श्रम कानूनों में बदलाव का पत्रकारों पर असर….

-अरुण श्रीवास्तव-
अब पत्रकारों की गिनती श्रमिकों में ही क्यों होती है यह तो नहीं पता और यह भी की श्रमजीवी कानून 1955 का गठन क्यों किया गया था किसके हित में किया गया था बावजूद इसके वह गवर्नर होते हैं इसी कानून के तहत जबकि अपनी शुरुआती दौर से ही पत्रकारिता में श्रमिकों से ज्यादा बुद्धिजीवी हुआ करते थे। मसलन साहित्यकार और बुद्धिजीवी भी अखबार निकालते रहे।
बहरहाल… श्रम कानून में आमूल चूल परिवर्तन की खबरों के बीच आखिरकार चार नए श्रम कानून ने 29 पुराने कानून की जगह ली। मुख्य धारा की मीडिया प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक सहित किसी ने भी इस श्रम कानून की कमियों के विषय में अपना मुंह नहीं खोला और वह खोलने भी क्यों क्योंकि एक तरफ सरकार ने विज्ञापनों के माध्यम से मालिकों के होंठ से रखे हैं वहीं दूसरी तरफ धीरे-धीरे करके सरकारों ने मजदूरी यूनियनों खासकर पत्रकारों के संगठनों को समाप्त किया। शायद ही कोई ऐसा अखबार हो जिसने इन श्रम कानूनों को अपने संपादकीय स्थान दिया हो! हां सरकार समर्थित मजदूर संगठन ने जरूर इसकी प्रशंसा में तारीफों के पुल बांधे। पुराने श्रम कानून के तहत अधिकांश लाभ मिलते ही रहे हैं। कुछ मामलों में नये श्रम कानूनों में बदलाव पत्रकारों की हालत को और भी कमजोर बनाते हैं। जैसे पहले जिन अखबारों में 300 से ज्यादा कर्मचारी हुआ करते थे उन्हीं को सरकार की अनुमति के बिना छंटनी की इजाजत नहीं लेनी होती थी, अब यह संख्या 100 कर दी गई है। पुराने श्रम कानूनों के तहत पत्रकारों को दिन की पारी में 6 घंटे और रात्रि की पारी में 8 घंटे काम करना पड़ता था अब इस तरह की कोई बाध्यता नहीं रह गई है। ओवर टाइम करवाने पर डबल वेतन देने का प्रावधान है।
श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम नेहरू सरकार ने बकायदे सदन में प्रस्तुत किया था और इस पर लंबी बहस भी हुई थी। यही नहीं यह कानून विचार के लिए जेपीसी को भी सौंपा गया था जबकि वर्तमान श्रम कानूनों में सुधार और उसकी संख्या सीमित करना सरकार की मनमानी शुरू से रही। इस कानून पर विपक्ष ने दोनों सदनों का बहिष्कार किया था। नाम के लिए 233 सुधारों में से 74% शामिल किए गए थे लेकिन विपक्ष ने इसे जल्दबाजी माना। यही नहीं जब पूरा देश या विश्व कॉविड-19 जैसी भी महामारी से जूझ रहा था तब हमारी केंद्र सरकार ने श्रम कानून में बदलाव संबंधी प्रस्ताव लाई और इस ऐतिहासिक सुधार बताया गया था जबकि विपक्ष का कहना था कि यह एकतरफा थी। सरकार ने तीन संहिताओं में 22 सितंबर 2020 को पेश किया। बहस की अवधि सिर्फ 5-6 घंटे ही रही। इस बहस में 20-25 सदस्यों के हस्तक्षेप के बीच तत्कालीन श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने जवाब दिया था।जुलाई 19 में मात्र दो-तीन घंटे ही बहस हुई। राज्यसभा में तीन संहिताएं 23 सितंबर 2020 को पारित कराई गईं और इस सदन में मात्र तीन-चार घंटे ही बहस हुई और कुछ सदस्यों को ही हस्तक्षेप का मौका मिला था। विपक्ष के बहिष्कार के कारण विपक्ष की संख्या शून्य। यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि कोविड जैसी विश्वव्यापी महामारी के मजदूरों की कथित हितैषी सरकार ने अगस्त 2019 में इस बिल को पेश किया था और बहस एक से दो घंटे ही हुई। आखिर केंद्र सरकार भी तो यही चाहती थी। इस कानून को राष्ट्रपति की सहमति 28 सितंबर 2020 को प्राप्त हुई। यानी आनन-फानन में ही सारा काम हुआ। ऐसे में यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि मोदी सरकार मजदूरों की कितनी हितैषी थी और है। हितेषी तो कभी भी कोई सरकार नहीं रही है। अपवाद स्वरूप जवाहरलाल नेहरू की सरकार। तो उसका कारण नई-नई आजादी मिलना भी रहा है और आजादी के आंदोलन में पत्रकारों की भूमिका। फिर नेहरू जी भी एक तरह से पत्रकार थे। बाकी सरकारों ने भी पत्रकारों के दमन उत्पीड़न का कोई भी मौका नहीं छोड़ा। सबसे भयानक उदाहरण तो आपातकाल के दौरान अभिव्यक्त की स्वतंत्रता पर लगाया गया अंकुश ही पर्याप्त है लेकिन इसकी आड़ में बिना आपातकाल लागू किये बगैर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोटने भी कम आपराधिक नहीं रहा। बिहार की जगन्नाथ मिश्र और राजीव गांधी सरकार ने भी पत्रकारों पर अंकुश लगाने के प्रयास किए थे लेकिन मोदी सरकार ने बचे खुचे रीढ़ वाले पत्रकारों को मिटाने काम कर रही है।
इसके पहले मशीनीकरण ने अन्य उद्योगों सहित पत्रकारिता की भी कमर तोड़ दी थी। मशीनीकरण ने कई विभागों को समाप्त किया जैसे पहले अधिकांश अखबारों में संपादकीय से संबंध प्रूफ विभाग हुआ करता था। कंप्यूटराइज्ड व्यवस्था ने इसे समाप्त किया। यही नहीं धीरे-धीरे डीटीपी (कम्पोज़िंग) और पेस्टिंग व्यवस्था भी समाप्त कर दी। पहले रिपोर्टर ख़बर लिखता था, डेस्क पर तैनात उप संपादक उसे समाचार का रूप देता था। कंपोजिंग के बाद प्रूफ रीडिंग गलतियां सुधारता था। पेस्ट करने वाले कर्मचारी अखबार की साइज़ वाले पेज पर संपादकीय विभाग की निगरानी में ख़बरें चिपकाते थे। तब मशीन संबंधी कार्य होते थे। आज़ डेस्क पर तैनात उप संपादक खबरें कंपोज़ करता है, गल्तियां भी पकड़ता है, कम्प्यूटर पर पेज़ (लेआउटिंग) लगाता है और पेज़ भी छोड़ता है। कहीं-कहीं तो अखबार छपने तक की गलतियों को भी ठीक करता है। रिपोर्टर का काम भी काम नहीं हुआ है वह विज्ञापन लाने का काम भी करता है और अखबार छाप जाने के बाद विज्ञापन का पेमेंट रुकने की स्थिति में विज्ञापन विभाग का सहयोग भी करता है। जिस रिपोर्टर की जो बीट हुआ करती है उसी को विज्ञापन की वसूली में सहयोग का जिम्मा भी दिया जाता है।
बात मुद्दे की यानी पुराने श्रम कानूनों में किए गए बदलावों की। विभागों का, इमारत का और सड़कों का नाम बदलने में महारत हासिल करने वाली मोदी सरकार ने 29 श्रम कानूनों को समेट कर चार में ‘निपटा’ दिया। पहले केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों तरह समय-समय पर पत्रकारों के लिए भी वेज बोर्ड का गठन हुआ करता था। नए श्रम सुधारों की आड़ में मोदी सरकार ने वेज बोर्ड के महत्व को ही बलाए ताक पर रख दिया। वेज बोर्ड में पत्रकारों की सेवा शर्तों सहित वेतन, अन्य भक्तों व परिलाभों में बड़े पैमानों पर सुधार हुआ करता था। अब तक पांच वेतन आयोग गठित हो चुके हैं हालांकि एक की संस्तुतियों को आज तक किसी अखबार ने लागू नहीं किया। अखबार इसलिए की वेज बोर्ड का गठन सिर्फ प्रिंट मीडिया के कर्मचारियों के लिए ही होता रहा है। वर्तमान श्रम कानून में वेज बोर्ड के गठन जैसी बात नहीं कही गई। कुल मिलाकर नया श्रम कानून पत्रकारों के लिए वेज बोर्ड जैसी सुरक्षा, अधिकार, वेतनमान अन्य परिलाभ या स्वतंत्रता नहीं देता है बल्कि यह कथित सुधार पत्रकारों की सुरक्षा पहले से भी का्म कर देता है। यह सुधार वेज बोर्ड की मजबूरी खत्म कर मालिकों को वेतन तय करने की स्वतंत्रता देता है। मजीठिया वेज बोर्ड जैसे बोर्ड वेतन बढ़ाने के लिए मालिकों को बाध्य करते थे। नए सुधारों में पेग्रेड, स्केल, वार्षिक वृद्धि, मेडिकल फेसिलिटी व एलटीसी जैसी कानूनी अनिवार्यता नहीं है। सब कुछ अखबार मालिकों पर निर्भर करता है। छंटनी और कॉन्ट्रैक्ट रोजगार भी इन सुधारों के तहत आसान हो गए हैं। इसमें फिक्स टर्म कॉन्ट्रैक्ट पूरी तरह से वैध माना गया है। कॉन्ट्रैक्ट खत्म करने पर किसी तरह का कोई हर्जाना नहीं देना होगा। परमानेंट कर्मचारी रखने की जरूरत बहुत कम हो गई है। पहले पत्रकारों को नौकरी से निकलना मुश्किल था। अगर पत्रकार नौकरी से निकाला जाता था तो श्रम कानून के तहत उसको पर्याप्त सुरक्षा मिली हुई थी। पहले पत्रकारों को निकालने के लिए नोटिस, कारण व मुआवजा जरूरी था। नया श्रम कानून पत्रकारों की विशेष श्रेणी को कम कर देता है। पहले नाम के लिए ही सही पत्रकार श्रमजीवी हुआ करते थे, उनके लिए विशेष एक्ट बनाए गए थे जो श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम-1955 के नाम से जाना जाता है। इस कानून में छुट्टी और टाइम नोटिस, ट्रांसफर छंटनी आदि के लिए अन्य श्रमिकों से हटकर अलग नियम हुआ करते थे। पहले लेबर इंस्पेक्टर नियमित निरीक्षण करने का नियम था। अभी यह अलग बात है कि नियमित निरीक्षण कागजों पर ही सिमट कर रह गया। वेज़ बोर्ड के तहत मालिक को रिकॉर्ड दिखने पढ़ते थे। अब अधिकांश निरीक्षण ऑनलाइन रेंडम हो गये हैं। शिकायत प्रक्रिया लंबी और जटिल हो गई है। ओवर टाइम अवकाश और काम के घंटे का दबाव भी कम हो गया है। साप्ताहिक अवकाश की गारंटी और अधिक कम पर ओवरटाइम अनिवार्य हुआ करता था अब पत्रकारों के लिए विशेष घंटे की व्यवस्था समाप्त कर दी गई है। लचीला कार्य समय का फायदा मालिकों को मिलेगा ओवरटाइम की धाराएं कमजोर कर दी गई हैं। लगभग सभी वेज बोर्ड पत्रकारिता उद्योग के हिसाब से अधिक वेतन तय करते थे। अब ऐसा नहीं होगा इसलिए की अब वेज़ बोर्ड गठन करने का नियम ही नहीं रह गया। यही हाल पत्रकार युनियन के नियमों का है। कर्मचारी की संख्या के हिसाब से पहले यूनियन का गठन होता था और स्ट्राइक की प्रक्रिया भी जटिल नहीं थी। हड़ताल के लिए नोटिस पीरियड भी बढ़ा दिया गया है। उल्लेखनीय है कि संविधान में मिले अधिकार के तहत हड़ताल का अधिकार मौलिक हुआ करता था। नाम के लिए ही सही पहले पत्रकार निकाले जाने पर लेबर कोर्ट हाई कोर्ट की शरण लेते थे। मालिकों पर भारी बकाया वेतन लगाया जाता था। अब जब वेज़ बोर्ड ही खत्म कर दिया गया है तो कर्मचारी नियोक्ता विवाद सामान्य श्रेणी में चला गया है। अन्य श्रमिकों की तरह ही पत्रकारों का कानूनी हक रह गया है। पहले श्रमज़ीवी पत्रकार अधिनियम के तहत पत्रकारों को विशेष अधिकार मिले थे जो इन सुधारों ने निगल लिए। पर शायद ही इसका असर हम जैसे “कागज़ी शेरों” पर पड़ेगा।
अंत में एक शेर अर्ज है…
“खुदा के घर से कुछ गधे फरार हो गए कुछ पकड़े गए बाकी पत्रकार हो गए”।
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अरुण श्रीवास्तव देहरादून
8218070103
