भारत की याद में लिखी किताब Holy Cow An Indian Adventure

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा
पेशे से रेडियो और टेलीविज़न पत्रकार सारा मैक्डोनाल्ड सिडनी ऑस्ट्रेलिया में पली बढ़ी एक लड़की है I १९८८ में वह भारत आई जब वह सिर्फ २२ -२४ साल की रही होगी और लगभग २२
महीने भारत मे उसका प्रवास रहा I उस दौरान उसने भारत के कोने -कोनों का खूब भ्रमण किया और एक किताब लिख डाली जिसका शीर्षक उसने ” Holy Cow-An Indian Adventure ” रखा ।
यह किताब खूब बिकी और चर्चा में भी रही , सो मैंने भी खरीदी क्योंकि मुझे यात्रा संस्मरण पढ़ने का बहुत शौक है , २००९ में मैंने बंगलौर में “बुक वर्ल्ड ” में यह किताब खरीदी थी । युवा वर्ग ने इसे खूब पढ़ा I यह भारत के बारे में कोई गंभीर पुस्तक तो नहीं कह सकते है लेकिन हलके- फुल्के मनोरंजन के साथ यात्रा संस्मरण के हिसाब से दिलचस्प जरूर है ।
युवा लोगों को सहज ही हंसी आ जाती है जबकि हम बुजुर्ग लोगों को कोई हल्का- फुल्का मजाक भी मुश्किल से पचता है । Puritans (पवित्रवादियों) ने तो इस पुस्तक की खूब आलोचनात्मक समीक्षा अखबारों में लिखी लेकिन मैंने इसको कभी आराम के क्षणों में तो कभी गंभीरता से पढ़ने की कोशिश की है ,मुझे तो इस लड़की का प्रयास अच्छा लगा, बाकी रूचि अपनी अपनी होती है ।
एक झलक के तौर पर इस पुस्तक में वर्णित एक छोटी सी घटना को मैंने अपने मजे के लिए अनुवाद कर प्रस्तुत कर रहा हूँ –
“भारत के बारे में यह तो नहीं कहा जा सकता है कि यही सही दृष्टिकोण है कि यह मुल्क सभी बयानों से ऊपर है जो इसके उलट भी सही हो सकता है -यह भरपूर तौर पर समपन्न देश है और कहीं उतना ही गरीब भी है , जितना आध्यात्मिक है उतना ही भौतिकरूप से सांसारिक भी , निष्ठुर भी है तो अत्यंत दयालु भी , क्रोधी है मगर शांतिप्रिय भी , कहीं बदसूरत है तो सुन्दर भी है , चुस्त- दुरुस्त है तो कहीं बेवकूफ की तरह भी -यानी कुल मिला कर सभी बातों में चरम बिंदु पर टिका है ।
यहां आस्था और अनास्था के बीच एक गहरा समुद्र है, जहां शार्क मछलिया भरी पडी हैं जो आपको खींचकर समुद्र की तलहटी में पहुंचा देती हैं -कहीं मेरे अंदर छुपी खुशी को मेरा दिल फाड़ कर बाहर खींच लेती है और कहीं पीठ पीछे मेरी पीठ पर हिकारत में थूक देती है , यह हरकरत मुझे फिर नकारत्मकता की तलहटी में डुबो देती है । … ”
बनारस में काली पूजा करने वाली घटना मेरी यहाँ आखिरी पूजा थी । सुबह पांच बजे घुप अँधेरे में मैं एक छोटे से काली मन्दिर में बैठी थी , गहरी अंधेरी हवन कुण्डी में अग्नि प्रज्वलित थी, जिसकी रौशनी की चमक और छाया में पंडित का चेहरा दिखाई दे जाता था उसके पूरे माथे पर भभूति का लेप लगा था । उसके हाथ में एक छोटी घंटी बज रही थी जो सहज ही सबका ध्यान आकर्षित कर रही थी । धूप- बत्ती का धुंआं ऊपर उठ रहा था और देवी की तरफ सबका ध्यान आकर्षित कर रहा था , हमें ध्यानस्थ होने के लिए प्रेरित कर रहा था। वहां छोटे -छोटे समूहों में बैठे लोग संस्कृत के श्लोकों का पाठ करने में व्यस्त थे ।
मैं एक अद्धभुत सुखानुभूति में खोई हुई थी, कि तभी वातावरण में एक जोर का धमाका जैसे हुआ और उसी के साथ बदबू की एक भयानक लहर उठी -मेरे पीठ पीछे बैठी मोटी माता जी ने अपना पृष्ठ भाग ऊपर उठा कर फिर एक धमाका किया और उसके साथ ही जोर- जोर से ॐ ॐ ॐ का मन्त्र जपने लगी, ताकि उसके द्वारा पैदा किए हुए उस बदबूदार धमाके के स्वर से ध्यान हटाया जा सके। …. मुझे ऐसे घटनाएं खूब याद रहती है और हिंदुस्तान की याद दिला देती है। हिंदुस्तान वह धरती है जहाँ पवित्रता और अपवित्रता , आध्यात्मिकता और पाखण्ड दोनों साथ- साथ चलते हैं … जब मुझे हिंदुस्तान की याद आती है तो मुझे याद आता है इसमें छोटी -छोटी चीजों में सुंदरता ढूंढने की अपार क्षमता है I ”
सारा मैकडोनाल्ड लिखती है कि उसकी यह “भारत यात्रा” बहुत सुखद रही -यहीं उसके गर्भ में उसका बेटा आया इसलिए यह यात्रा उसके लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं थी — GPB
