क्या नॉवेल पुरस्कार कोई खिलौना है, जिसे चाहे दे दो?
नोबेल पुरस्कार की मर्यादा और मचाडो-ट्रंप प्रकरण: कूटनीतिक भेंट या नियमों का उल्लंघन?

–जयसिंह रावत-
मारिया कोरिना मचाडो द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपना नोबेल शांति पुरस्कार का मेडल सौंपने की घटना ने वैश्विक स्तर पर एक नई संवैधानिक और नैतिक बहस को जन्म दे दिया है। वेनेजुएला की लोकतंत्र समर्थक नेता मचाडो ने जिस सहजता से दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सम्मान को एक उपहार के रूप में ट्रंप के हाथों में दिया, उसने नोबेल फाउंडेशन के दशकों पुराने नियमों और पुरस्कार की गरिमा को लेकर कई यक्ष प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
पुरस्कार के भौतिक और वैधानिक स्वरूप का अंतर
नोबेल पुरस्कार केवल एक सोने का पदक या प्रशस्ति पत्र मात्र नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक मान्यता है जिसे नोबेल फाउंडेशन के कड़े नियमों के तहत प्रदान किया जाता है। जब कोई व्यक्ति नोबेल पुरस्कार जीतता है, तो उसे 18 कैरेट सोने का एक पदक, एक हस्तनिर्मित डिप्लोमा और एक निश्चित धनराशि प्रदान की जाती है। तकनीकी दृष्टि से पदक और धनराशि विजेता की व्यक्तिगत संपत्ति बन जाते हैं। विजेता को यह अधिकार होता है कि वह अपने पदक को किसी संग्रहालय को दान कर दे, उसे नीलाम करे या किसी प्रियजन को भेंट कर दे। हालांकि, यहाँ सबसे महत्वपूर्ण अंतर ‘पुरस्कार की वस्तु’ और ‘पुरस्कार के खिताब’ के बीच है। मचाडो डोनाल्ड ट्रंप को वह भौतिक स्वर्ण पदक तो दे सकती हैं, लेकिन वे उस ‘नोबेल विजेता’ (Nobel Laureate) की आधिकारिक उपाधि को हस्तांतरित नहीं कर सकतीं।
नोबेल फाउंडेशन के नियमों की अभेद्य दीवार
नोबेल फाउंडेशन के चार्टर में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि यह सम्मान विशिष्ट व्यक्तियों या संस्थाओं को उनके असाधारण कार्यों के लिए दिया जाता है। पुरस्कार की घोषणा के बाद इसे किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर दर्ज करने का कोई प्रावधान नहीं है। इतिहास में ऐसे कई उदाहरण रहे हैं जब विजेताओं ने आर्थिक तंगी या सामाजिक कार्यों के लिए अपने पदकों की नीलामी की है, जैसे कि रूस के पत्रकार दिमित्री मुरातोव ने अपना मेडल यूक्रेन के शरणार्थियों की मदद के लिए नीलाम किया था। लेकिन मचाडो का मामला इससे भिन्न है क्योंकि यहाँ एक विजेता ने सक्रिय रूप से दूसरे व्यक्ति को अपना ‘उत्तराधिकारी’ बनाने जैसी प्रतीकात्मक चेष्टा की है। नोबेल समिति ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि पदक हाथ बदलने से नोबेल के आधिकारिक रिकॉर्ड में कोई बदलाव नहीं आएगा।
डोनाल्ड ट्रंप और ‘असली’ नोबेल विजेता की मान्यता
जहाँ तक डोनाल्ड ट्रंप को ‘असली’ नोबेल विजेता की मान्यता मिलने का प्रश्न है, तो अंतरराष्ट्रीय कानून और नोबेल के नियमों के तहत उन्हें कभी भी इस पदक के आधार पर आधिकारिक विजेता नहीं माना जाएगा। ट्रंप ने भले ही वह मेडल स्वीकार कर लिया हो, लेकिन ओस्लो के आधिकारिक दस्तावेजों में साल 2025 के शांति पुरस्कार के सामने केवल मारिया कोरिना मचाडो का ही नाम अंकित रहेगा। नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चयन की प्रक्रिया अत्यंत गोपनीय और जटिल होती है, जिसमें किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबाव या ‘गिफ्ट’ के माध्यम से प्रविष्टि संभव नहीं है। यदि ट्रंप को भविष्य में वास्तव में नोबेल विजेता बनना है, तो उन्हें नोबेल समिति द्वारा स्वतंत्र रूप से नामित और चयनित होना होगा।
राजनीतिक कूटनीति बनाम पुरस्कार की शुचिता
मचाडो का यह कदम विशुद्ध रूप से राजनीतिक और कूटनीतिक संकेत माना जा रहा है। वेनेजुएला में जारी राजनीतिक संघर्ष के बीच मचाडो को अमेरिकी समर्थन की नितांत आवश्यकता है। ट्रंप को अपना सर्वोच्च सम्मान देकर उन्होंने एक तरह से उनकी नीतियों और प्रभाव के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की है। हालांकि, आलोचकों का तर्क है कि इस तरह की घटनाओं से नोबेल जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों का राजनीतिकरण होता है और उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। शांति पुरस्कार पहले से ही कई बार विवादों में रहा है, और इस प्रकार के ‘पुरस्कार हस्तांतरण’ की घटनाओं से इसकी महत्ता कम होने का भय बना रहता है।
ट्रम्प के लिए शोभा मगर सम्मान नहीं
अंततः यह स्पष्ट है कि नोबेल पुरस्कार कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे खरीदा, बेचा या उपहार के रूप में किसी और के नाम किया जा सके। यह एक व्यक्ति की जीवनभर की साधना और मानवता के प्रति उसके योगदान का प्रतीक है। मचाडो द्वारा ट्रंप को दिया गया मेडल ट्रंप के निजी संग्रह की शोभा तो बढ़ा सकता है, लेकिन वह उन्हें वह वैश्विक सम्मान और आधिकारिक दर्जा नहीं दिला सकता जो केवल नोबेल समिति के चयन से प्राप्त होता है। यह घटना भविष्य के लिए एक नजीर बनेगी कि क्या अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों को व्यक्तिगत कूटनीति का मोहरा बनाया जाना चाहिए या उनकी शुचिता को हर हाल में सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
