जंगल का बढ़ता आतंक: पहाड़ों में गुलदार और भालू से दहशत, 25 साल बाद भी नीति का इंतज़ार
-ज्योतिर्मठ से प्रकाश कपरुवाण –
उत्तराखंड का पूरा पहाड़ी क्षेत्र इस समय गुलदार और भालू के आतंक से डरा-सहमा है। हर वर्ष दर्जनों लोग इन वन्य जीवों का शिकार हो रहे हैं, जबकि घायलों की संख्या सैकड़ों में पहुंच चुकी है। लेकिन राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी वन्य जीवों के बढ़ते खतरों से निपटने के लिए कोई ठोस और प्रभावी नीति नहीं बन सकी है।
स्थिति यह है कि पहाड़ों में अब अंधेरा होते ही लोग घरों में दुबकने को मजबूर हैं। इस वर्ष पहली बार असंख्य भालुओं की बढ़ी संख्या ने लोगों को हैरान और परेशान कर दिया है। ऐसे में सरकार की प्राथमिकता पहाड़वासियों को वन्य जीवों के आतंक से उबारना होना चाहिए, जिसके लिए कड़े और त्वरित निर्णय लेने की आवश्यकता है।
पलायन के पीछे अब नया कारण — जान बचाना
पहले पहाड़ों से पलायन के कारण स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी, सड़कों की कमी और जंगली जानवरों से खेती का नुकसान थे। लेकिन अब स्थिति इससे भी आगे बढ़ चुकी है। लोग अपनी जान बचाने के लिए पलायन को मजबूर हो रहे हैं।जंगली सूअर और लंगूर खेती को बर्बाद कर रहे हैं।
- भालू नगदी फसलों, पशुधन और ग्रामीणों पर हमले बढ़ा रहा है।
- गुलदार घर–आंगन तक पहुंचकर मासूम बच्चों को शिकार बना रहा है।
इतने गंभीर हालात के बावजूद सरकारी तंत्र इसे बड़े संकट की तरह नहीं ले रहा है। सवाल यह है कि जब किसी आपदा में सभी विभागों को झोंक दिया जाता है, तो क्या वन्य जीवों का बढ़ता आतंक किसी आपदा से कम है?
सीमित संसाधनों के सहारे कैसे रुके जंगल का आतंक?
वन विभाग के पास सीमित कर्मचारी हैं।किसी एक गांव में भालू की सूचना मिलते ही वनकर्मी पटाखे लेकर वहां पहुंचते हैं, तभी दूसरे और तीसरे गांव से नए हमलों की खबर आ जाती है। इस तरह की स्थिति में केवल वन विभाग पर निर्भर रहना अव्यवहारिक है।
क्या किया जाना चाहिए? सुझाव स्पष्ट हैं
अब समय आ गया है कि वन्य जीवों के आतंक को आपदा घोषित करते हुये
1. विभिन्न विभागों की त्वरित प्रतिक्रिया (रैपिड रिस्पॉन्स) टीमें गठित की जाएं।
2. गांवों और मोहल्लों के आसपास झाड़ी कटान व सफाई अभियान चलाया जाए।
3. संभावित खतरनाक क्षेत्रों में पर्याप्त स्ट्रीट लाइटें लगाई जाएं।
4. बिजली कटौती की स्थिति में सोलर लाइट की व्यवस्था हो।
यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो पहाड़ के गांवों से हर दिन मौतों और हमलों की खबरें आती रहेंगी, और वन विभाग केवल मुआवजा देकर अपना औपचारिक दायित्व पूरा करता रहेगा।
मुआवजे की राशि भी अपर्याप्त
यह भी विचारणीय है कि भालू और गुलदार के हमलों में बुरी तरह घायल लोगों का इलाज वर्तमान मुआवजा राशि से संभव ही नहीं है। यह नीति भी तत्काल समीक्षा की मांग करती है।
अब देखना यह है कि सरकार वन्य जीवों के बढ़ते आतंक को आपदा की तरह गंभीरता से लेने में कितना समय लगाती है।
पहाड़ के लोग जिनकी रातें दहशत में गुजर रही हैं, उनकी निगाहें सरकार की ओर टिकी हुई हैं।
