आपदा/दुर्घटना

उत्तराखंड में भी कुत्तों का आतंक कम नहीं : इस साल 8 महीनों में हजारों लोगों को कुत्तों ने काटा

अंध कुत्ता प्रेमियों को इंसानों की परवाह नहीं, उनको दूसरे जीवों पर भी दया नहीं  आती, प्रशासन भी असंवेदनशील

-उषा रावत

देहरादून: उत्तराखंड में इस साल अब तक कम से कम 18,000 कुत्ते के काटने के मामले दर्ज किए गए हैं। ये आंकडे भी पूर्ण नहीं माने जा सकते क्योंकि अक्सर लोग कुत्तों के काटने पर प्राइवेट क्लिनिक में ही इंजेक्शन  लगवा लेते हैं  और कुछ इंजेक्शन  लगाना जरूरी न समझने की गलती कर देते हैं ।

राज्य के स्वास्थ्य विभाग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार पिछले पाँच वर्षों के रुझानों के विश्लेषण से पता चलता है कि महामारी काल को छोड़कर, उत्तराखंड में औसतन हर साल करीब 20,000 डॉग बाइट के मामले दर्ज होते रहे हैं। पिछले साल लगभग 23,000 मामले दर्ज हुए, 2023 में 25,000 और 2022 में 15,000 मामले सामने आए थे। यह जानकारी स्वास्थ्य अधिकारियों ने दी।

आंकड़ों के अनुसार हरिद्वार ज़िला, जहाँ बड़ी संख्या में अस्थायी आबादी और बढ़ती आवारा कुत्तों की संख्या मौजूद है, लगातार ऐसे मामलों में सबसे ऊपर रहा है। हालांकि अधिकारियों ने सटीक आंकड़े देने से इनकार किया। हरिद्वार में लंबे समूहों में कुत्ते घूमते हैं, जो लोगों को परेशान करते हैं और अक्सर काटने की घटनाएँ होती हैं, ऐसा कहना है डॉ. जी. एस. तलियन, वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी, हरिद्वार नगर निगम का।

उत्तराखंड के पशुपालन विभाग के 2019 के आँकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में लगभग 80,000 आवारा कुत्ते हैं। नवीनतम जनगणना के आँकड़े हर पाँच साल में जारी होते हैं और फिलहाल प्रतीक्षित हैं। राज्य के 13 ज़िलों में से पाँच—देहरादून, नैनीताल, पिथौरागढ़, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर—में एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) केंद्र वर्तमान में कार्यरत हैं। अल्मोड़ा में एक केंद्र निर्माणाधीन है, जबकि पौड़ी ज़िले के कोटद्वार में दूसरे केंद्र पर विचार किया जा रहा है।

पशु कल्याण बोर्ड उत्तराखंड के निदेशक डॉ. हरेंद्र शर्मा ने मीडिया को बताया कि यह समस्या ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों में भी तेजी से बढ़ रही है। उन्होंने कहा, “ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों को अब अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि यहाँ आवारा कुत्तों की संख्या में वृद्धि देखी जा रही है।”

हालांकि राज्य को डॉग बाइट के मामलों से जूझना पड़ रहा है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि पिछले पाँच वर्षों में राज्य में रेबीज़ से किसी भी व्यक्ति की मौत नहीं हुई है। इसका श्रेय समय पर जागरूकता, एंटी-रेबीज़ टीकाकरण और इलाज को दिया गया है।

शहरी विकास विभाग (UDD) के आँकड़ों के अनुसार 2016 से अब तक उत्तराखंड में लगभग 90,434 कुत्तों की नसबंदी की गई है। UDD निदेशक गौरव सिंघल ने कहा, “नियमित समन्वय बैठकों का आयोजन हितधारकों के साथ किया जाता है ताकि आवश्यकताओं का आकलन किया जा सके और संबंधित शहरी स्थानीय निकायों का समर्थन किया जा सके।”

चिकित्सा अधिकारियों का कहना है कि नसबंदी न किए गए आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए चुनौती पैदा करती है और राज्य पर आर्थिक बोझ बढ़ाती है। इसका मुख्य कारण हर साल बड़ी मात्रा में एंटी-रेबीज़ वैक्सीन की खरीद है। ये वैक्सीन केवल कुत्तों के काटने के मामलों में ही नहीं बल्कि अन्य जानवरों, जैसे बंदरों के काटने के मामलों में भी प्रयोग होती हैं, जिससे मांग और बढ़ जाती है। आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने की जिम्मेदारी नगर निगम और नगर पालिकाओं की है लेकिन देहरादून  जैसे नगर निगम में शिकायत करने पर भी कोई कार्यवाही नही होती। यहाँ तक देहरादून  का जिला प्रशासन लोगों के जीवन की सुरक्षा के इस मुद्दे पर शिकायत करने पर भी ध्यान नही देता।

अधिकारियों ने बताया कि मौसमी बदलाव भी अक्सर मामलों में वृद्धि का कारण बनते हैं, विशेषकर मानसून के दौरान जब पशुओं का प्रजनन मौसम होता है और संपर्क की घटनाएँ बढ़ जाती हैं। जंगली जानवरों का शहरी इलाकों में आना, उनका आक्रामक और विचलित व्यवहार भी इस समस्या को और जटिल बना देता है।

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