भारत में मधुमेह का नया स्वरूप: पारंपरिक श्रेणियों से परे एक जटिल चुनौती
The evolving diabetes landscape in India has transcended the traditional Type 1 and Type 2 classifications. Emerging “hybrid” forms like LADA (Type 1.5) and MODY (genetic) are increasingly prevalent, often leading to frequent misdiagnosis.A unique challenge is the “Thin-Fat Indian” phenotype, where individuals with low BMI suffer from diabetes due to high visceral fat. Additionally, factors like early-life malnutrition and environmental toxins are driving cases beyond lifestyle choices. This shift necessitates precision medicine and specific tests like C-peptide to ensure accurate, personalized treatment, marking a move from “one-size-fits-all” care to targeted genomic interventions.

–उषा रावत-
भारत में मधुमेह अब केवल एक जीवनशैली से जुड़ी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह एक बहुआयामी स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है। दशकों तक चिकित्सा विज्ञान ने इसे केवल दो श्रेणियों—टाइप 1 और टाइप 2—में विभाजित कर देखा, लेकिन हालिया भारतीय शोधों ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। देश में अब मधुमेह के ऐसे ‘हाइब्रिड’ और ‘एटिपिकल’ मामले सामने आ रहे हैं, जो न तो पूरी तरह इंसुलिन की कमी से जुड़े हैं और न ही केवल मोटापे या गलत खान-पान का परिणाम हैं। यह नया परिदृश्य बताता है कि भारतीय शरीर रचना और आनुवंशिकी इस वैश्विक महामारी को एक विशिष्ट और अधिक जटिल मोड़ दे रही है।
हाइब्रिड मधुमेह और आनुवंशिक विविधता का प्रभाव
भारतीय आबादी में मधुमेह के उभरते स्वरूपों में सबसे महत्वपूर्ण ‘लाडा’ (LADA) और ‘मोडी’ (MODY) जैसे प्रकार हैं। लाडा, जिसे अक्सर ‘टाइप 1.5’ कहा जाता है, वयस्कों में धीरे-धीरे विकसित होने वाली एक ऑटोइम्यून स्थिति है, जिसमें शरीर की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली अग्न्याशय की कोशिकाओं पर हमला करती है। इसके विपरीत, ‘मोडी’ पूरी तरह से आनुवंशिक उत्परिवर्तन का परिणाम है, जो अक्सर किशोरावस्था या युवावस्था में ही दिखाई देने लगता है। इन दोनों स्थितियों की सबसे बड़ी चुनौती इनका गलत निदान है। अक्सर चिकित्सक इन्हें सामान्य टाइप 2 मानकर इलाज शुरू कर देते हैं, जिससे मरीज की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं होता। शोध बताते हैं कि भारत में लगभग 10 से 15 प्रतिशत मधुमेह रोगी वास्तव में इन श्रेणियों में आते हैं, जिन्हें विशेष और सटीक उपचार की आवश्यकता होती है।
थिन-फैट फेनोटाइप: दुबलेपन के पीछे छिपा मधुमेह
भारतीयों के संदर्भ में ‘लीन डायबिटीज’ (Lean Diabetes) एक अनोखी और गंभीर समस्या बनकर उभरी है। पश्चिमी देशों में मधुमेह का सीधा संबंध उच्च बीएमआई (BMI) और मोटापे से माना जाता है, लेकिन भारत में बड़ी संख्या में ऐसे मरीज मिल रहे हैं जो शारीरिक रूप से बेहद दुबले हैं। इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘थिन-फैट इंडियंस’ फेनोटाइप कहा जाता है। ऐसे व्यक्तियों में बाहरी मोटापा नहीं होता, लेकिन उनके आंतरिक अंगों, विशेषकर लिवर और मांसपेशियों के आसपास सूक्ष्म वसा (Visceral Fat) का जमाव अधिक होता है। यह आंतरिक चर्बी इंसुलिन के प्रति शरीर की संवेदनशीलता को कम कर देती है, जिससे कम वजन वाले व्यक्ति भी अचानक मधुमेह के शिकार हो जाते हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि केवल वजन कम रखना ही सुरक्षा का पैमाना नहीं है, बल्कि मांसपेशियों का स्वास्थ्य और चयापचय (Metabolism) की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
कुपोषण और पर्यावरणीय कारकों की भूमिका
भारत में मधुमेह की चुनौती केवल संपन्नता या शहरीकरण से नहीं जुड़ी है। ‘मालन्यूट्रिशन-मॉड्यूलेटेड डायबिटीज’ (Malnutrition-modulated Diabetes) एक ऐसी श्रेणी है जो विशेष रूप से विकासशील देशों में देखी जाती है। बचपन में पोषण की कमी या गर्भावस्था के दौरान माता को मिलने वाले अपर्याप्त पोषण के कारण बच्चे के अग्न्याशय का पूर्ण विकास नहीं हो पाता। बाद के जीवन में जब ये बच्चे सामान्य आहार भी लेते हैं, तो उनका शरीर शर्करा को संसाधित करने में सक्षम नहीं होता। इसके अलावा, बढ़ता वायु प्रदूषण और कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग भी अंतःस्रावी तंत्र (Endocrine System) को बाधित कर रहे हैं, जिससे मधुमेह की दर उन क्षेत्रों में भी बढ़ रही है जहाँ पारंपरिक जोखिम कारक मौजूद नहीं हैं।
प्रिसिजन मेडिसिन और सटीक जांच
मधुमेह के इस बदलते चेहरे को देखते हुए अब उपचार के पुराने तरीकों को बदलने की आवश्यकता है। चिकित्सा विशेषज्ञ अब ‘प्रिसिजन मेडिसिन’ पर जोर दे रहे हैं, जहाँ उपचार दवा के बजाय मरीज की विशिष्ट आनुवंशिक संरचना और उसके मधुमेह के प्रकार पर आधारित होता है। सी-पेप्टाइड जैसे रक्त परीक्षण अब यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं कि मरीज को इंसुलिन की आवश्यकता है या केवल मौखिक दवाओं से काम चल सकता है। भारत जैसे विविध देश में, जहाँ एक ही बीमारी के इतने अलग-अलग रूप मौजूद हैं, व्यक्तिगत स्वास्थ्य प्रोफाइलिंग और नियमित स्क्रीनिंग ही इस अदृश्य महामारी को नियंत्रित करने का एकमात्र प्रभावी तरीका है।
प्रमुख वैज्ञानिक संदर्भ (References)
- ICMR-INDIAB Study (Indian Council of Medical Research):
- The Lancet Diabetes & Endocrinology:
- Madras Diabetes Research Foundation (MDRF):
- National Family Health Survey (NFHS-5):
- World Health Organization (WHO) – Country Office for India:
