कांग्रेस की रैली – आगाज तो अच्छा है, अंजाम राम जानें

-दिनेश शास्त्री-
राजभवन कूच के शानदार पॉलिटिकल इवेंट से कांग्रेस गदगद है। सोलह फरवरी को जिस तरह से प्रदेश के कोने कोने से लोगों का देहरादून के परेड ग्राउंड में जमावड़ा लगा, वह गणेश गोदियाल के लिए एक तरह से संजीवनी थी। कह सकते हैं कि इस आयोजन से गोदियाल ने एक तरह से मृतप्राय पार्टी में जान फूंक दी। अगर अगले आठ दस महीने इसी तरह पार्टी में जोश और जज्बा बना रहा तो सत्तारूढ़ भाजपा को नए सिरे से अपनी रणनीति बनानी पड़ सकती है। गोदियाल ने बीते नवम्बर में ही पार्टी की कमान संभाली है। भाजपा शायद अनुमान लगा रही होगी कि गोदियाल पहले भी एक बार कमान संभाल चुके हैं और तब कारगर सिद्ध भी नहीं हो पाए थे। उसके कई सारे कारण गिनाए जा सकते हैं किंतु इस बार गोदियाल के पास पिछली कमियों का अनुभव है तो उन्होंने बहुत सलीके से पार्टी नेताओं को एकजुट रखने में सफलता जरूर हासिल की है।
इसमें दो राय नहीं कि भीड़ वोट का पैमाना नहीं होती है किंतु भीड़ माहौल जरूर बनाती है। उत्तराखंड में पिछले नौ साल से कांग्रेस वनवास झेल रही है। 2022 के चुनाव में पराजय के बाद उसके हिस्से हर मोड़ पर नाकामियां ही आई। पहले लोकसभा चुनाव में सूपड़ा साफ हुआ, फिर निकाय चुनाव में मुंह की खाई और उसके बाद पंचायत चुनाव में औंधे मुंह गिरी। देहरादून जिला पंचायत को छोड़ उसे कहीं और सफलता नहीं मिली। देहरादून जिले को आप अपवाद मान सकते हैं। यानी गांव से लेकर प्रदेश तक कांग्रेस बेहद विपन्न स्थिति में है। ऐसे समय पर जब गोदियाल को पार्टी की कमान मिली तो बहुत ज्यादा उम्मीदें भी नहीं थी लेकिन हाई कमान ने जो भरोसा उन पर जताया, उससे लग रहा है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अपनी स्थिति सुधार सकती है।
भाजपा पिछले नौ साल से सत्ता में है, उसके खाते में अनेक उपलब्धियां हैं तो साथ ही नाकामियां भी हैं। खासकर कानून व्यवस्था की जो स्थिति इस नए साल में दिखी, वह चिंताजनक जरूर रही है। हाल के दिनों में अस्थाई राजधानी देहरादून में ही एक के बाद एक करके छह हत्याओं से लोगों का भरोसा सा खत्म हो गया था। आनन फानन में पुलिस कप्तान बदले गए, कुछ डीएम भी बदले जो अपयश जुड़ना था, वह तो सरकार के खाते में जमा हो ही गया। उधर अंकिता भंडारी प्रकरण को भी विभिन्न जनसंगठन लगातार उठाते आ रहे हैं। इस बीच सत्रह फरवरी को चर्चित उर्मिला सनावर और पूर्व भाजपा विधायक सुरेश राठौर का एक और वीडियो सोशल मीडिया पर तैरने लगा। उस ऑडियो क्लिप के बारे में दावे से कुछ कहा नहीं जा सकता और न ही उसकी प्रामाणिकता की गारंटी ली जा सकती है, क्योंकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से ऐसे काम भी खूब हो रहे हैं लेकिन एक बार फिर ऑडियो क्लिप ने राजनीति के बाजार में मामले को ताजा जरूर कर दिया है। कांग्रेस इस मामले को लेकर पहले से हमलावर रही है। उर्मिला सनावर की क्लिप ने कांग्रेस की बात को ही बल दिया है।
बहरहाल पिछले एक महीने से कांग्रेस राजभवन कूच का ताना बाना बुन रही थी और एक पखवाड़े से उसने तैयारियों को तेज भी कर दिया था। आशंका जताई जा रही थी कि गुटों में बंटी कांग्रेस शायद ही एकजुटता के साथ दमदार प्रदर्शन कर सके लेकिन सोमवार के इवेंट में उसने फुल मार्क्स बटोर लिए हैं। कांग्रेस ने राजभवन कूच के लिए जो मुद्दे उठाए थे, वह कमोबेश प्रदेश के सभी वर्गों से जुड़े थे। खासकर महिलाओं की सुरक्षा और अस्मिता, कानून व्यवस्था, बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की पीड़ा और पहाड़ों में वन्य जीवों का आतंक जैसे तमाम मुद्दों को लेकर परेड ग्राउंड में बड़े लम्बे अर्से बाद कांग्रेस दिखी। हालांकि जैसा आमतौर पर होता रहा है कि इस आयोजन को लेकर पार्टी नेता शुरू में अपनी अपनी राह चल रहे थे। आयोजन के संयोजन को लेकर शुरू में कुछ नेताओं ने नाक भौं सिकोड़ी थी किन्तु हाई कमान की सख्ती से आखिरकार सब ठीक हो गया। काफी दिनों बाद कांग्रेसियों की एकजुटता ने काफी कुछ बयान कर दिया है। देखा जाए तो अन्य प्रदेशों की तुलना में उत्तराखंड में कांग्रेस का जनाधार है, यह अलग बात है कि उसने हिम्मत सी हारी हुई थी। पिछले चार साल से पार्टी संगठन बिखरा हुआ सा है। अभी तक गोदियाल की खुद की टीम ठीक से नहीं बन पाई है। जिलों से लेकर गांवों तक संगठन खड़ा होना है। बूथ स्तर पर तो उसे भाजपा की बराबरी करने के लिए बहुत मेहनत करनी होगी। पिछले साल संगठन सृजन अभियान के दौरान रुद्रपुर तथा कुछ अन्य जगहों पर पार्टी में जो अंतर्विरोध उभर कर आए थे, वह लगभग सभी जगहों पर हैं। दूसरे उसके कई कद्दावर नेता भाजपा में चले गए हैं। इस हिसाब से उसे कई स्थानों पर दमदार प्रत्याशियों की कमी का सामना भी करना पड़ सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के पास कोई चुंबकीय नेतृत्व भी नहीं है जो लोगों की वापसी करवा सके। अलबत्ता प्रदेश में उसके पास नेताओं की बड़ी कतार है। उत्तराखंड में जो कुछ करना है, इसी टीम को करना है। तभी कहा जा रहा है कि सोलह फरवरी का आगाज तो अच्छा था।
यह भी बताते चलें कि कांग्रेस की बड़ी कमजोरी यह है कि उसके पास समर्पित कार्यकर्ता कम हैं और नेता ज्यादा और नेताओं की अपनी महत्वाकांक्षा ज्यादा होती है। हर नेता चुनाव लड़ने का इच्छुक होता है, यह स्वाभाविक भी है किंतु मतदाता को बूथ स्तर तक लाए कौन? यह उसके सामने कड़ी चुनौती है। गोदियाल इस चुनौती का सामना कैसे कर पाते हैं, इस पर सबकी नजर रहेगी।
इतना तय है कि कांग्रेस के सोलह फरवरी के जमावड़े की राजनीतिक क्षेत्रों में चर्चा लम्बे समय तक बनी रहेगी और खासकर भाजपा जब तक इससे बड़ी लकीर नहीं खींच लेती तब तक यही चर्चा रहेगी।
राजनीति के जानकार मानते हैं कि कांग्रेस को जनता कम खारिज करती है, उसके नेता ज्यादा। देखना यह है कि गोदियाल इस चुनौती से कैसे पार पाते हैं क्योंकि अगर इस बार कांग्रेस चूक गई तो उत्तराखंड में वह हमेशा के लिए इतिहास का विषय बन जाएगी क्योंकि उसके बाद भाजपा इस कदर अजेय हो जाएगी जैसे गुजरात में नब्बे के दशक में हुए परिवर्तन के बाद उसने कांग्रेस को सत्ता के करीब फटकने तक नहीं दिया है। आगाज से अंजाम तक के सफर में क्या कुछ मोड़ देखने को मिलेंगे, यह देखना निश्चित रूप से दिलचस्प होगा क्योंकि कांग्रेस के पास ये करो या मरो का मौका है। यानी इस बार नहीं तो फिर कभी नहीं। अभी तक का इतिहास यही बताता है कि कांग्रेस अपनों के कारण ही कई बार जीती हुई बाजी हारी है। चाहे निकाय चुनाव हो या पंचायत चुनाव या फिर विधानसभा का चुनाव। हालांकि इस परेशानी से भाजपा भी मुक्त नहीं है किंतु उसके पास एक तंत्र है जो बिगड़ी बात को बनाने में सफल हो जाता है। कांग्रेस को इस लिहाज से पहले अपना घर भी दुरुस्त करना है। गोदियाल इस अग्निपरीक्षा में कहां तक सफल होंगे, यह उनके कौशल पर निर्भर करेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं इस न्यूज़ पोर्टल के संपादक मंडल के मानद सदस्य हैं। -एडमिन)
