Uncategorized

महासागर के तल तक पहुंचने के लिए भारत का प्रवेश द्वार

The deep sea, still full of mysteries, holds not just the secrets of human origins but also clues to our long-term sustenance and preservation. To unlock its hidden potential, India’s Deep Ocean Mission was launched on 07.09.2021 by the Ministry of Earth Sciences (MoES) with an aim to develop technologies for exploring and sustainably utilizing the deep ocean’s living and non-living wealth. Exploring these depths could provide solutions to global challenges like climate change. Considering this, the United Nations named the 2021-2030 decade as the ‘Decade of Ocean Science for Sustainable Development’. India’s unique geography, with 7517 km of coastline, nine coastal states, and 1382 islands, gives it an edge in the sector. This is why, in the Vision of New India by 2030, the Government has placed Blue Economy among the ten core growth dimensions.

मुख्य बातें

  • 2021 में शुरू किया गया डीप ओशन मिशन, समुद्री संपदा के सतत दोहन और ब्लू इकोनॉमी को मजबूत करने पर केंद्रित है।
  • डीप ओशन मिशन के तहत समुद्रयान परियोजना के हिस्से के रूप में भारत का पहला मानवयुक्त पनडुब्बी वाहन मत्स्य 6000′ विकसित किया जा रहा है।
  • एक्वानॉट्स कमांडर जतिंदर पाल सिंह और श्री राजू रमेश ने अगस्त, 2025 में गहरे समुद्र में 5000 मीटर तक गहरा गोता लगाया, जो भारत द्वारा पहली बार किया गया एक कारनामा है।
  • अंडमान सागर में 1173 मीटर की गहराई से 100 किलोग्राम से अधिक कोबाल्ट युक्त पॉलीमेटेलिक नोड्यूल एकत्र किए गए।

रहस्यों से भरे गहरे समुद्र

अभी भी रहस्यों से भरे गहरे समुद्र न केवल मानव उत्पत्ति के रहस्यों को समेटे हुए हैं, बल्कि इसमेंहमारे दीर्घकालिक जीवन और संरक्षण के सुराग भी छुपे हुए हैं। इसकी छिपी क्षमता को उजागर करने के लिए, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस) द्वारा 07.09.2021 को भारत का डीप ओशन मिशन शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य गहरे समुद्र की सजीव और निर्जीव संपदा की खोज और सतत उपयोग के लिए प्रौद्योगिकियों का विकास करना है।

पांच वर्षों में फैले ₹4077 करोड़ के कुल निवेश के साथ, यह मिशन एक बार का प्रयास नहीं है – यह चरणों में पूरा होगा और इसे एक पूर्ण-गति वाली राष्ट्रीय परियोजना के रूप में डिजाइन किया गया है, जो भारत की नीली अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाएगी,जिसमें मछली पकड़ने और शिपिंग से लेकर जैव प्रौद्योगिकी और पर्यटन तक सभी समुद्री-आधारित उद्योग शामिल हैं।

इन गहराइयों की खोज जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान प्रदान कर सकती है। इसे ध्यान में रखते हुए, संयुक्त राष्ट्र ने 2021-2030 के दशक को सतत विकास के लिए महासागर विज्ञान का दशक नाम दिया है। 7517 किलोमीटर लंबी तटरेखा, नौ तटीय राज्य और 1382 द्वीपों वाला भारत का अनूठा भूगोल उसे इस क्षेत्र में बढ़त देता है। यही कारण है कि 2030  तक नए भारत के विजन में, सरकार ने नीली अर्थव्यवस्था को विकास के दस प्रमुख आयामों में शामिल किया है।

एमओईएस इस कई एजेंसियों से जुड़े प्रयास का नेतृत्व करता है, जो भारत को समुद्री संसाधनों का दोहन करने और देश की समुद्री अर्थव्यवस्था को ₹100 अरब से ऊपर ले जाने के लक्ष्य की ओर अग्रसर करता है। यह गहरे समुद्र की क्षमता को स्थायी समृद्धि में बदलने के बारे में है।

मिशन के घटक

  1. गहरे समुद्र में खनन और मानवयुक्त पनडुब्बी के लिए प्रौद्योगिकियों का विकास: भारत तीन लोगों को समुद्र में 6000 मीटर नीचे ले जाने के लिए एक मानवयुक्त पनडुब्बी का निर्माण कर रहा है। इसके साथ ही, मध्य हिंद महासागर में गहरे समुद्र से पॉलीमेटेलिक नोड्यूल्स निकालने के लिए एक एकीकृत खनन प्रणाली विकसित की जाएगी। अंतर्राष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण द्वारा वैश्विक नियम निर्धारित किए जाने के बाद, ये प्रयास भविष्य में वाणिज्यिक खनिज अन्वेषण में सहायक होंगे। यह परियोजना भारत की नीली अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से गहरे समुद्र में खनन और ऊर्जा के क्षेत्र में, को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है।
  2. महासागर जलवायु परिवर्तन सलाहकार सेवाओं का विकास: मौसमी से लेकर दशकीय पैमाने तक जलवायु के प्रमुख अंगों का अध्ययन और पूर्वानुमान करने के लिए एक अवलोकन और मॉडल समूह विकसित किया जाएगा। इस अवधारणा-सिद्ध पहल का उद्देश्य जलवायु प्रवृत्तियों की समझ को बढ़ाना और तटीय पर्यटन को बढ़ावा देने पर केंद्रित नीली अर्थव्यवस्था में योगदान देना है।
  3. गहरे समुद्र की जैव विविधता के अन्वेषण और संरक्षण के लिए तकनीकी नवाचार: इसका मुख्य उद्देश्य गहरे समुद्र के वनस्पतियों, जीवों और सूक्ष्मजीवों की जैव-खोज के साथ-साथ गहरे समुद्र के जैविक संसाधनों के सतत उपयोग पर अनुसंधान करना है। यह पहल समुद्री मत्स्य पालन और संबद्ध सेवाओं के ब्लू इकोनॉमी के प्राथमिकता वाले क्षेत्र को आगे बढ़ाएगी।
  4. गहरे समुद्र का सर्वेक्षण और अन्वेषण: यह पहल हिंद महासागर के मध्य-महासागरीय कटकों के साथ बहु-धातु हाइड्रोथर्मल सल्फाइड स्थलों की पहचान करने पर केंद्रित है और ब्लू इकोनॉमी के तहत गहरे समुद्र के संसाधनों की खोज का समर्थन करती है।
  5. महासागर से ऊर्जा और मीठा पानी: यह अवधारणा-सिद्धांत एक अपतटीय महासागर तापीय ऊर्जा रूपांतरण (ओटीईसी) संचालित विलवणीकरण संयंत्र के लिए अध्ययन और इंजीनियरिंग डिजाइन का प्रस्ताव करता है, जो अपतटीय ऊर्जा विकास पर ब्लू इकोनॉमी के फोकस का समर्थन करता है।
  6. महासागर जीव विज्ञान के लिए उन्नत समुद्री स्टेशन: यह घटक महासागर जीव विज्ञान और इंजीनियरिंग में प्रतिभा और नवाचार के निर्माण पर केंद्रित है, और ऑन-साइट इन्क्यूबेटरों के माध्यम से अनुसंधान को औद्योगिक उत्पादों में परिवर्तित करता है। यह ब्लू इकोनॉमी के तहत समुद्री जीव विज्ञान, ब्लू ट्रेड और विनिर्माण का समर्थन करता है।

प्रोजेक्ट समुद्रयान – गहरे समुद्र में छलांग

भारत ने डीप ओशन मिशन के अंतर्गत समुद्रयान परियोजना शुरू की है, जिसका उद्देश्य मानवयुक्त पनडुब्बी के माध्यम से गहरे समुद्र में अन्वेषण के अपने पहले घटक पर काम करना है।

इस परियोजना के अंतर्गत मत्स्य 6000 नामक एक स्व-चालित मानवयुक्त पनडुब्बी विकसित की जा रही है, जो तीन व्यक्तियों को समुद्र की सतह से 6,000 मीटर नीचे तक की गहराई तक ले जाने में सक्षम है। वैज्ञानिक उपकरणों और अन्वेषण उपकरणों की एक विस्तृत श्रृंखला से सुसज्जित, यह उन्नत वाहन व्यापक गहरे समुद्र में अनुसंधान को संभव बनाएगा। यह पनडुब्बी 12 घंटे की परिचालन अवधि और आपातकालीन परिस्थितियों में 96 घंटे तक काम करने के लिए डिजाइन की गई है। इसमें उच्च-घनत्व वाली ली-पो बैटरी, पानी के भीतर ध्वनिक टेलीफोन, ड्रॉप-वेट आपातकालीन बचाव तंत्र और चालक दल की सुरक्षा और स्वास्थ्य निगरानी के लिए बायो-वेस्ट जैसी उन्नत प्रणालियां हैं।

स्रोत: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो)

 

तकनीक
  1. यह वाहन एक गोलाकार टाइटेनियम-मिश्र धातु पात्र (टीआई6एl4वी – ईएलआई ग्रेड) है जिसका व्यास 2260 मिमी और दीवार की मोटाई 80 मिमी है, जिसे 600 बार दबाव और -3°सी तक के न्यूनतम तापमान को झेलने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
 
  1. इस टाइटेनियम वीसल का निर्माण भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के द्रव प्रणोदन प्रणाली केंद्र (एलपीएससी) द्वारा विकसित उच्च-प्रवेश इलेक्ट्रॉन बीम वेल्डिंग (ईबीडब्ल्यू) नामक एक विशेष वेल्डिंग प्रक्रिया द्वारा किया गया है। 700 परीक्षणों के बाद इस प्रक्रिया की पूर्णता प्राप्त की गई।
  1. वेल्डिंग की गुणवत्ता का परीक्षण बहुत उन्नत तकनीकों जैसे गैर-विनाशकारी मूल्यांकन (एनडीई) विधियों जैसे टाइम-ऑफ-फ्लाइट डिफ्रेक्शन (टीओएफडी) और डुअल लीनियर ऐरे (डीएलए) फेज्ड ऐरे अल्ट्रासोनिक परीक्षण (पीएयूटी) के संयोजन द्वारा किया गया है।

स्रोत: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो)

यह मानव-सक्षम वाहन (एचओवी) राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी), पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी), इसरो के सहयोग से विकसित किया जा रहा है। इस पहल में अब तक उल्लेखनीय प्रगति हुई है।

परीक्षणसत्यापन यात्रा

मत्स्य का जमीन और पानी में गहन परीक्षण किया गया ताकि यह जांचा जा सके कि इसकी प्रणालियाx, शक्ति, नियंत्रण, स्थिरता और सुरक्षा सहित, एक साथ कितनी अच्छी तरह काम करती हैं। 5000 मीटर की गहराई तक भारत के पहले गहरे समुद्र अभियान के माध्यम से एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की गई, जिससे यह आधा दर्जन से भी कम देशों के विशिष्ट समूह का हिस्सा बन गया।

परीक्षण और सत्यापन
मत्स्य 6000 के शुष्क और आर्द्र परीक्षण
  • मत्स्य ने अपनी बाह्य संरचना के भीतर प्रणाली का एकीकरण सुनिश्चित करने के लिए 500 मीटर की परिचालन सीमा में एकीकृत शुष्क परीक्षण किए।
  • एलएंडटी शिपयार्डकट्टुपल्ली बंदरगाहचेन्नई (जनवरी-फरवरी 2025) में सफल आर्द्र परीक्षण किए गए, जिसमें शक्ति और नियंत्रण प्रणालियों, प्लवनशीलता और स्थिरता, मानव सहायता और सुरक्षा तंत्र, अग्र और पश्च गति, नेविगेशन और संचार क्षमताओं का आकलन किया गया।
  • कार्यक्षमता की पुष्टि के लिए उन्नत समुद्र विज्ञान सेंसर सहित वैज्ञानिक पेलोड का परीक्षण किया गया।
  • प्रदर्शन चरण में आठ गोता शामिल थे:
    • पांच पांच बार मानव रहित समुद्र की गहराई में जाना
    • पांच बार मानव सहित समुद्र की गहराई में जाना, जिनमें से प्रत्येक में जीवन रक्षक प्रणाली की विश्वसनीयता सुनिश्चित हुई।
 
स्रोतपृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस)    

 

5,000 मीटर गोताभारत की गहरे समुद्र में सफलता

  • यह अभियान और 6 अगस्त, 2025 को फ्रांसीसी समुद्री अनुसंधान संस्थान, आईएफआरईएमईआर के सहयोग से आयोजित किया गया था। यह आईएफआरईएमईआर के पनडुब्बी नॉटाइल पर सवार होकर अटलांटिक महासागर में हुआ।
  • भारतीय जलयात्री – एनआईओटी,  चेन्नई के वरिष्ठ वैज्ञानि श्री राजू रमेश और कमांडर जतिंदर पाल सिंह (सेवानिवृत्त) ने सुरक्षित रूप से सतह पर आने से पहले महत्वपूर्ण डेटा एकत्र करने और अवलोकन करने के लिए अपना पहला सात घंटे का गहरे समुद्र में गोता लगाया।
  • एनआईओटी टीम ने निम्नलिखित विषयों पर व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया –
  • गोता लगाने से पहले की तैयारी और पायलटिंग ऑपरेशन।
  • एक माहौल में रहने की आदत और तैरने की क्षमता के प्रबंधन के साथ-साथ उतरने और चढ़ने की प्रक्रियाएँ।
  • मैनिपुलेटर्स का उपयोग करके फ़्लैगिंग।
  • चार गोता लगाने के दौरान नमूना संग्रह, तैनाती और पुनर्प्राप्ति जैसे सुधारात्मक कार्य।
  • जहाज से ट्रैकिंग।
  • जहाज पर प्रणाली प्रबंधन।
  • ध्वनिक टेलीफोन संचार प्रोटोकॉल का संचालन।
  • गोताखोरी की योजना, गति और अन्य आवश्यक परिचालन प्रक्रियाएँ।
 

यह इंडो-फ्रेंच अनुसंधान अभियान ‘मत्स्य- 6000’ के विकास का समर्थन करता है, जिसमें टाइटेनियम पतवार, सिंटैक्टिक फोम, वीबीएस और ड्रॉप-वेट मैकेनिज्म की प्राप्ति और परीक्षण, उप-प्रणालियों का खुले समुद्र में परीक्षण और प्रमाणन, 2026 की शुरुआत तक 500 मीटर तक उथले पानी का प्रदर्शन, एलएआरएस के साथ अनुसंधान पोत का विस्तार, 2027 के मध्य तक एकीकरण और गहरे पानी में परीक्षण और 2027-28 के दौरान मत्स्य-6000 का उपयोग करके वैज्ञानिक अन्वेषण जैसे मील के पत्थर शामिल हैं।

गहरे समुद्र मिशनअब तक की कहानी

भारत ने स्वदेशी गहरे समुद्र प्रौद्योगिकियों के विकास में उल्लेखनीय प्रगति की है, जिनमें वाहन और दबाव-प्रतिरोधी सामग्री शामिल हैं, और इनके सफल परीक्षण पहले ही प्रगति पर हैं। दिसंबर 2022 में, एक स्वायत्त वाहन, ओशन मिनरल एक्सप्लोरर (ओएमई 6000) ने मध्य हिंद महासागर बेसिन पॉलीमेटेलिक मैंगनीज नोड्यूल (पीएमएन) स्थल में 5,271 मीटर की गहराई पर खनिज-समृद्ध क्षेत्रों का अन्वेषण किया। अनुसंधान पोत सागरनिधि का उपयोग करते हुए, इसने 14 वर्ग किमी क्षेत्र का सर्वेक्षण किया और पॉलीमेटेलिक नोड्यूल वितरण और गहरे समुद्र की जैव विविधता का आकलन करने के लिए 1 किमी x 0.5 किमी क्षेत्र का विस्तृत मानचित्रण किया, जिससे भविष्य के अन्वेषण और संसाधन मानचित्रण की नींव रखी गई।

निष्कर्ष

डीप ओशन मिशन, अपनी अग्रणी समुद्रयान परियोजना के साथ, भारत की वैज्ञानिक और रणनीतिक क्षमताओं में एक परिवर्तनकारी छलांग का प्रतीक है। समुद्र की गहराइयों में उतरकर, भारत न केवल खनिजों, जैव विविधता और ऊर्जा के विशाल भंडारों को खोज रहा है, बल्कि प्रधानमंत्री के ‘समुद्र मंथन’ के दृष्टिकोण में निहित उन्नत गहरे समुद्र अन्वेषण तकनीक वाले कुछ देशों में भी अपनी जगह बना रहा है। मानवयुक्त पनडुब्बी का विकास समुद्री इंजीनियरिंग और नवाचार में भारत की बढ़ती विशेषज्ञता को दर्शाता है। यह पहल नीली अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्तंभों का समर्थन करती है और स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देती है, समुद्र-आधारित उद्योगों को बढ़ावा देती है और अनुसंधान, उद्यम और रोजगार के नए अवसर पैदा करती है। डीप ओशन मिशन केवल अज्ञात में गोता लगाने जैसा नहीं है – यह एक लचीले, संसाधन-समृद्ध और भविष्य के लिए तैयार भारत की दिशा में एक साहसिक कदम है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!