पर्यावरणब्लॉग

दम घुट रहा है दिल्ली का ; हम चीन से क्यों नहीं कुछ सीख लेते ?

-उषा रावत

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार हवा में मौजूद PM2.5 कणों की सुरक्षित सीमा 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। ये कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि फेफड़ों के रास्ते सीधे रक्त में प्रवेश कर जाते हैं और हृदय, फेफड़े तथा मस्तिष्क तक को नुकसान पहुंचाते हैं। एक सामान्य 10×12 वर्गफुट के कमरे में इन कणों की मात्रा दो दानों नमक से अधिक नहीं होनी चाहिए। लेकिन भारत की वास्तविकता इससे कहीं अधिक भयावह है।

दिल्ली में हाल के वर्षों में PM2.5 का स्तर कई बार 700 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से भी ऊपर दर्ज किया गया है। इसका अर्थ यह है कि उस छोटे से कमरे में सुरक्षित सीमा से लगभग 140 गुना अधिक जहरीले कण मौजूद होते हैं। डॉक्टरों के अनुसार 22 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर PM2.5 के संपर्क में आना एक सिगरेट पीने के बराबर है। ऐसे में 700 माइक्रोग्राम की हवा में सांस लेना दिन में 30 से अधिक सिगरेट पीने जैसा है। यह कोई रूपक नहीं, बल्कि चिकित्सा विज्ञान की कठोर सच्चाई है।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि 150 से 200 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर का स्तर अब दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में “सामान्य” मान लिया गया है। यदि हवा कोई उपभोक्ता उत्पाद होती, तो उस पर चेतावनी लिखनी पड़ती— “सांस लेना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।” दुर्भाग्य से यह समस्या केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रही। मुंबई, कोलकाता, अहमदाबाद, कानपुर, लखनऊ और पटना जैसे शहर भी गंभीर वायु प्रदूषण की गिरफ्त में हैं।

कभी स्वच्छ हवा के लिए पहचाने जाने वाले गोवा जैसे राज्य भी इस संकट से अछूते नहीं हैं। महज पांच वर्षों में पणजी का औसत PM2.5 स्तर 21 माइक्रोग्राम से बढ़कर लगभग 90 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया है। आज देश का कोई भी जिला WHO के मानकों पर खरा नहीं उतरता और लगभग 60 प्रतिशत क्षेत्र भारत के अपने—काफी ढीले—राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों को भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं।

यह स्थिति तब और विडंबनापूर्ण हो जाती है जब हम चीन की ओर देखते हैं। चीन में भारत की तुलना में कहीं अधिक कारें हैं, अधिक कारखाने हैं और औद्योगिक उत्पादन का हिस्सा GDP का लगभग 25 प्रतिशत है, जबकि भारत में यह लगभग 16 प्रतिशत के आसपास है। फिर भी चीन के बड़े शहरों में औसत PM2.5 स्तर लगभग 30 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक सीमित है। यह अंतर केवल तकनीक का नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और सख्त पर्यावरणीय नियमों के क्रियान्वयन का है।

भारत में प्रदूषण का संकट अक्सर मौसम पर डाल दिया जाता है—हवा नहीं चली, इसलिए प्रदूषण बढ़ गया। लेकिन यह आधा सच है। हवा न चलने पर प्रदूषण इसलिए घातक बनता है क्योंकि हमारे शहर खुद ही जहर उगल रहे होते हैं—वाहनों का धुआं, उद्योगों का उत्सर्जन, निर्माण कार्यों की धूल और कचरा जलाने से निकलता धुआं। यानी समस्या बाहर से नहीं, हमारे अपने व्यवहार और नीतियों से पैदा होती है।

समाधान भी हमारे ही हाथ में है। लोगों को निजी वाहनों से हटाकर सार्वजनिक परिवहन की ओर ले जाना होगा, लेकिन इसके लिए बसें, मेट्रो और सुरक्षित पैदल रास्ते उपलब्ध कराने होंगे। उद्योगों को बढ़ावा देना राष्ट्रीय प्राथमिकता हो सकता है, लेकिन बिना सख्त पर्यावरणीय नियमों के यह विकास आत्मघाती साबित होगा। वर्ष 2000-01 में जब दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन को CNG में बदला गया था, तब वायु गुणवत्ता में स्पष्ट सुधार हुआ था। दुर्भाग्य से बाद के वर्षों में उस लाभ को हमने ट्रैफिक, डीजल वाहनों और ढीली निगरानी से गंवा दिया।

1980 में संयुक्त राष्ट्र ने “वर्ल्ड कंजरवेशन स्ट्रेटेजी” नामक दस्तावेज में याद दिलाया था— “हमने पृथ्वी अपने माता-पिता से विरासत में नहीं पाई है, बल्कि इसे अपने बच्चों से उधार लिया है।” चार दशक बाद भी यह चेतावनी उतनी ही प्रासंगिक है। सवाल यह नहीं है कि भारत प्रदूषण नियंत्रित कर सकता है या नहीं; सवाल यह है कि क्या हम सच में ऐसा करना चाहते हैं?

अगर चीन अपने विशाल औद्योगिक ढांचे के बावजूद हवा को अपेक्षाकृत साफ रख सकता है, तो भारत भी कर सकता है। इसके लिए बहाने नहीं, बल्कि सख्त नियम, ईमानदार अमल और यह स्वीकार करना होगा कि स्वच्छ हवा कोई विलासिता नहीं, बल्कि जीवन का मूल अधिकार है। अगर आज हमने कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।

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