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घस्यारी योजना फेल: जंगली जानवरों के डर से जंगल नहीं जा रहीं महिलाएं, पहाड़ में पशुओं के चारे का गंभीर संकट

गौचर से दिग्पाल गुसाईं –

पशुपालन के क्षेत्र में श्वेत क्रांति को बढ़ावा देने और महिलाओं की जंगलों पर निर्भरता समाप्त करने के उद्देश्य से शुरू की गई मुख्यमंत्री घस्यारी योजना जमीनी स्तर पर पूरी तरह से टांय-टांय फिस होती नजर आ रही है। जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक के कारण ग्रामीण महिलाएं अब जंगल जाने से कतरा रही हैं, जिससे काश्तकारों के सामने पशुओं के चारे का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

पहाड़ी क्षेत्रों में दुग्ध उत्पादन की क्षमता बढ़ाकर लोगों को आत्मनिर्भर बनाने और महिलाओं को जंगल जाने की मजबूरी से मुक्त करने के उद्देश्य से कुछ वर्ष पूर्व देहरादून में केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह के हाथों मुख्यमंत्री घस्यारी योजना का शुभारंभ किया गया था। योजना के तहत दो रुपये प्रति किलो की दर से हरी घास (साइलेज) उपलब्ध कराने का दावा किया गया था, जिससे पशुपालकों की समस्याएं काफी हद तक कम होने की उम्मीद थी। लेकिन हकीकत यह है कि काश्तकारों को लंबे समय से इस योजना के तहत हरी घास उपलब्ध नहीं कराई जा रही है, जिससे न केवल दुग्ध उत्पादन प्रभावित हो रहा है, बल्कि पशुओं के भरण-पोषण का भी संकट गहराता जा रहा है।

वर्तमान हालात में बाघों और भालुओं की लगातार मौजूदगी के चलते ग्रामीण महिलाएं जंगल जाने का जोखिम नहीं उठा पा रही हैं। बताया जा रहा है कि सरकार द्वारा हरी घास (साइलेज) की आपूर्ति करने वाली फर्म और ट्रांसपोर्टर को पिछले तीन महीनों से सब्सिडी का भुगतान नहीं किया गया है। भुगतान न मिलने से संबंधित कंपनियों ने आपूर्ति से हाथ खींच लिए हैं। इस संबंध में हरी घास सप्लाई करने वाली कंपनी के प्रबंधक से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी।

दूसरी ओर, पशुओं को भूख से बचाने के लिए राहत के तौर पर सस्ते दामों पर सूखा भूसा उपलब्ध कराया जाता था। पशुपालन विभाग के माध्यम से यह भूसा कुछ वर्षों तक नियमित रूप से वितरित होता रहा, लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों से इसकी कीमत चार गुना बढ़ने के बावजूद भी भूसा उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है। इस स्थिति ने पहाड़ के पशुपालकों को गहरे संकट में डाल दिया है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि कई पशुपालक अपने दुधारू पशुओं को औने-पौने दामों में बेचने को मजबूर हो रहे हैं।

साइलेज एंड एथनिक काउज प्राइवेट कंपनी का कहना है कि पिछले तीन महीनों से भुगतान न होने के कारण उन्हें कच्चा माल मंगाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे आगे आपूर्ति जारी रखना संभव नहीं हो पा रहा है।

प्रगतिशील काश्तकार विजया गुसाईं, कंचन कनवासी, जशदेई कनवासी, भागवत भंडारी, रमेश डिमरी, नंदा गौरा योजना के तहत दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में सम्मानित नौटी गांव की नीमा मैठाणी, आदिबद्री के हरीश रावत, बमोथ के पूर्व प्रधान प्रकाश रावत तथा क्वींठी के कमल रावत सहित अन्य पशुपालकों का कहना है कि मुख्यमंत्री घस्यारी योजना के तहत हरी घास और भूसा न मिलने से उनके सामने पशुओं के भरण-पोषण का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

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