हिमालय की हवा में छिपा रहस्य: धूल और प्रदूषण का सफर

Mineral dust, biomass burning, secondary sulfate, secondary nitrate from northwest India and Pakistan, polluted cities like Delhi, the Thar Desert, and the Arabian Sea area, and long-range transported marine mixed aerosols are the main sources of aerosols in the central Himalayan region, according to a study. This dust transport and forest fires are the main sources of total suspended particles (TSP), particularly in the pre-monsoon period (March-May) when TSP concentration peaks in the region. With a unique role in the Asian climate, the Himalayan region is considered a vulnerable environment. Several chemical speciation studies have been performed for carbonaceous aerosols and inorganic species over the western and central Himalayan regions during the last decade, reporting the dominance of transported aerosol plumes from the Indo-Gangetic Plains. However, there is a knowledge gap regarding the primary and secondary organic carbon (POC, SOC) fractions, along with a lack of statistical methods for identifying and quantifying the sources of air pollutants at a receptor location (receptor model) in the central Indian Himalaya.
By- Jyoti Rawat
क्या आपने कभी सोचा कि हिमालय की शुद्ध और ताजी हवा में भी प्रदूषण की कहानी छिपी हो सकती है? एक नए अध्ययन ने मध्य हिमालय के आसमान में धूल और प्रदूषण के स्रोतों का खुलासा किया है, जो उत्तर-पश्चिम भारत, पाकिस्तान, थार रेगिस्तान, और यहाँ तक कि अरब सागर से आते हैं। यह शोध न केवल हवा की गुणवत्ता को समझने में मदद करता है, बल्कि यह भी बताता है कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को बचाने के लिए हमें क्या करना होगा।
धूल और धुएँ का सफर
नैनीताल के आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एआरआईईएस) के वैज्ञानिकों ने भारतीय और विदेशी सहयोगियों के साथ मिलकर मध्य हिमालय की हवा में मौजूद कणों (एरोसोल) का अध्ययन किया। इस शोध से पता चला कि हिमालय की हवा में मौजूद प्रदूषण के मुख्य स्रोत हैं:
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खनिज धूल (34%): थार रेगिस्तान और उत्तर-पश्चिम भारत से उड़कर आने वाली धूल, खासकर मार्च से मई के बीच, जब हवा में कणों की मात्रा चरम पर होती है।
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जैव पदार्थ का जलना (27%): खेतों और जंगलों में आग लगने से उठने वाला धुआँ, जो सर्दियों में हवा को भारी बनाता है।
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द्वितीयक सल्फेट और नाइट्रेट (29%): दिल्ली जैसे प्रदूषित शहरों से रासायनिक प्रदूषण, जो हवा के साथ लंबी दूरी तय करता है।
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समुद्री मिश्रित कण (10%): अरब सागर से मानसून की हवाओं के साथ आने वाले कण, जो गर्मियों में हिमालय तक पहुँचते हैं।
हिमालय पर प्रदूषण का असर
हिमालय, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शुद्ध हवा के लिए जाना जाता है, एक संवेदनशील पर्यावरण है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दिल्ली और गंगा के मैदानों से उठने वाला प्रदूषण यहाँ तक पहुँच रहा है? खासकर सर्दियों में, जब घरों को गर्म करने के लिए जैव पदार्थ जलाए जाते हैं, हवा में कार्बनयुक्त कण (जैसे जैविक और तात्विक कार्बन) बढ़ जाते हैं। यह न केवल हवा को दूषित करता है, बल्कि जलवायु पर भी गहरा असर डालता है।
शोध का महत्व
नैनीताल में किए गए इस अध्ययन, जिसका नेतृत्व श्री राहुल श्योराण और डॉ. उमेश चंद्र दुमका ने किया, ने पहली बार मध्य हिमालय में प्रदूषण के स्रोतों को सांख्यिकीय तरीकों से पहचाना। यह शोध ‘एटमॉस्फियर’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ और यह बताता है कि मौसम के हिसाब से प्रदूषण के स्रोत बदलते हैं। उदाहरण के लिए:
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वसंत और गर्मी: धूल का बोलबाला रहता है।
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सर्दी: जैव पदार्थ जलने और रासायनिक प्रदूषण का असर बढ़ता है।
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मानसून: समुद्री हवाएँ कणों को हिमालय तक लाती हैं।
भविष्य के लिए सबक
यह अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि हिमालय की हवा को साफ रखने के लिए हमें प्रदूषण के स्रोतों को नियंत्रित करना होगा। चाहे वह थार रेगिस्तान की धूल हो, दिल्ली का औद्योगिक प्रदूषण हो, या खेतों में जलने वाला जैव पदार्थ, हर स्रोत को समझना और उसका समाधान ढूँढना जरूरी है। यह शोध न केवल वैज्ञानिकों के लिए, बल्कि नीति निर्माताओं और आम लोगों के लिए भी एक जागरूकता का संदेश है कि हमारी हवा और पर्यावरण को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।
‘एटमॉस्फियर’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि भारतीय गांगेय प्रदेश के मैदानों और हिमालय पर जैव अपशिष्ट (बायोमास) जलने की तीव्रता एवं घरेलू गर्मी और वायु की उथली मिश्रित परत के कारण सर्दियों में कार्बनयुक्त (कार्बोनेसियस) एरोसोल (जैविक कार्बन (ओसी) और तात्विक (एलिमेंटल) कार्बन (ईसी) सबसे अधिक थे। शोधकर्ताओं ने जैव अपशिष्ट की जलाने (बायोमास-बर्निंग) से बने एरोसोल के एक महत्वपूर्ण प्रभाव का भी सुझाव दिया, जबकि पानी में अपेक्षाकृत उच्च रूप से घुलनशील जैविक कार्बन और नैनीताल पर बायोमास जलने, माध्यमिक, या पुराने कार्बनिक एरोसोल का भी महत्वपूर्ण योगदान था ।
चित्र 1. नैनीताल में न्यूनतम 25वें प्रतिशत और एमआरएस विधि का उपयोग करते हुए एसओसी और पीओसी सांद्रता (वायलिन प्लॉट)। बॉक्स 25-75वाँ प्रतिशत दिखाता है, जबकि यह खुले वृत्त माध्य से मेल खाता है, जो मानक विचलन (मूंछ) के साथ ग्राफ़ में दिया गया था (सौजन्य: राहुल श्योराण एट अल।, 2021; वायुमंडल, 12(9), 1228)।
चित्र 2: नैनीताल में ओसी सांद्रता (रंगीन पैमाने) की एक प्रक्रिया के रूप में एनएसएस-के + के साथ 25 वें प्रतिशत और एमआरएस विधियों से प्राप्त एसओसी सांद्रता में अंतर के बीच सहसंबंध। लाल रेखा रेखीय प्रतिगमन और लाल छायांकित क्षेत्र, 95% विश्वास स्तर पर रेखीय प्रतिगमन की सीमाएं दिखाती है (सौजन्य: राहुल श्योराण एट अल।, 2021 ; वायुमंडल, 12 (9),1228 )।
डॉ. उमेश चंद्र दुमका ने कहा “भविष्य के शोध में विशिष्ट दहन और प्राकृतिक (जैसे, धूल, स्थानीय बनाम परिवहन) स्रोतों की पहचान के लिए एरोसोल मौलिक संरचना के लक्षण वर्णन पर अधिक ध्यान देना चाहिए,” ।
श्री राहुल श्योराण कहते हैं “वर्तमान प्रारंभिक परिणाम उत्सर्जन सूची का पूरक बन सकते हैं और इस क्षेत्र में जलवायु प्रभावों के प्रभावपूर्ण मूल्यांकन में योगदान कर सकते हैं” ।

चित्र 3: संबंधित एसओसी अनुमानों के एक कार्य के रूप में नैनीताल में एमआरएस (क) और 25 वें प्रतिशतत (ख ) विधियों के माध्यम से एनएसएस-के+ और पीओसी अनुमानों के बीच सहसंबंध। लाल रेखा रेखीय प्रतिगमन और लाल छायांकित क्षेत्र, 95% विश्वास स्तर पर रेखीय प्रतिगमन की सीमाएं दिखाती है (सौजन्य: राहुल श्योराण एट अल।, 2021 ; वायुमंडल, 12 (9 ),1228 )।
प्रकाशन लिंक: https://www.mdpi.com/2073-4433/12/9/1228।



