चारधाम देवस्थानम बोर्ड की अंत्येष्ठि  : वोटों की मज़बूरी, सरकार का सरेंडर,पुजारी मंदिर का मालिक नहीं होता।

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देहरादून, 30 नवंबर (उ हि ). उत्तराखंड की धामी सरकार  ने कृषि कानूनों के मामले में मोदी सरकार के नक़्शे कदम पर चलते हुए आखिरकार बहुचर्चित चार धाम देवस्थानम बोर्ड कानून को रिपील कर बोर्ड को भंग करने का ऐलान कर ही दिया। 2022 के चुनाव में सत्ता में वापसी  के लिए पुरजोर कोशिश कर रही भाजपा सरकार पंडा पुरोहितों के भारी  विरोध का जोखिम नहीं उठा सकती थी।  यह कानून आगामी 8  दिसंबर से देहरादून में ही शुरू हो रहे विधानसभा सत्र में विधिवत वापस लिया जायेगा।  भाजपा सरकार के इस  भूल सुधार पर भी राजनीती शुरू हो गयी मगर यात्री सुविधाएं कैसे सुधरेंगी, इस पर किसी का ध्यान नहीं  है. यहाँ यह गौर करना भी जरुरी होगा कि कोई भी मंदिर किसी एक की संपत्ति नहीं होता. सुप्रीम कोर्ट भी फैसला दे चुका  है कि पुजारी मंदिर का मालिक नहीं होता।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंगलवार को चारधाम देवस्थानम बोर्ड भंग करने का एलान कर दिया। द्वारा गत  दिवस अपनी अंतिम रिपोर्ट मुख्यमंत्री धामी को सौंपने के बाद यह निर्णय लिया गया। उत्तराखंड हिमालया ने इसकी भविष्यवाणी 20 नवंबर को ही कर दी थी।

27 नवंबर 2019 को त्रिवेंद्र सरकार ने चारों धाम सहित उत्तराखंड के 51 मंदिरों के संचालन के लिए देवस्थानम बोर्ड को मंजूरी दी थी। बोर्ड बन गया। इसमें पदाधिकारी भी तैनात कर दिए गए। लेकिन विरोध भी लगातार जारी रहा। कुर्सी से हटने के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत को लगातार इस बोर्ड के खत्म होने का डर रहता था। इसलिए वह आखिरी समय तक यही कहते रहे कि बोर्ड का गठन पिछले 20 साल का सबसे बड़ा सुधारात्मक कदम है।

पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने वर्ष 2019 में श्राइन बोर्ड की तर्ज पर चारधाम देवस्थानम बोर्ड बनाने का फैसला लिया था। तीर्थ पुरोहितों के विरोध के बावजूद सरकार ने सदन से विधेयक पारित कर अधिनियम बनाया। चारधामों के तीर्थ पुरोहित व हकहकूकधारी आंदोलन पर उतर आए, लेकिन त्रिवेंद्र सरकार अपने फैसले पर अडिग रही।

त्रिवेंद्र सरकार का तर्क था कि बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री धाम समेत 51 मंदिर बोर्ड के अधीन आने से यात्री सुविधाओं के लिए अवस्थापना विकास होगा। प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन के बाद मुख्यमंत्री बने तीरथ सिंह रावत ने भी जनभावनाओं के अनुरूप देवस्थानम बोर्ड निर्णय लेने की बात कही थी, लेकिन उनके कार्यकाल में देवस्थानम बोर्ड पर सरकार आगे नहीं बढ़ पाई। फिर नेतृत्व परिवर्तन के बाद मुख्यमंत्री बने पुष्कर सिंह धामी ने तीर्थ पुरोहितों के विरोध को देखते हुए उच्च स्तरीय कमेटी बनाने की घोषणा की।

यह बोर्ड व्यवहारिक ही नहीं था। इसमें नौकरशाहों का इतना बड़ा बोझ डाला गया जिसे बोर्ड वहन ही नही कर सकता था।  तिरुपति और वैष्णो देवी की नक़ल उत्तराखंड के तीर्थों के लिए नहीं की जा सकती थी।  लेकिन अब फिर सवाल उठ रहा है की हक़ हकूकों के नाम पर करोड़ों लोगों की आस्था के इन केंद्रों को क्या मुट्ठी भर पंडों के सुपुर्द किया  चाहिए ? सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चूका है की पुजारी केवल पूजा कर सकता है मगर वह मंदिर का मालिक नहीं है।  चारधाम के पुजारियों को पूजा का अधिकार अवश्य है मगर वे मदिरों के मालिक नहीं हैं।

चारधाम देवस्थानम बोर्ड में जून में सरकार ने आठ नए सदस्य शामिल किए थे। इनमें तीन उद्योगपति सदस्य भी थे, जिस पर समाज के लोग विरोध कर रहे थे। दरअसल, जो आठ सदस्य बोर्ड में शामिल किए गए थे, उनमें मुकेश अंबानी के पुत्र अनंत अंबानी, जिंदल ग्रुप के सज्जन जिंदल, दिल्ली के महेंद्र शर्मा के नाम शामिल हैं। इसके अलावा आशुतोष डिमरी, श्रीनिवास पोश्ती, कृपाराम सेमवाल, जय प्रकाश उनियाल और गोविंद सिंह पंवार को तीर्थ पुरोहित समाज की ओर से सदस्य के तौर पर शामिल किया गया था।

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चारधाम बोर्ड  फ़साना 

  • – 27 नवंबर 2019 को उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन विधेयक को मंजूरी।
  • – 5 दिसंबर 2019 में सदन से देवस्थानम प्रबंधन विधेयक पारित हुआ।
  • – 14 जनवरी 2020 को देवस्थानम विधेयक को राजभवन ने मंजूरी दी।
  • – 24 फरवरी 2020 को देवस्थानम बोर्ड में मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया गया।
  • – 24 फरवरी 2020 से देवस्थानम बोर्ड के विरोध में तीर्थ पुरोहितों का धरना प्रदर्शन
  • – 21 जुलाई 2020 को हाईकोर्ट ने राज्य सभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी की ओर से दायर जनहित याचिका को खारिज करने फैसला सुनाया।
  • – 15 अगस्त 2021 को सीएम ने देवस्थानम बोर्ड पर गठित उच्च स्तरीय समिति का अध्यक्ष मनोहर कांत ध्यानी को बनाने की घोषणा की।
  • – 30 अक्तूबर 2021 को उच्च स्तरीय समिति में चारधामों से नौ सदस्य नामित किए।
  • – 25 अक्तूबर 2021 को उच्च स्तरीय समिति ने सरकार को अंतरिम रिपोर्ट सौंपी
  • – 27 नवंबर 2021 को तीर्थ पुरोहितों ने बोर्ड भंग करने के विरोध में देहरादून में आक्रोश रैली निकाली।
  • – 28 नवंबर 2021 को उच्च स्तरीय समिति ने मुख्यमंत्री को अंतिम रिपोर्ट सौंपी।
  • – 29 अक्तूबर 2021 को मंत्रिमंडलीय उप समिति ने रिपोर्ट का परीक्षण कर मुख्यमंत्री को रिपोर्ट सौंपी।

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