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भारतीय सेना: शौर्य की विरासत और भविष्य की चुनौतियां

​ –जयसिंह रावत-

​आज 15 जनवरी है—भारतीय सेना का वह पावन दिवस, जो न केवल हमारे जवानों के अदम्य साहस का उत्सव है, बल्कि स्वतंत्र भारत के सैन्य स्वावलंबन का प्रतीक भी है। आज से ठीक 77 साल पहले, 1949 में, जनरल (बाद में फील्ड मार्शल) के.एम. करियप्पा ने अंतिम ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ जनरल फ्रांसिस बुचर से भारतीय सेना की कमान संभाली थी। वह पल महज पदभार ग्रहण करने का नहीं था, बल्कि भारतीय सेना के ‘स्वदेशीकरण’ और औपनिवेशिक बेड़ियों से पूर्ण मुक्ति का उद्घोष था।

​देवभूमि के दो प्रहरी: कुमाऊं और गढ़वाल राइफल्स

​जब हम भारतीय सेना के शौर्य की बात करते हैं, तो उत्तराखंड की मिट्टी से उपजी दो महान रेजिमेंटों— कुमाऊं रेजिमेंट और गढ़वाल राइफल्स का जिक्र किए बिना यह विमर्श अधूरा है। ये केवल सैन्य इकाइयां नहीं हैं, बल्कि हिमालयी साहस की जीवंत मिसालें हैं।

कुमाऊं रेजिमेंट का इतिहास बलिदान की पराकाष्ठा है। मेजर सोमनाथ शर्मा, जिन्हें स्वतंत्र भारत का पहला ‘परमवीर चक्र’ मिला, इसी रेजिमेंट की चौथी बटालियन से थे। 1947 के बड़गाम युद्ध से लेकर 1962 के रेजांग ला तक, जहाँ मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में मुट्ठी भर कुमाऊंनियों ने चीनी सेना के दांत खट्टे किए, यह रेजिमेंट ‘पराक्रमो विजयते’ के अपने आदर्श वाक्य को चरितार्थ करती आई है। रानीखेत की वादियों में गूंजता इनका प्रशिक्षण आज भी देश को सर्वश्रेष्ठ योद्धा दे रहा है।

​वहीं दूसरी ओर, गढ़वाल राइफल्स का नाम सुनते ही दुश्मन के मन में खौफ पैदा हो जाता है। प्रथम विश्व युद्ध में गब्बर सिंह नेगी और दरवान सिंह नेगी जैसे योद्धाओं ने विदेशी धरती पर विक्टोरिया क्रॉस जीतकर अपनी वीरता का लोहा मनवाया था। ‘बद्री विशाल लाल की जय’ के जयघोष के साथ जब गढ़वाली जवान आगे बढ़ते हैं, तो बड़ी से बड़ी बाधाएं ढह जाती हैं। 1962 में जसवंतगढ़ की रक्षा हो या आतंकवाद विरोधी अभियानों में उनका सटीक निशाना, लैंसडाउन की इस रेजिमेंट ने हर बार साबित किया है कि पहाड़ों सा अडिग साहस ही उनकी असली पहचान है।

​हिमालय की चोटियों से समंदर की लहरों तक

​भारतीय सेना का इतिहास बलिदानों की अनगिनत गाथाओं से भरा है। जब हम सेना दिवस मनाते हैं, तो मेरी आंखों के सामने उत्तराखंड के उन वीर सपूतों के चेहरे कौंध जाते हैं जिन्होंने विषम परिस्थितियों में भी तिरंगे की आन-बान-शान को झुकने नहीं दिया। 1962 के युद्ध में राइफलमैन जसवंत सिंह रावत का वह बलिदान, जिन्होंने नूरानांग की पहाड़ियों में अकेले 300 चीनी सैनिकों का सामना किया, आज भी हर भारतीय जवान के लिए प्रेरणापुंज है। यह वही शौर्य है जिसने 1971 में दुनिया का भूगोल बदल दिया और 1999 में कारगिल की दुर्गम चोटियों पर विजय का परचम लहराया।

​आधुनिकता और बदलता स्वरूप

​2026 की भारतीय सेना 1949 की सेना से तकनीक और रणनीति के मामले में कोसों आगे है। आज हम ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प के साथ अपनी मारक क्षमता बढ़ा रहे हैं। चाहे वह स्वदेशी अर्जुन टैंक हो, धनुष तोपें हों या फिर सीमा पर तैनात अत्याधुनिक ड्रोन और सर्विलांस सिस्टम; भारतीय सेना अब केवल रक्षक नहीं, बल्कि एक ‘प्रो-एक्टिव’ सैन्य शक्ति बन चुकी है। अग्निपथ जैसी योजनाओं के माध्यम से सेना के युवा स्वरूप (Youthful Profile) को निखारने का प्रयास किया जा रहा है, जो भविष्य के डिजिटल युद्ध (Cyber Warfare) के लिए तैयार है।

​चुनौतियां और संकल्प

​वर्तमान भू-राजनीतिक परिवेश में हमारे सामने दोहरी चुनौतियां हैं। एक तरफ एलएसी (LAC) पर बढ़ती हलचल है, तो दूसरी तरफ आतंकवाद का बदलता चेहरा। उत्तराखंड जैसे सीमावर्ती राज्यों के लिए सेना केवल रक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने का अभिन्न हिस्सा है। यहाँ का हर घर एक फौजी का घर है। लेकिन, बदलते दौर में हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे जवानों को सर्वश्रेष्ठ तकनीक और सुविधाएं मिलें, ताकि वे बिना किसी चिंता के सरहद पर डटे रहें।

​आत्मचिंतन का दिन

​सेना दिवस केवल परेड और प्रदर्शन का दिन नहीं है, बल्कि यह आत्मचिंतन का दिन है। यह दिन है उन वीर नारियों को नमन करने का जिन्होंने अपने सुहाग और बेटों को राष्ट्र की वेदी पर अर्पित कर दिया। जय हिंद की गूंज केवल एक नारा नहीं, बल्कि उस भरोसे का प्रतीक है जो 140 करोड़ भारतीयों को चैन की नींद सोने देता है।

​आज जब हम सेना दिवस मना रहे हैं, तो हमें संकल्प लेना होगा कि हम अपनी सेना के मनोबल को कभी कम नहीं होने देंगे। भारतीय सेना है, तो भारत सुरक्षित है।

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