में खड़ा करने का नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था को और मज़बूत करने का है। स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन, तथा न्यायाधीशों के तबादलों जैसे संवेदनशील विषयों पर पारदर्शी और भरोसेमंद प्रक्रिया—यही भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी चुनौती और जिम्मेदारी है।

पिछले कुछ दशकों में न्यायाधीशों के तबादलों को लेकर समय-समय पर ऐसे उदाहरण सामने आते रहे हैं, जिनसे यह धारणा बनी कि कुछ फैसले प्रशासनिक सुविधा या तत्काल राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप लिए गए। कभी किसी संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान, तो कभी किसी असहज फैसले के तुरंत बाद न्यायाधीशों के स्थानांतरण ने प्रश्न खड़े किए। यद्यपि इन मामलों में औपचारिक रूप से कॉलेजियम के निर्णय को ही अंतिम माना गया, लेकिन निर्णय प्रक्रिया की अपारदर्शिता के कारण शंकाएँ पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकीं। यही कारण है कि न्यायाधीशों के तबादले केवल प्रशासनिक कदम न रहकर, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता से जुड़े मुद्दे बन जाते हैं।

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