ब्लॉग

क्या देश का प्रधान न्यायाधीश भी सुरक्षित नहीं?

 

लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ की सुरक्षा पर सवाल

 

जयसिंह रावत

देश की राजधानी के सबसे सुरक्षित परिसरों में गिना जाने वाला सुप्रीम कोर्ट परिसर उस समय चर्चा में आ गया जब एक वकील ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) भूषण आर. गवई पर जूता फेंकने की कोशिश की। घटना तो क्षणिक थी, पर उसने पूरे देश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर भारत का प्रधान न्यायाधीश ही सुरक्षित नहीं है, तो फिर देश में कौन सुरक्षित है?

प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष और प्रधान न्यायाधीश—ये लोकतंत्र के तीनों अंगों के शीर्ष प्रतिनिधि हैं। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के इन तीन स्तंभों पर ही लोकतंत्र की पूरी इमारत टिकी है। लेकिन यह सवाल अब गंभीरता से उठ रहा है कि क्या इनमें से तीसरा स्तंभ — न्यायपालिका — सुरक्षा के मामले में उपेक्षित नहीं है?

700 से अधिक सुरक्षाकर्मी, फिर भी खतरा

दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों के 700 से अधिक सुरक्षाकर्मी दिन-रात सुप्रीम कोर्ट परिसर, उसके न्यायाधीशों और कर्मचारियों की सुरक्षा में तैनात रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट के हर कोर्टरूम में अलग-अलग सुरक्षा गार्ड मौजूद रहते हैं। मुख्य न्यायाधीश को Z-प्लस सुरक्षा प्राप्त है, जो देश की सर्वोच्च वीआईपी सुरक्षा श्रेणी है, जिसमें कमांडो, एस्कॉर्ट वाहन और सशस्त्र प्रहरी शामिल होते हैं।

फिर भी, जिस आसानी से एक कथित वकील अंदर तक पहुंच गया और मुख्य न्यायाधीश के सामने ऐसा दुस्साहस कर सका, वह सवाल उठाता है कि सुरक्षा व्यवस्था में आखिर कहां और कैसे चूक हुई? क्या यह सिर्फ एक व्यक्ति की गलती थी या व्यवस्था की लापरवाही?

सुरक्षा जांच की औपचारिकता बन चुकी प्रक्रिया

सुप्रीम कोर्ट में प्रवेश के लिए कई स्तरों की सुरक्षा जांच होती है—मेटल डिटेक्टर, तलाशी बिंदु और बैगेज स्कैनर जैसी परतों से गुजरना पड़ता है। वकीलों और याचिकाकर्ताओं को वैध पास दिखाना अनिवार्य है। फिर भी आरोपी राकेश किशोर उर्फ कमल किशोर बार काउंसिल ऑफ इंडिया और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के कार्ड दिखाकर भीतर पहुंच गया। जांच में बाद में पता चला कि उसके दस्तावेजों में विसंगतियां थीं और उसका नाम सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्यता रजिस्टर में था ही नहीं।

यह घटना इस बात का संकेत है कि हमारी सुरक्षा प्रणालियां अक्सर दिखावे की औपचारिकता में बदल चुकी हैं। कार्ड देखकर व्यक्ति को भीतर जाने देना या नाम देखकर पहचान का भरोसा कर लेना, एक ऐसी ढिलाई है जो उच्चतम न्यायिक संस्थान के लिए अस्वीकार्य है।

न्यायपालिका की सुरक्षा—प्राथमिकता या परिधि में?

प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए एसपीजी और राष्ट्रपति भवन की स्पेशल फोर्स जैसी एजेंसियां हर समय सक्रिय रहती हैं। लेकिन न्यायपालिका, जो जनता के अधिकारों और संविधान की संरक्षक है, उसकी सुरक्षा अपेक्षाकृत कम प्राथमिकता में दिखती है।
यह विडंबना है कि जिस संस्था के फैसले से देश के प्रधानमंत्री तक को जवाब देना पड़ सकता है, उसी संस्था की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

न्यायपालिका को न केवल शारीरिक सुरक्षा की जरूरत है बल्कि उसकी संवैधानिक गरिमा की भी रक्षा आवश्यक है। किसी न्यायाधीश पर हमला केवल व्यक्ति पर हमला नहीं बल्कि संविधान की आत्मा पर प्रहार है।

न्यायालय परिसर — सुरक्षा की बजाय भीड़ और अव्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट या किसी भी उच्च न्यायालय के परिसर में प्रतिदिन हजारों लोग प्रवेश करते हैं — वकील, वादकारी, पुलिसकर्मी, मीडिया प्रतिनिधि और कर्मचारी। इतनी भीड़ के बीच सुरक्षा जांच को पूर्णतः चाक-चौबंद बनाए रखना चुनौतीपूर्ण है। परंतु यह तर्क उस दिन अस्वीकार्य हो जाता है जब मुख्य न्यायाधीश जैसे संवेदनशील व्यक्ति के जीवन पर खतरा उत्पन्न हो जाए।

इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अदालत परिसर की सुरक्षा अब पुनः मूल्यांकन की मांग करती है। सुरक्षा जांच सिर्फ गेट पर नहीं, बल्कि डिजिटल पहचान, एआई निगरानी और प्रवेश नियंत्रण जैसी आधुनिक प्रणालियों के जरिये होनी चाहिए।

लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ असुरक्षित क्यों?

विधायिका और कार्यपालिका की सुरक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, पर न्यायपालिका की सुरक्षा व्यवस्था आज भी दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों के सामान्य प्रोटोकॉल पर टिकी है। क्या यह संकेत नहीं देता कि हमारी व्यवस्था न्यायपालिका को बराबरी का महत्व नहीं देती?

यदि कोई व्यक्ति आसानी से अदालत के भीतर पहुंचकर मुख्य न्यायाधीश तक खतरा पैदा कर सकता है, तो यह केवल व्यक्ति की सुरक्षा का नहीं बल्कि लोकतंत्र की सुरक्षा का भी प्रश्न है।

समय आत्ममंथन का

यह समय केवल दोषारोपण का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का है। सुप्रीम कोर्ट की सुरक्षा किसी व्यक्तिगत सुविधा का नहीं, बल्कि न्यायिक व्यवस्था की गरिमा का प्रश्न है। सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को यह स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, और उनमें से किसी एक की सुरक्षा की उपेक्षा पूरे लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर कर सकती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!