भारत विकसित देशों में प्रवासी डॉक्टरों का सबसे बड़ा और नर्सों का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत

भारतीय स्वास्थ्य पेशेवरों के बिना विकसित देशों की चिकित्सा व्यवस्था अधूरी
— uttarakhand himalaya-
भारतीय डॉक्टर और नर्स अब विकसित देशों की स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ बनते जा रहे हैं। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (Organisation for Economic Co-operation and Development – OECD) की सोमवार को जारी अंतरराष्ट्रीय प्रवासन परिदृश्य 2025 रिपोर्ट के अनुसार, भारत अब OECD सदस्य देशों में कार्यरत प्रवासी डॉक्टरों का सबसे बड़ा और नर्सों का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत बन गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 38 सदस्य देशों (अमेरिका, कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया सहित) के स्वास्थ्य तंत्र प्रवासी चिकित्सा पेशेवरों पर तेजी से निर्भर हो रहे हैं। यह प्रवृत्ति एक ओर वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए जीवनरेखा है, तो दूसरी ओर यह उसकी कमजोरी भी बन रही है।
भारत का वैश्विक स्वास्थ्य तंत्र में बढ़ता दबदबा
वर्ष 2020-21 में OECD सदस्य देशों में 98,857 भारतीय मूल के डॉक्टर और 1,22,400 भारतीय मूल की नर्सें कार्यरत थीं। यह 2000-01 की तुलना में क्रमशः 76 प्रतिशत और 435 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है।
वर्तमान में OECD देशों में कुल मिलाकर 8 लाख 30 हजार से अधिक विदेशी-जन्मे डॉक्टर और 18 लाख विदेशी-जन्मी नर्सें कार्यरत हैं, जो क्रमशः कुल कार्यबल का लगभग एक-चौथाई और एक-छठा हिस्सा हैं। इनमें से लगभग 40 प्रतिशत डॉक्टर और 37 प्रतिशत नर्सें एशियाई मूल की हैं।
डॉक्टरों के मामले में भारत, जर्मनी और चीन प्रमुख स्रोत देश हैं, जबकि नर्सों में फिलीपींस, भारत और पोलैंड शीर्ष तीन में हैं।
“यह कमी अस्थायी नहीं, संरचनात्मक है” — OECD
रिपोर्ट में कहा गया है —
> “प्रवासी डॉक्टर और नर्स OECD देशों के स्वास्थ्य तंत्र के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। यह कमी अस्थायी नहीं बल्कि संरचनात्मक है, और यदि अंतरराष्ट्रीय भर्ती जारी न रही तो यह संकट और गहराएगा।”
OECD का मानना है कि प्रवासन से न केवल श्रम-संकटों का समाधान होता है बल्कि यह सार्वजनिक सेवाओं पर बढ़ते दबाव को भी कम करता है तथा नए आने वाले पेशेवरों को श्रम-बाजार में समायोजित करने में मदद करता है। इसके लिए प्रभावी प्रवासन नीतियों की आवश्यकता बताई गई है।
कहाँ जाते हैं भारतीय डॉक्टर और नर्सें
भारतीय स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए प्रमुख गंतव्य देश हैं — यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया।
OECD रिपोर्ट में ‘विदेशी-जन्मे’ और ‘विदेश में प्रशिक्षित’ स्वास्थ्यकर्मियों के बीच अंतर किया गया है। विदेशी-जन्मे पेशेवरों की संख्या आमतौर पर अधिक होती है क्योंकि इसमें दूसरी पीढ़ी के प्रवासी और स्थानीय डिग्रीधारी लोग भी शामिल होते हैं।
2021-23 के दौरान OECD देशों में कुल 6,06,000 विदेशी-प्रशिक्षित डॉक्टर थे, जिनमें से 75,000 (12%) भारत में प्रशिक्षित थे। वहीं 7,33,000 विदेशी-प्रशिक्षित नर्सों में भारत की हिस्सेदारी 17 प्रतिशत (1,22,000) रही।
देशवार स्थिति : भारत का योगदान स्पष्ट
यूनाइटेड किंगडम में 17,250 भारत-प्रशिक्षित डॉक्टर कार्यरत थे, जो वहाँ के सभी विदेशी-प्रशिक्षित डॉक्टरों का 23 प्रतिशत हैं। यह ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) में भारत की निर्णायक भूमिका को रेखांकित करता है।
अमेरिका में 16,800 और कनाडा में 3,900 भारतीय डॉक्टर कार्यरत थे — क्रमशः 8 और 4 प्रतिशत।
ऑस्ट्रेलिया में 6,000 भारतीय डॉक्टर हैं, जो वहाँ के विदेशी-प्रशिक्षित डॉक्टरों का 10 प्रतिशत हैं।
नर्सों के मामले में —
- यूनाइटेड किंगडम में 36,000 भारतीय नर्सें (18%)
- अमेरिका में 55,000 (5%)
- कनाडा में 7,000 (14%)
- ऑस्ट्रेलिया में 8,000 (16%)
ये आँकड़े बताते हैं कि भारतीय नर्सें और डॉक्टर विश्व के सबसे विकसित देशों की स्वास्थ्य सेवाओं की आधारशिला बन चुके हैं।
भारत की प्रमुखता के पीछे कारण
OECD रिपोर्ट के अनुसार भारत की यह स्थिति कई कारकों के कारण है;-
1. चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था का विशाल ढांचा,
2. अंग्रेज़ी माध्यम में प्रशिक्षण,
3. और लक्षित द्विपक्षीय भर्ती नीतियाँ।
वर्ष 2000 से 2021 के बीच विदेशों में कार्यरत भारत-प्रशिक्षित नर्सों की संख्या चार गुना से अधिक बढ़ी — 23,000 से बढ़कर 1,22,000 तक। डॉक्टरों की संख्या भी 56,000 से बढ़कर 99,000 तक पहुँची।
‘ब्रेन ड्रेन’ की चिंता बरकरार
हालाँकि यह प्रवृत्ति भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को रेखांकित करती है, परंतु इसके साथ “मस्तिष्क पलायन” यानी ब्रेन ड्रेन की चिंता भी उतनी ही गंभीर है। भारत उन देशों में शामिल है जिन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अपनी हेल्थ वर्कफोर्स सपोर्ट एंड सेफगार्ड्स सूची में रखा है — अर्थात ऐसे देश जहाँ स्वास्थ्यकर्मियों की घरेलू उपलब्धता संकट में है।
इस रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि भारत का चिकित्सकीय कौशल वैश्विक स्तर पर उच्च सम्मान पा रहा है, परंतु इसी के साथ यह प्रश्न भी उठता है कि क्या देश अपने ही स्वास्थ्य तंत्र में इस विशेषज्ञता को रोक पाने में सक्षम है?
