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डोनर हार्ट के साथ 25 साल पूरे करने वाली भारत की सबसे लंबे समय तक जीवित हार्ट ट्रांसप्लांट मरीज

 

नई दिल्ली। प्रीति उन्हाले (51) ने 23 जनवरी 2026 को डोनर हृदय के साथ 25 वर्ष पूरे कर लिए। इसके साथ ही वे भारत की सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाली हार्ट ट्रांसप्लांट सर्वाइवर बन गई हैं। यह उपलब्धि इसलिए भी ऐतिहासिक मानी जा रही है क्योंकि जब उनका हार्ट ट्रांसप्लांट हुआ था, उस समय देश में यह प्रक्रिया बेहद दुर्लभ थी, अंगदान को लेकर जागरूकता बहुत सीमित थी और लंबे समय तक जीवित रहने को लेकर अनिश्चितता बनी रहती थी।
मध्य प्रदेश की रहने वाली प्रीति उन्हाले वर्ष 2000 में इलाज के लिए एम्स (AIIMS) पहुँची थीं। इससे पहले वे अपने गृह राज्य और मुंबई में इलाज के सभी विकल्प आज़मा चुकी थीं, लेकिन कोई राहत नहीं मिली। डॉक्टरों ने उन्हें डाइलेटेड कार्डियोमायोपैथी नामक गंभीर बीमारी से पीड़ित पाया—यह ऐसी स्थिति होती है जिसमें हृदय की मांसपेशियाँ कमजोर और फैल जाती हैं, जिससे हृदय की पंप करने की क्षमता कम हो जाती है और अंततः हार्ट फेलियर की स्थिति बन जाती है। डॉक्टरों ने स्पष्ट कर दिया कि हार्ट ट्रांसप्लांट ही उनके जीवन को बचाने का एकमात्र रास्ता है।
एम्स में उनकी मुलाकात वरिष्ठ कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. पी. वेणुगोपाल और प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. के. के. तलवार से हुई। प्रीति उन्हाले याद करती हैं,
“पहली बार किसी डॉक्टर ने मुझसे कहा—‘आप ठीक हो जाएँगी।’ यह वाक्य मेरे लिए उम्मीद की नई किरण था।”
इलाज के लिए वे दिल्ली में ही रुक गईं और तब से यहीं रह रही हैं।

डॉ. वेणुगोपाल ने  एक अख़बार के प्रतिनिधि  को बताया कि जब प्रीति एम्स पहुँची थीं, तब उनकी हालत बेहद नाज़ुक थी।

उन्होंने कहा, “वह अत्यंत गंभीर स्थिति में हमारे पास आई थीं। दो साल पहले तक हार्ट ट्रांसप्लांट की शुरुआत ही हुई थी और कोई ठोस क्लीनिकल गाइडलाइन उपलब्ध नहीं थी। उन्हें हर जगह से मना कर दिया गया था, लेकिन वे आखिरी उम्मीद लेकर हमारे पास आईं।”
उस समय डॉक्टरों ने पूरी सावधानी और गहन जांच के बाद उनका मामला चुना। डॉ. वेणुगोपाल के अनुसार,
“एंड-स्टेज हार्ट फेलियर के लिए हार्ट ट्रांसप्लांट ही अंतिम समाधान है। सामान्यतः पाँच साल बाद जीवित रहने की दर लगभग 85 प्रतिशत होती है, जबकि प्रीति ने 25 साल पूरे कर लिए हैं।”
जनवरी 2001 में एक ब्रेन-डेड किशोर डोनर के हृदय से उनका ट्रांसप्लांट किया गया। उस दौर में यह प्रक्रिया अत्यंत जोखिम भरी मानी जाती थी। प्रीति बताती हैं,
“तब कोई स्पष्ट मार्गदर्शन नहीं था। सफलता की दर कम थी और ऐसे बहुत कम लोग थे जो ट्रांसप्लांट के बाद लंबे समय तक जीवित रहे हों। लोग हमें हतोत्साहित करते थे और कहते थे कि ट्रांसप्लांट ज़्यादा समय तक नहीं चलता। लेकिन हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। अगर जीवन चाहिए—और अच्छा जीवन चाहिए—तो यह जोखिम उठाना ही पड़ता है।”
उनके पति, जो भारतीय वन सेवा (IFS) के अधिकारी हैं, ने परिवार के साथ दिल्ली में रहने के लिए अपना तबादला करवा लिया ताकि इलाज एम्स के पास रहकर हो सके। प्रीति कहती हैं,
“परिवार का सहयोग मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण था।”
आज प्रीति उन्हाले देशभर में हार्ट ट्रांसप्लांट के मरीजों को परामर्श देती हैं और उस जानकारी की कमी को पाटने में मदद कर रही हैं, जिसका सामना उन्हें खुद करना पड़ा था। उनका संदेश बिल्कुल साफ है—
“अगर डॉक्टर हार्ट ट्रांसप्लांट की सलाह दें, तो कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। डोनर बहुत दुर्लभ होते हैं—अगर मौका मिले, तो तुरंत ‘हाँ’ कहें। अनुशासन के साथ पूरी ज़िंदगी जिएँ। हमें दूसरी ज़िंदगी मिली है।”

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