पर्यावरणब्लॉग

हिमालय की हवा: अब सटीक माप संभव

 

जयसिंह रावत-
हिमालय को लंबे समय तक स्वच्छ हवा, शुद्ध जल और प्राकृतिक संतुलन का प्रतीक माना जाता रहा है, लेकिन बीते दो दशकों में यह धारणा तेजी से टूटती जा रही है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम और पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों में वायु प्रदूषण अब केवल मैदानी क्षेत्रों की समस्या नहीं रह गई है। पर्यटन दबाव, निर्माण गतिविधियां, वाहनों की बढ़ती संख्या, जलवायु परिवर्तन और जंगलों में लगने वाली आग ने हिमालयी क्षेत्रों की हवा को भी प्रदूषित करना शुरू कर दिया है।
ऐसे समय में भारत द्वारा सीएसआईआर–नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी (NPL) में नेशनल एनवायरनमेंटल स्टैंडर्ड्स लेबोरेटरी (NESL) की स्थापना एक दूरगामी और ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। यह प्रयोगशाला न केवल देश की वायु गुणवत्ता निगरानी प्रणाली को मजबूत करेगी, बल्कि हिमालयी राज्यों के लिए भी नई दिशा तय कर सकती है।

हिमालयी राज्यों में प्रदूषण: दिखता नहीं, पर खतरनाक
उत्तराखंड जैसे राज्य लंबे समय तक इस भ्रम में रहे कि पहाड़ों में प्रदूषण नगण्य है। लेकिन हाल के अध्ययनों और निगरानी आंकड़ों ने स्पष्ट किया है कि देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, हल्द्वानी, काशीपुर जैसे शहरों में पीएम-2.5 और पीएम-10 का स्तर कई बार मानकों से ऊपर चला जाता है।
सर्दियों में तापमान उलटाव (Temperature Inversion), घाटियों में धुएं का फंसना, डीजल वाहनों की बढ़ती आवाजाही और निर्माण स्थलों की धूल स्थिति को और गंभीर बना देती है। इसके अलावा, हिमालयी क्षेत्रों में हर वर्ष लगने वाली जंगल की आग हजारों किलोमीटर तक वायु प्रदूषण फैलाती है। उत्तराखंड की आग का असर केवल स्थानीय नहीं रहता, बल्कि मैदानी राज्यों तक महसूस किया जाता है।

समस्या की जड़: गलत या अधूरे आंकड़े
हिमालयी राज्यों की सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि वायु प्रदूषण के आंकड़े या तो सीमित हैं या पूरी तरह विश्वसनीय नहीं। अब तक भारत में उपयोग होने वाले अधिकतर वायु गुणवत्ता निगरानी उपकरण यूरोप या अमेरिका से आयातित रहे हैं। इन उपकरणों को वहां की जलवायु परिस्थितियों—कम धूल, अलग तापमान और प्रदूषक मिश्रण—के अनुसार प्रमाणित किया गया है।
जब यही उपकरण उत्तराखंड जैसे उच्च धूल, उच्च आर्द्रता और विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में लगाए जाते हैं, तो लंबे समय में उनकी माप की सटीकता पर सवाल खड़े होते हैं। नतीजतन, नीति निर्माण, न्यायिक हस्तक्षेप और जनस्वास्थ्य योजनाएं अधूरे आंकड़ों पर आधारित रह जाती हैं।

NESL: हिमालय के लिए क्यों खास
नई नेशनल एनवायरनमेंटल स्टैंडर्ड्स लेबोरेटरी (NESL) इसी कमी को दूर करने का प्रयास है। यह प्रयोगशाला भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप वायु प्रदूषण निगरानी उपकरणों का परीक्षण, अंशांकन और प्रमाणन करेगी।
हिमालयी राज्यों के लिए इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि यहां की परिस्थितियां मैदानी भारत से पूरी तरह अलग हैं—ऊंचाई के कारण ऑक्सीजन स्तर में अंतर, अत्यधिक धूल और जैविक कण  तथा मौसम में तेज़ बदलाव ।

पर्यटन सीजन में अचानक बढ़ता प्रदूषण
अब इन परिस्थितियों के अनुरूप उपकरण विकसित और प्रमाणित किए जा सकेंगे, जिससे वास्तविक और भरोसेमंद आंकड़े सामने आएंगे।
उत्तराखंड में नीति निर्माण को मिलेगा आधार
उत्तराखंड सरकार लंबे समय से वायु गुणवत्ता निगरानी नेटवर्क के विस्तार की बात करती रही है, लेकिन विश्वसनीय आंकड़ों की कमी के कारण ठोस नीति बनाना कठिन रहा है।
NESL के माध्यम से प्रमाणित उपकरण राज्य के नगर निकायों, वन विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को उपलब्ध होंगे, जिससे—
शहर-विशेष प्रदूषण कार्ययोजना बन सकेगी। जंगल की आग से होने वाले प्रदूषण का वैज्ञानिक आकलन होगा। चारधाम यात्रा जैसे बड़े आयोजनों का पर्यावरणीय प्रभाव मापा जा सकेगा। यह न्यायालयों में चल रहे पर्यावरणीय मामलों में भी सरकार को मजबूत वैज्ञानिक आधार देगा।

राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम और पहाड़
भारत का राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) अब तक मुख्य रूप से मैदानी महानगरों पर केंद्रित रहा है। लेकिन हिमालयी राज्यों में बदलते हालात को देखते हुए अब पर्वतीय शहरों को भी इस दायरे में लाना अनिवार्य हो गया है। NESL से मिलने वाले सटीक आंकड़े यह साबित करने में मदद करेंगे कि पहाड़ी क्षेत्रों को भी विशेष श्रेणी में रखकर अलग रणनीति की आवश्यकता है—जहां विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन सर्वोपरि हो।

आत्मनिर्भर भारत और पर्वतीय अवसर
NESL की स्थापना केवल पर्यावरणीय सुधार तक सीमित नहीं है। यह हिमालयी राज्यों के लिए तकनीकी और औद्योगिक अवसर भी पैदा कर सकती है।न्उत्तराखंड जैसे राज्य, जहां तकनीकी संस्थान और स्टार्टअप संस्कृति उभर रही है, भारत-विशिष्ट वायु निगरानी उपकरणों के निर्माण और परीक्षण में अहम भूमिका निभा सकते हैं।न्भविष्य में यह क्षेत्र रोजगार, अनुसंधान और नवाचार का नया केंद्र बन सकता है।

वैश्विक संदर्भ में हिमालय
वैश्विक स्तर पर वायु प्रदूषण निगरानी प्रणालियों का बाजार लगभग 4 अरब डॉलर का है। यदि भारत हिमालयी और विकासशील देशों की परिस्थितियों के अनुरूप सस्ते और भरोसेमंद उपकरण विकसित करता है, तो नेपाल, भूटान, अफगानिस्तान और अफ्रीकी देशों जैसे बाजारों में उसकी मजबूत उपस्थिति बन सकती है।

वैज्ञानिक और नीतिगत चुनौती
हिमालय की रक्षा केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और नीतिगत चुनौती है। भारत द्वारा NESL की स्थापना इस दिशा में एक निर्णायक कदम है, जो उत्तराखंड और अन्य हिमालयी राज्यों को पहली बार अपने पर्यावरण को मापने, समझने और बचाने का सटीक औजार प्रदान कर सकता है।
यदि इस पहल का सही उपयोग किया गया, तो आने वाले वर्षों में हिमालय केवल आस्था का नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पर्यावरणीय नेतृत्व का भी प्रतीक बन सकता है।

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