पर्यावरण

दिल्ली में क्लाउड सीडिंग: प्रदूषण से निपटने के लिए कृत्रिम वर्षा की पहली कोशिश

नई दिल्ली, 29 अक्टूबर। दिवाली के बाद दिल्ली की हवा फिर से जहरीली हो गई है। शहर पर छाई घनी धुंध और स्मॉग ने निवासियों की जिंदगी को मुश्किल बना दिया है। एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 300 से ऊपर पहुंच चुका है, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में आता है। ऐसे में दिल्ली सरकार ने प्रदूषण को कम करने के लिए एक अनोखा कदम उठाया है – क्लाउड सीडिंग के जरिए कृत्रिम वर्षा पैदा करना। मंगलवार को शहर के कुछ हिस्सों में पहली बार पूर्ण पैमाने पर क्लाउड सीडिंग ट्रायल किया गया, जिससे उम्मीद जगी है कि शाम 5-6 बजे तक कृत्रिम बारिश हो सकती है।

यह ट्रायल दिल्ली के बुराड़ी, नॉर्थ करोल बाग, भोजपुर, मयूर विहार और सदकपुर जैसे इलाकों में किया गया। पर्यावरण मंत्री मंजिंदर सिंह सिरसा ने बताया कि आईआईटी कानपुर की एक संशोधित सेसना-206एच विमान को कानपुर से उड़ान भरनी पड़ी। मौसम की स्थिति अनुकूल होने पर यह विमान दिल्ली पहुंचा और नमी वाले बादलों में रासायनिक पदार्थ छोड़कर वापस लौट गया। मंत्री सिरसा ने कहा, “ट्रायल सफल रहा है। बारिश 15 मिनट से 4 घंटे के बीच हो सकती है। अगर यह कामयाब होता है, तो प्रदूषण स्तर में काफी कमी आएगी।”

क्लाउड सीडिंग क्या है और कैसे काम करती है?

क्लाउड सीडिंग एक मौसम संशोधन तकनीक है, जिसमें बादलों में चांदी आयोडाइड (सिल्वर आयोडाइड), सोडियम क्लोराइड (नमक) या ड्राई आइस जैसे रसायनों को छोड़ा जाता है। ये रसायन बादलों में पानी की बूंदों के लिए नाभिक का काम करते हैं, जिससे वर्षा तेज हो जाती है। दिल्ली में यह तकनीक प्रदूषण को धोने के लिए इस्तेमाल की जा रही है, खासकर सर्दियों में जब ठंडी हवा प्रदूषक कणों को फंसाए रखती है।

आईआईटी कानपुर के अनुसार, इस ट्रायल में दो दौर चले। पहले दौर में 4,000 फीट की ऊंचाई पर 6 फ्लेयर्स (रासायनिक छोड़ने वाले उपकरण) छोड़े गए, जबकि दूसरे में 8। विमान ने करीब 25 नॉटिकल मील लंबा और 4 नॉटिकल मील चौड़ा कॉरिडोर कवर किया, जो खेकड़ा से बुराड़ी के उत्तर तक फैला था। हालांकि, बादलों में नमी का स्तर मात्र 15-20% था, जबकि आदर्श रूप से 50% की जरूरत होती है। इसलिए, बारिश की संभावना कम बताई जा रही है, लेकिन अधिकारी आशावादी हैं।

दिल्ली का प्रदूषण संकट: क्यों जरूरी है यह कदम?

दिवाली के पटाखों और पराली जलाने से दिल्ली का AQI मंगलवार सुबह 305 पर पहुंच गया। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, 38 मॉनिटरिंग स्टेशनों में से 27 पर ‘बहुत खराब’ स्तर दर्ज किया गया। आनंद विहार में AQI 321, आरके पुरम पर 320 और सीरी फोर्ट पर 350 रहा। इससे सांस की बीमारियां, आंखों में जलन और बच्चों-बुजुर्गों को परेशानी हो रही है।

दिल्ली सरकार ने मई में ही पांच क्लाउड सीडिंग ट्रायल को मंजूरी दी थी, जिसकी लागत 3.21 करोड़ रुपये है। हर ट्रायल की कीमत 55 लाख रुपये बताई जा रही है। यह परियोजना ‘टेक्नोलॉजी डेमॉन्स्ट्रेशन एंड इवैल्यूएशन ऑफ क्लाउड सीडिंग ऐज एन अल्टरनेटिव फॉर दिल्ली एनसीआर पॉल्यूशन मिटिगेशन’ नाम से चल रही है। सितंबर में दिल्ली सरकार और आईआईटी कानपुर के बीच एमओयू साइन हुआ था। पहले यह ट्रायल मई-जून, फिर जुलाई, अगस्त और सितंबर में प्लान था, लेकिन अनुकूल मौसम न मिलने से 1 अक्टूबर से 30 नवंबर तक टाल दिया गया। यह पहला ट्रायल है, बाकी चार भी उत्तर-पश्चिम दिल्ली में ही होंगे।

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इसे “शहर की पर्यावरणीय चुनौतियों के लिए ऐतिहासिक कदम” बताया। उन्होंने कहा, “स्वच्छ हवा हर नागरिक का मूल अधिकार है। क्लाउड सीडिंग जैसे साहसिक उपायों से हम प्रदूषण से लड़ेंगे।” अगर सफल रहा, तो फरवरी तक इसे नियमित रूप से लागू किया जाएगा।

विशेषज्ञों की राय: उम्मीद और चिंताएं

वैज्ञानिकों का कहना है कि क्लाउड सीडिंग प्रदूषण को 50% तक कम कर सकती है, लेकिन यह कोई जादू की छड़ी नहीं। आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिक मनींद्र अग्रवाल ने कहा, “यह दोहराना पड़ सकता है। लंबे समय तक रसायनों के प्रभाव पर शोध जरूरी है।” दिल्ली के सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेज के दो प्रोफेसर शाहजाद गनी और कृष्णा अच्युत राव ने इसे “गिमिक” करार दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि स्मॉग टावरों की तरह यह भी बेकार साबित हो सकता है, और चांदी आयोडाइड जैसे रसायनों का कृषि व स्वास्थ्य पर असर अज्ञात है।

विश्व स्तर पर कई देश जैसे चीन और अमेरिका क्लाउड सीडिंग का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन भारत में दिल्ली पहला शहर है जहां इसे प्रदूषण नियंत्रण के लिए आजमाया जा रहा। पिछले हफ्ते एक टेस्ट फ्लाइट में नमी की कमी से बारिश नहीं हुई थी, लेकिन आज के ट्रायल को आशाजनक बताया जा रहा है।

आगे क्या?

अगर शाम तक बारिश हुई, तो यह दिल्ली के लिए मील का पत्थर होगा। तीसरा ट्रायल आज ही होने की संभावना है। सरकार ने ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रैप) के स्टेज-2 को लागू किया है, जिसमें निर्माण कार्य सीमित हैं और वाहनों पर पाबंदी है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि स्थायी समाधान के लिए पराली जलाने, वाहनों और उद्योगों पर नियंत्रण जरूरी है।

दिल्लीवासी आशा की किरण के साथ आसमान की ओर टकटकी लगाए हैं। क्या यह कृत्रिम वर्षा धुंध को धो लेगी? शाम ढलते ही जवाब मिल जाएगा। फिलहाल, मास्क पहनें और घर से बाहर कम निकलें।

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