दोस्त की महिमा का गायन ……

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा
दोस्त की प्रशंसा में आत्मीयता सबसे पहले प्रदर्शित होती है I गीता के इस श्लोक को हम जाने कितनी बार बोलते और सुनते आएं हैं लेकिन इस “अजानता ” शब्द पर ध्यान आज ही गया कि अरे !यह “जानता” और “अजानता” शब्द दोनों ही संस्कृत के हैं – जैसे लोग बोलते हैं कि घर की मुर्गी दाल बराबर जब चाहे तब खाएं ऐसे ही ये जानता और अजानता शब्द भी हैं ई
मुझ जैसे साधारण बुद्धि के लोग सोचते आये हैं कि संस्कृत भाषा तो क्लिष्ट होती है उसमें साधारण लोगों द्वारा बोले जाने वाले शब्द बहुत कम प्रयुक्त होते हैं लेकिन यह ग़लतफ़हमी कभी स्वतः दूर हो जाती है I कृष्ण कह रहे हैं कि मैंने आपको हमेशा अपना यादव भाई अपनी बुआ का बेटा ही माना और हम शुरू से दोस्त भी हैं लेकिन यह नहीं जानता था कि तुममें इतने ईश्वरीय गुण हैं -इसलिए भाई, मेरे मुझे माफ़ करना, न जाने मैं आपको मजाक में क्या क्या न कह गया हूँगा आज तक –
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।।४१।। अध्याय ११ भगवद्गीता –
गीता में कृष्ण ने एक जगह यह भी सुना दिया था अर्जुन को-
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् |
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्र्वरम् || ११ || – जब मैं मनुष्य रूप में अवतरित होता हूँ, तो मूर्ख मेरा उपहास करते हैं |
तुलसीदास जी ने भी मानस में इस जानता शब्द को इस तरह प्रयोग किया है-
जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी॥ जो कोसलपति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना॥- हे स्वामी! आपको जो सगुण, निर्गुण और अंतर्यामी जानते हों, वे जाना करें, मेरे हृदय में तो कोसलपति कमलनयन राम ही अपना घर बनावें।॥ —
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन।। वही आपको जानता है, जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है। हे रघुनंदन! हे भक्तों के हृदय को शीतल करने वाले चंदन! आपकी ही कृपा से भक्त आपको जान पाते हैं॥–
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