आपदा/दुर्घटनाब्लॉग

त्रासदी से समाधान तक: मीडिया को उत्तराखंड भूस्खलन की कवरेज पर पुनर्विचार क्यों करना चाहिए ?

-न्यूज़राइटर्स.इन संपादकीय डेस्क-

पिछले कुछ महीनों में उत्तराखंड ने भयंकर भूस्खलनों की एक श्रृंखला देखी है, जिनसे जनहानि, संपत्ति का नुकसान और व्यापक स्तर पर जनजीवन अस्त-व्यस्त हुआ है। दुर्भाग्यवश, ऐसी त्रासदियाँ अब हिमालयी क्षेत्र के नाज़ुक पारिस्थितिक संतुलन की लगभग नियमित याद दिलाने वाली बन चुकी हैं। जब भी इस तरह की कोई बड़ी आपदा आती है, तो सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक क्षेत्रों में पर्यावरणीय क्षरण, अव्यवस्थित शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन को लेकर बहसें तेज़ हो जाती हैं। मीडिया में भी ऐसे समय पर कवरेज व्यापक होता है, लेकिन जैसे ही आपदा की तात्कालिक त्रासदी जनता के ध्यान से ओझल होती है, रिपोर्टिंग कम हो जाती है, जिससे बहसें अधूरी रह जाती हैं और जनजागरूकता सीमित रह जाती है।

यह रिपोर्टिंग पैटर्न तथाकथित “संघर्ष पत्रकारिता” (Conflict Journalism) की प्रवृत्ति को दर्शाता है, जो गहराई से विश्लेषण या रचनात्मक विमर्श की बजाय सनसनीखेज़ घटनाओं, विवादों और आरोप-प्रत्यारोप पर ज़्यादा केंद्रित होती है। हालांकि संघर्ष पत्रकारिता संकटों के प्रति सरकार और जनता का ध्यान आकर्षित करने में मदद कर सकती है, लेकिन यह अक्सर समाधान, रोकथाम के उपायों और दीर्घकालिक परिणामों की जानकारी देने का अवसर खो देती है।

उत्तराखंड में बार-बार होने वाले भूस्खलनों के संदर्भ में “सॉल्यूशंस जर्नलिज़्म” (Solutions Journalism) यानी “समाधान आधारित पत्रकारिता” एक अधिक प्रभावशाली दृष्टिकोण हो सकता है। यदि मीडिया टिकाऊ विकास के उदाहरणों, प्रभावी आपदा प्रबंधन रणनीतियों और समुदाय-आधारित अनुकूलन प्रयासों को प्रमुखता दे, तो वह केवल विनाश की रिपोर्टिंग तक सीमित न रहकर तैयारी और लचीलापन (resilience) को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभा सकता है।

स्थानीय स्तर पर भी जलवायु परिवर्तन के असर अब स्पष्ट रूप से महसूस किए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, मसूरी के निवासी याद करते हैं कि कभी वहाँ की गर्मियाँ इतनी हल्की होती थीं कि जून-जुलाई में भी हल्के ऊनी कपड़ों की ज़रूरत पड़ती थी। आज वहीं की गर्मियाँ स्पष्ट रूप से अधिक गर्म हो चुकी हैं। इस परिवर्तन ने स्थानीय पारिस्थितिकी, जल स्रोतों और कृषि पर असर डाला है। मौसम के इन सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण बदलावों से यह स्पष्ट होता है कि जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए नीतिगत और जनस्तरीय पहल अब बेहद आवश्यक हो गई है।

विशेषज्ञों का मत है कि बार-बार होने वाले भूस्खलन केवल “प्राकृतिक आपदाएँ” नहीं हैं, बल्कि वे पर्यावरणीय असुरक्षा और मानवीय गतिविधियों—जैसे वनों की कटाई, अव्यवस्थित निर्माण और अपर्याप्त जल निकासी व्यवस्था—का संयुक्त परिणाम हैं। हालांकि इन मुद्दों पर चर्चा हर आपदा के बाद होती है, लेकिन जोखिम न्यूनीकरण, बचाव रणनीतियों और जलवायु अनुकूलन उपायों पर दीर्घकालिक रिपोर्टिंग बहुत कम होती है।

मीडिया के लिए अब यह आवश्यक हो गया है कि वह केवल आपदा-विशेष रिपोर्टिंग तक सीमित न रहे, बल्कि समाधान-केन्द्रित पत्रकारिता अपनाए। ऐसा करने से पत्रकारिता न केवल समुदायों को संभावित जोखिमों के प्रति सतर्क कर सकती है, बल्कि नीति-निर्माताओं को अधिक टिकाऊ अवसंरचना लागू करने और नागरिकों को पर्यावरण-संवेदनशील जीवनशैली अपनाने के लिए भी प्रेरित कर सकती है।

उत्तराखंड के नाज़ुक पर्वतीय भूगोल में, जहाँ पहाड़, नदियाँ और मानव बस्तियाँ एक नाज़ुक संतुलन में सह-अस्तित्व रखती हैं, पत्रकारिता का यह बदलाव—संघर्ष से समाधान की ओर—केवल वांछनीय ही नहीं, बल्कि अत्यंत आवश्यक है।

फ़ोटो: विनय मांडा

( उत्तराखंड के परिपेक्ष में अति महत्व को देखते हुए न्यूज़राइटर्स.इन के इस मूल अंग्रेजी लेख को साभार अनूदित कर हिंदी में अपने पाठकों के लिए इस पोर्टल में पेश किया जा रहा है– उषा रावत, एडमिन)

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