गीता को नये संदर्भ के साथ पढ़ने में मजा आता है

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा-
“सुदुर्दर्शमिदं रुपं दृष्टवानसि यन्मम
देवानामपि: नित्यं
दर्शनकाङ्क्षिणः।।”।।५२।।(श्रीमद्भगवद्गीता ११वां अध्याय)
कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि देखो मित्र ! अभी जो प्रोफाइल तुमने मेरा देखा है, उसका मैं कभी विज्ञापन नहीं करता,वह तो इसलिए दिखाया तुम्हें क्योंकि तुम मेरे मित्र हो, तुमसे मैं अपने बारे में कुछ छुपाना नहीं चाहता था अन्यथा जो मजा साधारण रुप से रहकर कुछ असाधारण करके दिखाने में है, वह किसी में नहीं हैं। दुनियां में बहुत से लोग ऐसे मिलेंगे तुम्हें जो हीरो के रूप में खुद को प्रचारित करते हैं लेकिन होते वास्तव में जीरो ही हैं, उनकी पोल भी जल्दी खुल जाती है और वे खुद ही उपहास के पात्र बन जाते हैं ”
श्री कृष्ण की यह बात आगे प्रमाणित भी हो गई जब पौण्ड्रक ने कृष्ण की नकल करने की कोशिश की -जो वह सपने में भी नहीं हो सकता था। उसने विज्ञापन के द्वारा जनता के सामने खुद को एक अवतारी पुरुष
दिखने की कोशिश की थी, फिर क्या हुआ ? सबको पता है -कृष्ण ने उसकी पोल खोल दी और पौण्ड्रक का वह छद्म रुप एक मिनट में धराशाई कर दिया।
आज के समय भी ऐसे छद्म प्रोफाइल ओढ़े बहुत से नेता मिलेंगे।
GPB
