सूखे मौसम की मार भी पड़ रही है कस्तकारों पर
–गौचर से दिग्पाल गुसाईं-
मौसम में भारी बदलाव के चलते बर्फ पड़ने के दिनों में जंगलों में जहां आग की घटनाएं बलवती होती जा रहीं हैं वहीं फसलों पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ता दिखाई देने लगा है।
नवंबर माह से जाड़ों का सीजन माना जाता है। इसी महीने से जहां ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फबारी शुरू हो जाती थी वहीं निचले इलाकों में हल्की बारिश होने से ठंड का प्रकोप भी शुरू हो जाता था। लेकिन कुछ सालों से मौसम में आए बदलाव की वजह से जनवरी के महीने का पहला पखवाड़ा बीतने को है लेकिन पहाड़ की ऊंची चोटियां जहां बर्फ़ के लिए तरस रही हैं। वहीं निचले इलाकों में बारिश न होने का असर फसलों पर दिखाई देने लगा है।
बिना बारिश अधिकांश ऊसर वाले खेतों की फसलों की बढ़वार रुकने के साथ ही पेड़ पौधे भी मुरझाने लगे हैं। बारिश न होने से कई क्षेत्रों के जंगलों में आग धधकने की घटनाएं सामने आने लगी है।आग ने इन दिनों आराम फरमा रहे वन विभाग की परेशानियां बढ़ा दी है।
बारिश के बिना खराब हो रही फसलों ने कास्तकारों की पेशानी पर डाल दिया है। तलाऊ वाली जमीन में कास्तकार अमूमन गेहूं बोने के 21 दिन बाद सिंचाई करते थे बाकी बारिश के पानी से पूर्ति हो जाती थी लेकिन इस बार जाड़ों के सीज़न की बारिश न होने से कास्तकार गेहूं की फसल की दूसरी बार सिंचाई करने में जुट गए हैं।
