बदलते दौर में भी गौचर–जौलजीबी मेलों का आकर्षण बरकरार, परंपराओं पर पाश्चात्य संस्कृति का बढ़ता प्रभाव

– गौचर से दिग्पाल गुसाईं-
तिब्बत से ऊन और ऊनी वस्त्रों की खरीद-बिक्री के केंद्र के रूप में शुरू हुए गौचर और जौलजीबी मेले आज पूरी तरह बदल चुके हैं। पाश्चात्य खान–पान और कोरिया–बेल्जियम से बने कालीनों ने मेले में अपनी मजबूत जगह बना ली है। इसके बावजूद लोगों का उत्साह और मेलों के प्रति आकर्षण कम नहीं हुआ है।
पिथौरागढ़ का जौलजीबी मेला और चमोली का गौचर मेला उस समय आयोजित होते हैं जब क्षेत्र के कास्तकार खेती-बाड़ी के कामों से फुर्सत में होते हैं। यह समय बेटियों–बहुओं के मिलने और जाड़ों के लिए ज़रूरी सामान खरीदने का होता था। कभी ये मेले ग्रामीणों की आवश्यकताओं का प्रमुख साधन थे, पर समय बदलने के साथ तस्वीर भी बदल गई है। आज परिवहन सुगमता के कारण बाज़ार गांव–गांव पहुँच चुके हैं।
अब ऊनी वस्त्रों की जगह कैसमिलोन के कोरियाई–बेल्जियम कालीन, और पहाड़ी खाद्यों की जगह चाउमीन, मोमो, मैगी जैसे फास्ट फूड ने ले ली है। लोगों की पसंद में आए इस बदलाव ने छोटे-बड़े सभी होटल कारोबारियों को भी इसी दिशा में चलने को मजबूर कर दिया है।

हालाँकि सकारात्मक बदलाव भी दिखते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भोटिया जनजाति के फरण, मलारी–गमशाली की राजमा, तथा स्वयं सहायता समूहों द्वारा लाई जा रही स्थानीय पहाड़ी दालें फिर से पहचान बनाने लगी हैं।
लेकिन मेले में शोरगुल करते लाउडस्पीकर, शराब पीकर हंगामा करने वाले लोगों और घटिया गुणवत्ता के खिलौनों व सामानों का बढ़ता बाजार चिंता का विषय बना हुआ है। गांव–गांव शराब की दुकानों के खुलने से यह समस्या और बढ़ी है, जिससे पहाड़ी संस्कृति के मूल स्वरूप पर भी चोट पहुँचती दिखती है।
एक समय गौचर मेला मेलार्थियों के इंतजार में रहता था, पर बढ़ती जनसंख्या और बदलती जीवनशैली के कारण अब भीड़ जुटना सामान्य हो गया है। मेलों की शान माने जाने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम और खेलकूद भी अब गुणवत्ता के संकट से गुजर रहे हैं।
पहले गढ़वाल राइफल्स की सक्रिय भागीदारी मेले की प्रतिष्ठा बढ़ाती थी। उनकी सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ, और फुटबॉल–बॉलीबॉल प्रतियोगिताओं में भागीदारी मेले को ऊँचा स्तर देती थीं। अब खेल आयोजनों का दायरा सिमटकर बंद कमरों में कैरम, बैडमिंटन और शतरंज तक रह गया है, जबकि फुटबॉल और बॉलीबॉल भी केवल अंतिम तीन दिनों तक सीमित रह गए हैं।
मेले में समुदाय विशेष के लोगों द्वारा पहचान छुपाकर भोजन–पेयान का कारोबार करने और इस बार कैंटीन आवंटन को लेकर उठे विरोध के स्वर भी स्थानीय चर्चा का हिस्सा हैं।
फिर भी, व्यवसायिक बदलावों के बीच गौचर–जौलजीबी मेलों की आत्मा—
माँ–बहन–बेटी–ननद और भाउज का आत्मीय मिलन—आज भी जस का तस है। यही मूल स्वरूप आने वाले समय में भी बना रहेगा, हालांकि खाने–पीने की संस्कृति में बदलाव की गुंजाइश अवश्य दिखाई देती है।
