शिला-पट्टिकाओं में छुपा श्रीनगर गढ़वाल का इतिहास

– प्रो. (डॉ.) महेन्द्र प्रताप सिंह बिष्ट –
मित्रों,
यह शिला-पट्टिका इस बात का मूक किंतु ठोस प्रमाण है कि सन 1894 में बिरही झील (निजमुला घाटी, चमोली) के टूटने से अलकनंदा नदी का वेग इतना प्रचंड हो गया था कि उस समय गढ़वाल की राजधानी कहलाने वाला पुराना श्रीनगर—जो वर्तमान स्थान से लगभग डेढ़ से दो किलोमीटर पश्चिम में स्थित था (जहाँ आज एस.एस.बी. प्रशिक्षण केंद्र है)—पूरी तरह नष्ट हो गया।
इस विनाश के बाद तत्कालीन गढ़वाल कमिश्नर मिस्टर बो (Mr. Bo) ने अपने गृह नगर स्कॉटलैंड की तर्ज़ पर एक सुविचारित मास्टर प्लान तैयार कर नए श्रीनगर नगर की नींव रखी। यही शिला-पट्टिका उस ऐतिहासिक निर्णय और नगर-निर्माण की सजीव साक्षी है।

इस शिला पर अंकित कुछ शब्द आज भी पढ़े जा सकते हैं, किंतु इसके ऊपरी भाग में उर्दू लिपि में अंकित पाठ मेरे लिए अब तक अस्पष्ट है। इसमें गढ़वाली और उर्दू शब्दों का संयुक्त प्रयोग प्रतीत होता है। यदि कोई विद्वान या सज्जन इसका पाठ या अनुवाद करने में सहायता कर सकें, तो यह ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत उपयोगी होगा।
मित्रों, मैं वर्षों से इस शिला-लेख की तलाश में था। दरअसल, मैं 1803 के गढ़वाल भूकंप (जिसकी तीव्रता लगभग 7.8 मानी जाती है) से जुड़े ऐतिहासिक प्रमाणों का संकलन कर रहा हूँ। इसी शोध के क्रम में विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र श्री कमल सिंह रावत (ग्राम खंडाह) से भेंट हुई। कमल सिंह रावत का मैं विशेष आभार व्यक्त करता हूँ, जो देवलगढ़ और श्रीनगर क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहरों पर गहन अध्ययन कर रहे हैं। उन्हीं के माध्यम से मुझे इस महत्वपूर्ण शिला-पट्टिका की जानकारी मिली।
दुर्भाग्यवश, श्रीनगर की नई पीढ़ी इस अमूल्य धरोहर से लगभग अनभिज्ञ है, जबकि यह न केवल ऐतिहासिक, बल्कि वास्तु और नगर नियोजन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। कमल सिंह बताते हैं कि तत्कालीन श्रीनगर नगर को अत्यंत सुव्यवस्थित ढंग से बसाया गया था। प्रत्येक चौराहे पर गरुड़ की मूर्ति स्थापित की गई थी, जिसका प्रमाण गणेश बाजार के प्रारंभ में आज भी देखा जा सकता है। गढ़वाल नरेश को बोलंद बद्रीनाथ माना जाता था और गरुड़ भगवान विष्णु की सवारी हैं—यह वास्तु और आस्था का सुंदर संगम था।
नगर के केंद्र गोला बाजार को वास्तु शास्त्र के अनुसार पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण—चार खंडों में विभाजित किया गया। पूर्व दिशा में मंदिरों का निर्माण हुआ, पश्चिम दिशा में देवदासियों का स्थान निर्धारित था। प्रत्येक भूखंड लगभग 12×12 फीट का था और नगर को तीन मुख्य मार्गों में विभाजित किया गया। इस सुनियोजित नगर को बसने में कई वर्ष लगे। पुरानी राजधानी के पत्थरों को निकालकर नए नगर की सड़कों और आधार में प्रयोग किया गया।
मुझे आज भी स्पष्ट स्मरण है कि जहाँ आज बाजार की सड़कें हैं, उनके नीचे 10–12 फीट मोटे विशाल पत्थर दबे हुए हैं। नगर का निर्माण इस प्रकार किया गया था कि सड़क से डेढ़-दो फीट ऊँचाई पर भवन हों, जिससे वर्षा या पहाड़ से उतरने वाले पानी का प्रभाव घरों पर न पड़े। पानी की निकासी की अत्यंत सुंदर और प्रभावी व्यवस्था थी। आज, दुर्भाग्यवश, स्थिति ठीक इसके विपरीत दिखाई देती है। मेरे पास आज भी उस समय के श्रीनगर नगर के मास्टर प्लान का नक्शा सुरक्षित है।
कल जब मैं गोला पार्क पहुँचा, तो 26 जनवरी के उपलक्ष्य में कुछ कार्यकर्ता वहाँ सफ़ाई और माइक की व्यवस्था कर रहे थे। मैंने अवसर पाकर शिला-पट्टिका की तस्वीरें लेना शुरू किया। एक युवक ने पूछा—“सर, यह क्या है?” जब मैंने उसे इसका महत्व बताया, तो वह भी आश्चर्य से भर उठा और कहने लगा, “मैं इतने वर्षों से यहाँ काम करता हूँ, मुझे पता ही नहीं था कि यह इतनी महत्वपूर्ण चीज़ है।”
इसके बाद मैंने अपने पुराने सहपाठी एवं प्रतिष्ठित व्यापारी सुरेश उनियाल (सरस्वती पुस्तक भंडार) से भी चर्चा की। उन्हें भी इस शिला-पट्टिका की जानकारी नहीं थी। वहीं उपस्थित व्यापार सभा के अध्यक्ष दिनेश असवाल जी ने कहा—“डॉ. साहब, आपका धन्यवाद। आपने इतनी महत्वपूर्ण जानकारी साझा की।” उन्हें यह भी ज्ञात नहीं था कि उस शिला-पट्ट पर किसी देवी असवाल का नाम अंकित है—संभव है वह उनके ही किसी पूर्वज, काश्तकार या कार्यकर्ता का नाम हो।
मित्रों, मुझे दृढ़ विश्वास है कि अब समय आ गया है कि हम अपने इन ऐतिहासिक स्थलों, शिला-लेखों और दस्तावेजों का संरक्षण करें। यही धरोहरें आने वाली पीढ़ियों को अपने अतीत से जोड़ेंगी और उन्हें अपने शहर, अपने समाज और अपने इतिहास को समझने की दृष्टि देंगी।
