नंदाकिनी घाटी में आपदा का कहर: अनियोजित विकास ने बढ़ाई मुसीबत

देहरादून/नंदानगर। उत्तराखंड की खूबसूरत नंदाकिनी घाटी इस साल अक्टूबर में आई भीषण आपदा की चपेट में आ गई। नंदा नगर विकास खंड के कई गांव तबाह हो गए। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के सदस्य डॉ. दिनेश कुमार असवाल और प्रसिद्ध भू-वैज्ञानिक डॉ. महेंद्र प्रताप बिष्ट ने प्रभावित क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया, जिसमें हृदय विदारक दृश्य सामने आया।
नंदाकिनी घाटी उत्तराखंड की प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर है। 105 किलोमीटर लंबी यह नदी त्रिशूल पर्वत और नंदा घुंघटी से निकलती है। होम कुंड और शिला समुद्र ग्लेशियर इसका जल स्रोत हैं। नंदप्रयाग में यह अलकनंदा से मिलती है। हर 12 साल में होने वाली मां नंदा राज जात गढ़वाल-कुमाऊं को एक सूत्र में बांधती है। अगली यात्रा अगस्त 2026 में होगी। घने जंगल, औषधीय जड़ी-बूटियां, बुग्याल और सैकड़ों झरने इस घाटी की शोभा हैं।

1987 जबडॉ. महेंद्र प्रताप बिष्ट पहली बार यहां आए थे, तब गांव ऊंचे ढलानों पर बसे थे। सड़कें नाममात्र की थीं। लेकिन पिछले 48 सालों में विकास के नाम पर सब बदल गया। सड़कें पहुंचीं, छोटे जलविद्युत प्रोजेक्ट लगे और लोग नदी तलहटी में सैकड़ों मकान बना चुके हैं। पुराना ब्लॉक ऑफिस और पीडब्ल्यूडी बंगला ढूंढना मुश्किल हो गया।
सेरा = यानी वह स्थान जो पिछले कुछ वर्षों में मोक्ष नदी की तलहटी में बसाया गया, जो सदा से पानी में सराबोर रहा है, जहां हम धान जैसी फसलों को उगाते थे…परन्तु कभी रहने के लिए मकान नहीं बनाते थे..? अब क्या किया..एक तो वहाँ विकास के नाम पर इन्हीं नालों के किनारे सड़क बनानी सुरु कर दीं ..उपर से हमारा लालच…! वहीं खुली जगह देख कर सुन्दर सा घर बना दिया…य़ह अज्ञानता हमारे आपदाओं का कारण बनने लगी…!!!
इस बार की आपदा ने साफ कर दिया कि अनियोजित बसावट कितनी खतरनाक है। जाखनी गांव के पास चट्टानों का बहाव (रॉक ग्लेशियर) महज 10-15 साल पुराना है, फिर भी उसके ठीक नीचे नए मकान खड़े हो रहे हैं। एक तेज बहते नाले के मुहाने पर बने पंखे (एलुवियल फैन) को घेरकर घर बनाना उत्तरकाशी की धाराली त्रासदी को न्योता देना है।

पूर्वजों की समझ को भुला दिया गया। सेरा जैसी जगहें, जो हमेशा पानी से भरी रहती थीं, वहां सिर्फ धान की खेती होती थी। घर कभी नहीं बनते थे। लेकिन अब नालों के किनारे सड़कें बन रही हैं और खुली जगह पर पक्के मकान खड़े हो गए।
सबसे ज्यादा नुकसान चुफलां गाढ में हुआ, जो नंदानगर से महज एक किलोमीटर दूर है। 2018 में भी यहां ऐसी ही घटना हुई थी। बांज बगड़ तोक में एक युवक ने रात में सोते लोगों को जगाकर बचाया, लेकिन खुद मलबे में दबकर शहीद हो गया।

“बादल फटना” शब्द को लोग बहाना बना लेते हैं। डॉ. असवाल कहते हैं, यह कोई वैज्ञानिक शब्द नहीं। जिम्मेदारी सबकी है। प्रशासन बसावट पर आंखें मूंदे है, भू-वैज्ञानिक अनजान हैं और गांव वाले पूर्वजों की बोली-भाषा भूल चुके हैं।

डॉ. नौटियाल ने पहले भी सरकार को चेताया था। इस बार वे आशावादी हैं कि एनडीएमए के डॉ. असवाल और श्री राजेंद्र सिंह चौहान जैसे अधिकारी ध्यान देंगे। उनके सुझाव हैं:
- भू-वैज्ञानिक सर्वे कर सुरक्षित बसावट तय की जाए।
- नदियों का उच्चतम जल स्तर चिह्नित कर नीचे की जमीन खाली रखी जाए।
- ढलानों की मजबूती जांचकर ही निर्माण हो।
- पहाड़ी भवन निर्माण कोड लागू किया जाए।
- वैज्ञानिक सुझाव ईमानदारी से लागू हों।

विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता और ईमानदारी से काम हो तो ऐसी आपदाओं से काफी हद तक बचा जा सकता है। घाटी की तस्वीरें खुद गवाही दे रही हैं कि प्रकृति का गुस्सा इंसानी लापरवाही का नतीजा है।
