मातृभाषा दिवस : शब्द नहीं, संवेदना है मातृभाषा

-उषा रावत
यूनेस्को द्वारा घोषित 21 फरवरी का दिन केवल एक कैलेंडर की तारीख नहीं है, बल्कि यह उन शहीदों की स्मृति का तर्पण है जिन्होंने 1952 में ढाका विश्वविद्यालय में अपनी भाषा ‘बांग्ला’ के अस्तित्व को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह किसी भी समाज के इतिहास, संस्कृति, मनोविज्ञान और उसकी पहचान का जीवंत दस्तावेज होती है। एक पत्रकार और लेखक के लिए तो मातृभाषा वह ‘सॉफ्टवेयर’ है, जिसके जरिएनों को महसूस करता है।

भाषा की जड़ों में छिपा भूगोल और इतिहास
उत्तराखंड की पावन धरा से लेकर सुदूर दक्षिण तक, भारत भाषाओं का एक विशाल महासागर है। जब हम अपनी मातृभाषा में बोलते हैं, तो हम केवल शब्द नहीं उच्चारित करते, बल्कि हम अपने पूर्वजों के संघर्ष, अपनी लोकगाथाओं और अपनी मिट्टी की गंध को स्वर देते हैं।
गढ़वाली और कुमाऊंनी जैसी भाषाओं का उदाहरण लें, तो इनके मुहावरों में पहाड़ों का धैर्य और नदियों की चंचलता बसी है। यदि ये भाषाएं कमजोर होती हैं, तो केवल शब्द नहीं मरते, बल्कि उनके साथ जुड़ी वह सैन्य परंपरा, वह शौर्य और वह विशेष पहाड़ी जीवन-दर्शन भी लुप्त होने लगता है जिसे आप अपनी पुस्तकों के माध्यम से सहेज रहे हैं।
वैश्वीकरण और ‘भाषाई साम्राज्यवाद’ का खतरा
आज के दौर में अंग्रेजी एक वैश्विक आवश्यकता बन गई है, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन प्रगति की इस दौड़ में ‘भाषाई साम्राज्यवाद’ का एक अदृश्य खतरा मंडरा रहा है। तकनीक और बाजार की भाषा बनने की होड़ में स्थानीय बोलियां हाशिए पर जा रही हैं।
यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की लगभग 7,000 भाषाओं में से 40% लुप्त होने की कगार पर हैं। जब एक भाषा मरती है, तो उसके साथ एक पूरा ‘ज्ञान-तंत्र’ (Knowledge System) समाप्त हो जाता है। वह पारंपरिक चिकित्सा, वह लोक संगीत और वह खेती-किसानी के अनुभव जो पीढ़ियों से मौखिक रूप से हस्तांतरित होते आए थे, हमेशा के लिए मौन हो जाते हैं।
मातृभाषा और बौद्धिक विकास
वैज्ञानिक शोध सिद्ध कर चुके हैं कि बालक का प्रारंभिक बौद्धिक विकास उसकी मातृभाषा में सबसे प्रभावी ढंग से होता है। शिक्षाविद मानते हैं कि जो बच्चा अपनी मातृभाषा पर पकड़ रखता है, वह दूसरी भाषाओं को भी अधिक कुशलता से सीख सकता है। नई शिक्षा नीति (NEP 2020) में भी प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने पर जोर दिया गया है, जो एक सराहनीय कदम है। यह न केवल शिक्षा को सरल बनाता है, बल्कि बच्चे के भीतर अपनी जड़ों के प्रति हीन भावना को समाप्त कर गौरव का भाव भरता है।
पत्रकारिता और मातृभाषा का उत्तरदायित्व
एक पत्रकार के रूप में, हमारी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। समाचार पत्र और डिजिटल माध्यम आज भाषा के सबसे बड़े संरक्षक हैं। हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं की पत्रकारिता ने ही लोकतंत्र को भारत के गांव-गांव तक पहुँचाया है। आज जब हम ‘गूगल ट्रांसलेट’ और ‘एआई’ के दौर में हैं, तब यह और भी जरूरी है कि हम अपनी भाषा की शुद्धता और उसकी मौलिकता को बचाए रखें। मशीनें अनुवाद कर सकती हैं, लेकिन वे ‘संवेदना’ और ‘सांस्कृतिक संदर्भ’ पैदा नहीं कर सकतीं।
उत्तराखंड का संदर्भ: बोलियों का संरक्षण
उत्तराखंड की बोलियां—गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी—आज पलायन और आधुनिकता के दोहरे प्रहार झेल रही हैं। नई पीढ़ी महानगरों की भाषा अपना रही है, जो बुरा नहीं है, लेकिन अपनी मातृभाषा को भूल जाना अपनी पहचान खोने जैसा है। हमें अपनी बोलियों को ‘बाजार की भाषा’ और ‘रोजगार की भाषा’ बनाने की दिशा में काम करना होगा। जब तक कोई भाषा आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होती, उसे बचाए रखना कठिन होता है।
डिजिटल युग में समाधान
आज तकनीक को अभिशाप के बजाय वरदान बनाना चाहिए। सोशल मीडिया, पॉडकास्ट और यूट्यूब के माध्यम से अपनी मातृभाषा के लोकगीतों, कहानियों और इतिहास को वैश्विक मंच पर लाया जा सकता है। आप जैसे विद्वानों द्वारा लिखे जा रहे ग्रंथ आने वाली पीढ़ियों के लिए उस ‘लाइटहाउस’ की तरह काम करेंगे, जो उन्हें उनकी जड़ों की ओर वापस बुलाएगा।
संकल्प का दिन
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर हमारा संकल्प केवल अपनी भाषा में बात करना नहीं, बल्कि अपनी भाषा में सोचना और लिखना होना चाहिए। भाषा वह पुल है जो अतीत को भविष्य से जोड़ता है। यदि यह पुल टूट गया, तो हम इतिहास के पन्नों में अपनी पहचान खो देंगे।
आइए, आज यह प्रण लें कि हम अपनी मातृभाषा को घर की दहलीज से निकालकर शासन, प्रशासन और आधुनिक शोध की भाषा बनाएंगे। क्योंकि भाषा बची रहेगी, तभी संस्कृति बचेगी, और संस्कृति बचेगी, तभी हमनिष्कर
