राष्ट्रीयस्वास्थ्य

कैंसर की दवाओं समेत जीवन रक्षक औषधियों पर सरकार का कड़ा रुख: 131 कैंसर-रोधी दवाओं की अधिकतम कीमतें तय

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने देश में स्वास्थ्य सेवाओं को सस्ता और सुलभ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं सहित अन्य आवश्यक औषधियों की कीमतों पर कड़ा नियंत्रण लागू कर दिया है। केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री श्री जगत प्रकाश नड्डा और राज्य मंत्री श्रीमती अनुप्रिया पटेल ने संसद के माध्यम से देश को सूचित किया है कि सरकार का मुख्य उद्देश्य आम नागरिक को उचित मूल्य पर दवाएं उपलब्ध कराना है। इसके तहत औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 (डीपीसीओ) के प्रावधानों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जा रहा है, ताकि दवा कंपनियां मनमाने ढंग से कीमतें न बढ़ा सकें।

कैंसर दवाओं के लिए विशेष मूल्य निर्धारण और विनियमन

कैंसर के उपचार में काम आने वाली ऑन्कोलॉजी दवाओं को सरकार ने विशेष प्राथमिकता दी है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने अब तक डीपीसीओ की अनुसूची-I के तहत सूचीबद्ध 131 कैंसर-रोधी अनुसूचित फॉर्मूलेशन की अधिकतम कीमतें निर्धारित कर दी हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब इन दवाओं के सभी निर्माताओं, चाहे वे ब्रांडेड दवाएं बनाते हों या जेनेरिक, उन्हें अपने उत्पाद एनपीपीए द्वारा तय की गई अधिकतम सीमा के भीतर ही बेचने होंगे। इसके अलावा, 27 जनवरी 2026 तक एंटी-कैंसर श्रेणी के तहत 54 नई दवाओं की खुदरा कीमतें भी तय की जा चुकी हैं। जो दवाएं अनुसूचित श्रेणी में नहीं आती हैं, उनकी भी निरंतर निगरानी की जा रही है ताकि उनके निर्माता पिछले 12 महीनों की तुलना में 10 प्रतिशत से अधिक मूल्य वृद्धि न कर सकें। इस प्रकार, कैंसर के उपचार में उपयोग होने वाली लगभग सभी दवाओं को किसी न किसी रूप में सरकारी नियंत्रण के दायरे में लाया गया है।

दवाओं की कीमत तय करने का वैज्ञानिक आधार और नीति

देश में दवाओं की कीमतों का विनियमन राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण नीति, 2012 पर आधारित है। सरकार आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (एनएलईएम) प्रकाशित करती है, जिसे फार्मास्यूटिकल्स विभाग द्वारा आधिकारिक रूप से स्वीकार किया जाता है। किसी भी दवा की अधिकतम या खुदरा कीमत तय करने के लिए एक पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसके तहत बाजार डेटाबेस में मौजूद उन सभी ब्रांडों के औसत खुदरा मूल्य को आधार बनाया जाता है जिनकी बाजार हिस्सेदारी कम से कम एक प्रतिशत या उससे अधिक है। इस औसत मूल्य में 16 प्रतिशत का रिटेल मार्जिन जोड़कर अंतिम कीमत निर्धारित की जाती है। सरकार का मानना है कि यह नीति न केवल उपभोक्ताओं को सस्ती दवाएं सुनिश्चित करती है, बल्कि दवा उद्योग में नवाचार और प्रतिस्पर्धा के लिए भी पर्याप्त अवसर प्रदान करती है। हालांकि, कंपनियां अपनी लागत के आंकड़े स्वयं रखती हैं और विभाग इनका रखरखाव नहीं करता, क्योंकि यह पूरी व्यवस्था बाजार आधारित मूल्य निर्धारण के सिद्धांतों पर काम करती है।

जेनेरिक दवाओं की अनिवार्यता और डॉक्टरों के लिए सख्त निर्देश

सस्ते इलाज को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने जेनेरिक दवाओं के उपयोग पर विशेष बल दिया है। भारतीय चिकित्सा परिषद के विनियमों के अनुसार, प्रत्येक चिकित्सक के लिए यह अनिवार्य है कि वह दवाओं के जेनेरिक नाम स्पष्ट रूप से और अधिमानतः बड़े अक्षरों में लिखे। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय ने सभी केंद्रीय सरकारी अस्पतालों, सीजीएचएस डॉक्टरों और स्वास्थ्य केंद्रों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि वे केवल जेनेरिक दवाएं ही लिखें। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 के तहत राज्य चिकित्सा परिषदों को यह अधिकार दिया गया है कि वे उन डॉक्टरों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करें जो इन नियमों का उल्लंघन करते हैं। इसके अतिरिक्त, राज्यों को भी यह सलाह दी गई है कि वे सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में जेनेरिक दवाओं की पर्ची लिखने की व्यवस्था का नियमित ऑडिट करें ताकि इसकी प्रभावशीलता सुनिश्चित हो सके।

प्रतिबंधित दवाओं पर प्रतिबंध और कानूनी कार्रवाई का प्रावधान

जन स्वास्थ्य की सुरक्षा को देखते हुए केंद्र सरकार ने अब तक मानव उपयोग के लिए 603 दवाओं और निश्चित खुराक संयोजनों (एफडीसी) तथा पशुओं के लिए 40 दवाओं के निर्माण और वितरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। इन प्रतिबंधित दवाओं की सूची केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) की आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक की गई है। देश में इन प्रतिबंधित दवाओं का निर्माण या बिक्री करना औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940 के तहत एक गंभीर दंडनीय अपराध है। राज्य सरकारों द्वारा नियुक्त लाइसेंसिंग प्राधिकरणों को ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। यदि किसी प्रतिबंधित दवा की बिक्री के संबंध में कोई शिकायत प्राप्त होती है, तो उसे तुरंत राज्य औषधि नियंत्रक के पास आवश्यक कानूनी कार्रवाई के लिए भेजा जाता है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि दवाओं की गुणवत्ता और उचित मूल्य से किसी भी स्तर पर समझौता नहीं किया जाएगा।

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