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धार्मिक शिक्षा देने वाले मदरसों को अनिवार्य संबद्धता से मुक्त रखने की मांग

 

जमीअत ने अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण को पत्र भेजने का लिया निर्णय, कहा—स्वेच्छा से मान्यता न लेने वालों को बाध्य न किया जाए

देहरादून, 2 अप्रैल। देहरादून के आजाद कॉलोनी स्थित मदरसा दार-ए-अरकम में गुरुवार को जमीअत की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें प्रदेश के मदरसों के समक्ष उत्पन्न विभिन्न समस्याओं पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक की अध्यक्षता जमीअत के जिला अध्यक्ष मौलाना अब्दुल मन्नान कासमी ने की। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण को एक औपचारिक पत्र भेजकर यह मांग की जाएगी कि केवल धार्मिक शिक्षा देने वाले मदरसों को प्राधिकरण से अनिवार्य संबद्धता प्राप्त करने के लिए बाध्य न किया जाए।

बैठक में वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम-2025 लागू होने के बाद इसके कुछ प्रावधानों को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है और मामला अभी विचाराधीन है। ऐसे में जब तक न्यायालय का अंतिम निर्णय नहीं आता, तब तक केवल धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाले मदरसों पर अनावश्यक प्रशासनिक दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए।

वक्ताओं का कहना था कि प्रदेश में अनेक मदरसे ऐसे हैं, जो केवल धार्मिक शिक्षा के उद्देश्य से संचालित होते हैं। ये संस्थान न तो सरकारी मान्यता चाहते हैं और न ही किसी प्रकार की वित्तीय सहायता लेते हैं। इन मदरसों में अध्ययनरत छात्र भी केवल धार्मिक ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से आते हैं, इसलिए उन्हें सरकारी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होती।

जमीअत के प्रवक्ता मोहम्मद शाहनज़र ने कहा कि हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 16 जनवरी 2026 को रिट याचिका संख्या 307/2026 में एक आदेश पारित किया, जिसमें कहा गया कि केवल धार्मिक शिक्षा देने के उद्देश्य से स्थापित संस्थानों को मान्यता की अनिवार्यता से बाहर रखा जा सकता है। बैठक में इस आदेश का हवाला देते हुए कहा गया कि इसी सिद्धांत को उत्तराखंड में भी लागू किया जाना चाहिए।

बैठक में संविधान के अनुच्छेद 25 और 30 का उल्लेख करते हुए कहा गया कि प्रत्येक नागरिक और अल्पसंख्यक समुदाय को अपने धर्म के अनुसार शिक्षा देने तथा अपनी पसंद के शैक्षिक संस्थान स्थापित और संचालित करने का अधिकार है। जमीअत ने मांग की कि जो संस्थाएं स्वेच्छा से मान्यता या सहायता नहीं लेना चाहतीं, उन्हें अधिनियम के तहत बाध्य न किया जाए।

बैठक में मौलाना अब्दुल कुद्दूस, मौलाना शराकत कासमी, मौलाना हुसैन अहमद कासमी, मौलाना गुलशैर कासमी, मुफती अयाज़ अहमद, मास्टर अब्दुल सत्तार, कारी साजिद, मौलाना अकरम, मौलाना अब्दुल रहमान, मौलाना एज़ाज़ कासमी, मौलाना रागिब मजाहिरी, कारी मुन्तजिर, मुफती खुशनूद, मौलाना फिरोज, मौलाना उस्मान कासमी, कारी अहमद अली, मौलाना अरशद, मौलाना मुरसलीन अहमद, कारी शाहवेज काश्फी, कारी नासिर, मौलाना इनाम, मौलाना सदाकत मजाहिरी, मुफती हिफजान मजाहिरी, कारी मोहसिन, कारी फखरूज्जमा, मौलाना जीशान, कारी मुकीम, कारी सादिक, मौलाना मुस्तफा कासमी, मौलाना अब्दुल खालिक मजाहिरी, कारी फरीद, कारी असलम, कारी शहजाद, मौलाना जाहिद, कारी फरहान मलिक, मौलाना मरगूब, हाफिज अबुजर, कारी हुसैन, अशरफ हाशमी, कारी मसरूर व दानिश अली सहित बड़ी संख्या में उलेमा मौजूद रहे।

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