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देहरादून का डीएल रोड चौक अब अम्बेडकर के नाम से जाना जायेगा

देहरादून, 14  अक्टूबर ( अनंत ) । प्रदेश की अस्थायी राजधानी देहरादून के डीएल रोड चौक पर डा०  भीमराव अम्बेडकर की मूर्ति के अनावरण के साथ ही अब यह चौक अम्बेडकर के नाम से जाना जायेगा ।
शनिवार को  यह कार्यक्रम  अखिल भारतीय अम्बेडकर युवक संघ  ने आयोजित किया था जिसमें  जनप्रतिनिधि ,राजनैतिक ,सामाजिक तथा दलित समाज जाने माने लोगों ने हिस्सेदारी की ।  कार्यक्रम में वक्ताओं ने डाक्टर अम्बेडकर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला।
अंबेडकर महज कोई उदारवादी या संवैधानिक प्रजातंत्रवादी नहीं थे। उनके प्रगतिशील विचारों ने बुर्जुवा उदारवाद की सीमाओं को तोड़कर रख दिया। उन्होंने चेतावनी दी थी कि आर्थिक और सामाजिक बराबरी के बिना संविधान तथा राजनैतिक जनतंत्र ढकोसला बनकर रह जायेगा। उनका आर्थिक कार्यक्रम पारम्परिक बुर्जुआ मापदंडों से काफी प्रगतिशील था। जब अर्थव्यवस्था पर राज्य के नियंत्रण की उनकी वकालत का विरोध इस तर्ज पर हुआ कि इससे स्वतंत्रता सीमित होगी, तब उन्होंने जबाब दिया-“यह स्वतंत्रता किसकी है और किसके लिए है? साफ है कि यह ज़मीदारों के लिए मालगुजारी बढ़ाने की, पूंजीपति के लिए काम के घंटे बढ़ाने तथा मज़दूरी की दर कम करने की स्वतंत्रता है। ”   अंबेडकर महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाले सतत योद्धा थे। आज़ादी के बाद पहली कैबिनेट में कानून मंत्री के तौर पर उन्होंने हिन्दू कोड बिल, जो महिलाओं को सम्पत्ति तथा उत्तराधिकार देता था, की पुरजोर वकालत की। कांग्रेस के भीतर तथा बाहर हिन्दू रूढ़िवादी ताकतों के प्रतिरोध का सामना करते हुए इस मुद्दे पर समझौता करने के बजाय अंबेडकर ने इस्तीफा देने का फैसला किया।
डाक्टर भीमराव अम्बेडकर भारतीय दलित समाज के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे। उनका नाम हमारे देश संविधान के निर्माता के रूप में बडे़ ही आदर से लिया जाता है । अम्बेडकर महिला अधिकारों के प्रबल हिमायती थे तथा अपने समय के विचारकों  के उलट वे  हिन्दू धर्म जाति सुधार ही नहीं बल्कि वे समाज से जाति का पूर्ण खात्मा करना चाहते थे । वे वर्ण व्यवस्था को दैविक अनुमोदन देने वाली जाति तथा हिन्दू धर्म दोंनो की भर्त्सना करते रहे हैं । मार्च 1927 में रायगढ़ जिले के महाड़ में चवदार तालाब के संघर्ष में डा०भीमराव अंबेडकर ने हज़ारों दलितों को तालाब से पानी पीने के लिए लामबंद किया तथा महाड़ ही में 25 दिसम्बर 1927 को उन्होंने “मनुस्मृति दहन दिवस” मनाया जहाँ सार्वजनिक तौर पर मनुस्मृति का दहन किया। 1930 में नासिक समेत कई जगहों पर उन्होंने मंदिर प्रवेश के आंदोलन चलाए। वे जाति उत्पीड़न के खिलाफ लड़ने वाले अथक योद्धा में से एक थे। उन्होंने गांधी के छूआछूत विरोधी अभियान को ऊंची जातियों के हित साधने  के तथा वर्ण व्यवस्था को बनाये रखने के औजार के रूप में देखा।

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