आपदा/दुर्घटनापर्यावरणब्लॉग

धराली से किश्तवाड़ तक गाड़ गदेरों का उत्पात

The western Himalayan region, from Dharali in Uttarakhand to Kishtwar in Jammu and Kashmir, is currently grappling with the severe impact of natural disasters such as flash floods, cloudbursts, and landslides. On August 5, the Khir Gad in Dharali, Uttarkashi, and on August 14, the floods from streams in Chashoti, Kishtwar, once again highlighted the vulnerability of this region. Himachal Pradesh, situated in between, has been continuously enduring the wrath of nature for the past few years. While climate change and human errors are indeed major causes of these disasters, little attention is paid to the small tributaries and streams, locally known as ‘gad’ or ‘gadera,’ which are the primary agents of destruction. These small watercourses, such as Khir Gad, Birahi Gad, Kanodia Gad, and Assi Ganga, have proven to be far more destructive than larger rivers like the Ganga, Alaknanda, Bhagirathi, and Chenab. Their ferocious nature is not a new phenomenon. From the Alaknanda flood of 1970 to the Bhagirathi flood of 1978, and now the Dharali disaster of 2025, the destructive power of these small rivers and streams has repeatedly come to the fore. Therefore, it is essential to understand the water systems of this region and study the entire Himalayan watershed to develop preventive strategies for the future. After all, these ‘gad’ and ‘gadera’ are the very sources of major rivers like the Ganga, Yamuna, Sutlej, and Jhelum. These small streams, flowing through narrow valleys and steep slopes, rapidly carry water and debris downstream, causing flash floods and debris flows.

जयसिंह रावत

उत्तराखंड के धराली से जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ तक के पश्चिमी हिमालय का क्षेत्र इन दिनों त्वरित बाढ़, बादल फटने और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं की भयंकर मार झेल रहा है। गत 5 अगस्त को उत्तरकाशी के धराली में खीर गाड़ और फिर 14 अगस्त को किश्तवाड के चशोती में नालों से आई बाढ़ ने इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को फिर से उजागर कर दिया। बीच का हिमाचल प्रदेश तो बिगत कुछ सालों से प्रकृति की इस भयंकर मार को तो निरन्तर झेल ही रहा है। जलवायु परिवर्तन और मानवीय गलतियां तो इन आपदाओं के प्रमुख कारण हैं ही, लेकिन छोटी सहायक नदियां और नाले, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘गाड़’ या ‘गदेरा’ कहा जाता है, उन पर चर्चा नहीं हा रही है। जबकि यही गाड़ -गदेरे ही तबाही को अंजाम देते हैं।ये छोटी जलधाराएं, जैसे खीर गाड़, बिरही गाड़, कनोडिया गाड़, और अस्सी गंगा, बड़ी नदियों जैसे गंगा, अलकनंदा, भगीरथी और चिनाब की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी साबित होती हैं। इनका विकराल रूप कोई नई बात नहीं है। सन् 1970 की अलकनंदा बाढ़ से लेकर 1978 की भगीरथी बाढ़ और अब 2025 की धराली आपदा तक, छोटी नदियों और नालों की विनाशकारी शक्ति बार-बार सामने आई है। इसलिये जरूरी है कि  इस क्षेत्र के जल तंत्र को समझा जाय हिमालय के समूचे जलागम क्षेत्र का अध्ययन कर भविष्य के लिये बचाव रणनीति तैयार की जाय। वैसे भी गंगा, यमुना, सतलज और झेलम जैसी नदियों के श्रोत ही यही गाड़ गदेरे है। ये छोटी धाराएं संकीर्ण घाटियों और तीव्र ढलानों में पानी और मलबे को तेजी से नीचे लाती हैं, जिससे त्वरित बाढ़ और मलबा बहाव होता है।

छोटी धाराओं पर बड़ी नदियों की निर्भरता

हिमालयी जल तंत्र जटिल है, जहां जलवायु परिवर्तन, ऊबड़-खाबड़ भू-आकृति, और मानवीय गतिविधियां आपदाओं को जन्म देती हैं। गंगा जैसी विशाल नदियां देवप्रयाग से शुरू होती हैं, लेकिन उनकी सहायक नदियां अलकनंदा और भगीरथी, और इनसे जुड़े छोटे गाड़-गदेरे, इनका असली जलस्रोत हैं। अंतरराष्ट्रीय जलवायु अनुसंधान केंद्र के अध्ययन के अनुसार, हिमालय में 70-80 प्रतिशत त्वरित बाढ़ें छोटी धाराओं से जुड़ी हैं, जो ऊपरी क्षेत्रों में भारी वर्षा या हिमपात के पिघलने से उत्पन्न पानी को तेजी से नीचे लाती हैं। एक अन्य अध्ययन के अनुसार मृदा और जल मूल्यांकन उपकरण मॉडल से अलकनंदा नदी तंत्र का विश्लेषण दिखाता है कि 20 से 24 प्रतिशत पानी इन छोटी धाराओं से आता है, जो बाढ़ को बढ़ाता है। पूरे जल संग्रहण क्षेत्र का अध्ययन न करने से पूर्वानुमान और रोकथाम असंभव हो जाता है। विशेषज्ञ आनंद शर्मा, जो भारतीय मौसम विभाग के पूर्व निदेशक हैं, कहते हैं कि बादल फटने की बजाय पूरे जल संग्रहण क्षेत्र की वर्षा की निगरानी जरूरी है, क्योंकि दूरस्थ छोटी धाराएं ही बाढ़ का मुख्य कारण बनती हैं।

भयंकर तबाही मचाते हैं गाड़ गदेरे

छोटी नदियां और नाले बड़ी नदियों से ज्यादा नुकसान क्यों करते हैं? इसका कारण भौगोलिक, जलवायु-संबंधी और मानवीय कारकों का संयोजन है। हिमालय की संकीर्ण घाटियां और 40 से 50 डिग्री तक की तीव्र ढलानें पानी और मलबे को तेज गति देती हैं। ये धाराएं भारी वर्षा या हिमपात के पिघलने से भरकर मिट्टी, पत्थर, पेड़-पौधे और बड़े-बड़े बोल्डर नीचे लाती हैं, जिससे मलबा प्रवाह क्षेत्र बनते हैं। अगर इन क्षेत्रों पर बाजार या बस्तियां बनी हों, जैसा कि धराली में हुआ, तो विनाश कई गुना बढ़ जाता है। छोटे नाले बड़ी नदियों को अस्थायी रूप से रोकने में भी सक्षम होती हैं, जिससे झीलें बनती हैं। इन दिनों धराली ो ही निकट एक अन्य नाले द्वारा बाढ़ में लाये गये मलबे के कारण भागीरथी में झील बनी हुयी है।  ऐसी झीलों के टूटने से टूटने से भयंकर बाढ़ आती रही हैं। उदाहरण के लिए, 1978 में उत्तरकाशी में कनोडिया गाड़ ने भूस्खलन से गंगनानी में 30 मीटर ऊंचा अस्थायी बांध बनाया, जिसके टूटने से भगीरथी में बाढ़ ने निचले क्षेत्रों को तबाह कर दिया। जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ता तापमान वायुमंडल में नमी बढ़ाता है, जिससे चरम वर्षा की घटनाएं बढ़ती हैं। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान पुणे की 2022 की स्टडी ने पिछले 50 वर्षों में पश्चिमी हिमालय में ऐसी घटनाओं में वृद्धि साबित की है। इसके अलावा, ग्लेशियर पिघलने से बनी झीलें फटने पर त्वरित बाढ़ लाती हैं। मानवीय गतिविधियां, जैसे अव्यवस्थित सड़क निर्माण, बांध, और वनों की कटाई, भूगर्भीय रूप से कमजोर क्षेत्रों में ढलानों को अस्थिर करती हैं। मुख्य केंद्रीय थ्रस्ट जोन, जहां चट्टानें टूटी-फूटी हैं, में धराली जैसे स्थानों पर भगीरथी के पास निर्माण ने मलबा बहाव को बढ़ाया है। सिक्किम का तीस्ता-तृतीय बांध, जो 2023 में नष्ट हुआ, इसका एक और उदाहरण है।

हर आपदा में गाड़ गदेरों की भूमिका

इन आपदाओं के ऐतिहासिक उदाहरण इस क्षेत्र की भेद्यता को रेखांकित करते हैं। अगस्त 2025 में धराली में खीर गाड़ से आई त्वरित बाढ़ ने बाजार को बहा दिया, जिसमें बड़ी संख्या में जनहानि हुयी है। खीर गाड़ ने भगीरथी को मुखवा की ओर धकेल दिया, जिससे नदी का प्रवाह प्रभावित हुआ। 1978 में कनोडिया गाड़ ने डबरानी में झील बनाकर भगीरथी को रोका, जिसके टूटने से भयंकर बाढ़ आई। 1970 की अलकनंदा बाढ़ में बिरही गाड़, पाताल गंगा, और अन्य नालों ने मलबा लाकर तबाही मचाई। फरबरी 2021 में ऋषि गंगा और धैलीगंगा गाड़ में रॉक अवलांच और ग्लेशियर पिघलने से 200 से अधिक लोग मरे और तपोवन हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट नष्ट हुआ। 2013 की केदारनाथ त्रासदी में चोराबारी ताल टूटने और छोटे नालों के मलबे ने मंदाकिनी घाटी को तबाह किया, जिसमें 5,700 से अधिक लोग मरे। 1998 में पिथौरागढ़ के मालपा में मालपा गाड़ की बाढ़ ने 221 लोगों की जान ली। किस्तवार के चशोती में 14-15 अगस्त 2025 को नालों से बाढ़ ने दर्जनों लोगों की जान ले ली और गांव बह गए। अन्य उदाहरणों में अस्सी गंगा (2010), रौंटी गाड़ (चमोली 2021, 200 मौतें), और लद्दाख 2010 (234 मौतें) शामिल हैं।

आपदाओं का बहुआयामी उपाय जरूरी

इन आपदाओं को कम करने के लिए बहुआयामी उपाय जरूरी हैं। भारतीय मौसम विभाग के भारी वर्षा अलर्ट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित नाउकास्टिंग, और रडार नेटवर्क का विस्तार प्रभावी चेतावनी प्रणालियां बना सकता है। समुदाय-आधारित अलर्ट, जैसे रातू नदी पर अपस्ट्रीम-डाउनस्ट्रीम चेतावनी, और सीमा पार सहयोग (चीन-नेपाल मॉडल) जीवन बचा सकता है। विकास से पहले भूगर्भीय जांच, जोखिम जोनिंग, और सख्त भूमि उपयोग नियम जरूरी हैं। मलबा-प्रवाह क्षेत्रों पर निर्माण प्रतिबंधित करना होगा। जलवायु-सुरक्षित सड़कें, पुल, चेक डैम, और ढलान स्थिरीकरण के साथ-साथ वृहद वृक्षारोपण और पारंपरिक जल संचयन प्राकृतिक बफर प्रदान करेंगे। स्थानीय समुदायों की क्षमता निर्माण, बीमा, और आजीविका विविधीकरण से लचीलापन बढ़ेगा। रक्षा बलों और राज्य सरकारों का राष्ट्रीय स्तर पर एकीकरण, नेपाल-भूटान जैसे देशों के लचीलापन मॉडल को अपनाकर, दीर्घकालिक रोकथाम सुनिश्चित करेगा।

धराली से किश्तवार तक पश्चिमी हिमालय में छोटी नदियां और नाले के समूचे जलतंत्र का व्यापक अध्ययन किये जाने की जरूरत है। इसके साथ ही समस्त नदी नालों का जलागम प्रबंधन पर जोर दिये जाने की जरूरत है। इन गाड़ गदेरों पर छोटे चेक डैम न केवल जलप्रवाह की तीब्रता को रोकेंगे बल्कि धरती के अन्दर पानी जाने से नये जलश्रोत निकलेंगे। यह जलसंरक्षण का भी काम करेगा।इस काम में ग्रामीणों को रोजगार भी मिलेगा। इसके साथ ही वृक्षारोपण और उन्नत चेतावनी प्रणालियां जोखिम कम कर सकती हैं। सरकारी इच्छाशक्ति और निवेश के साथ इन उपायों से हिमालयी समुदायों को सुरक्षित किया जा सकता है।

 

 

 

 

 

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