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सरकार ने वापस लिया ‘संचार साथी’ ऐप प्रीलोड करने का विवादास्पद फैसला

अब नई डिवाइस में अनिवार्य नहीं होगा ऐप, यूज़र खुद डाउनलोड कर सकेंगे

नई दिल्ली, ४ दिसंबर । दूरसंचार मंत्रालय ने मंगलवार देर रात बड़ा यू-टर्न लेते हुए ‘संचार साथी’ ऐप को सभी नए और मौजूदा स्मार्टफोन में अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टॉल करने के अपने फैसले को पूरी तरह वापस ले लिया। अब मोबाइल निर्माता कंपनियों पर इस ऐप को डिफॉल्ट रूप से इंस्टॉल करने का कोई दबाव नहीं रहेगा। यूज़र चाहें तो गूगल प्ले स्टोर या ऐप स्टोर से इसे स्वेच्छा से डाउनलोड कर सकेंगे और इंस्टॉल करने के बाद कभी भी अनइंस्टॉल भी कर सकेंगे।

मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “जनता की गोपनीयता संबंधी चिंताओं और डिजिटल अधिकार समूहों के विरोध को देखते हुए हमने यह फैसला लिया है। पिछले छह महीनों में ऐप को १.४ करोड़ से अधिक लोग स्वेच्छा से डाउनलोड कर चुके हैं और रोज़ाना करीब २,००० साइबर फ्रॉड की शिकायतें आ रही हैं। इससे साबित होता है कि जनता इसे उपयोगी मान रही है, इसलिए जबरन प्रीलोडिंग की ज़रूरत नहीं रही।”

सिर्फ़ तीन दिन में पलटा फैसला

  • २९ नवंबर को मंत्रालय ने सभी स्मार्टफोन निर्माताओं को निर्देश जारी किया था कि ९० दिनों के अंदर सभी नई डिवाइस में संचार साथी ऐप प्री-इंस्टॉल करना अनिवार्य होगा।
  • १ दिसंबर से सोशल मीडिया पर #UninstallSancharSaathi और #PrivacyMatters जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।
  • विपक्षी दलों ने इसे “डिजिटल तानाशाही” और “निगरानी ऐप” करार दिया।
  • एप्पल और गूगल ने स्पष्ट कर दिया था कि वे अपनी गोपनीयता नीतियों के कारण इस निर्देश का पालन नहीं करेंगे।
  • भारी दबाव के बाद ३ दिसंबर की रात मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी कर फैसला वापस ले लिया।

ऐप अब भी उपलब्ध, सुविधाएं बरकरार

संचार साथी ऐप के ज़रिए यूज़र निम्न काम कर सकते हैं:

  • खोया या चोरी हुआ फोन ब्लॉक/ट्रैक करना (CEIR पोर्टल)
  • संदिग्ध कॉल और एसएमएस की रियल-टाइम चेतावनी
  • फर्जी सिम और केवाईसी धोखाधड़ी की शिकायत
  • चकमा (Chakshu) पोर्टल के ज़रिए फ्रॉड रिपोर्ट करना

मंत्रालय का कहना है कि ऐप में कोई बैकडोर या निगरानी फीचर नहीं है और यह पूरी तरह सुरक्षित है।

विशेषज्ञों ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया है। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन की कार्यकारी निदेशक अपर्णा भट्ट ने कहा, “यह दिखाता है कि जनता की आवाज़ और संवैधानिक अधिकार अभी भी मायने रखते हैं।”

अब देखना यह है कि स्वैच्छिक आधार पर संचार साथी की लोकप्रियता और बढ़ती है या विवाद के बाद यूज़र इसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

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