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मुद्दा जातीय गणना का : बिहार के बाद कर्णाटक और रोहिणी आयोग का पिटारा

जयसिंह रावत

बिहार की नितीश सरकार द्वारा पिछड़ी जातियों की गणना रिपोर्ट जारी किये जाने के बाद अब कर्नाटक की कांग्रेस सरकार पर 2015 की जातीय गणना की रिपोर्ट जारी करने पर दबाव पड़ना स्वाभाविक ही है। अन्यथा कांग्रेस पर ठीक लोकसभा चुनाव से पहले करनी और कथनी के भेद का आरोप इसलिये लगेगा, क्योंकि वह संसद से लेकर सड़क तक पिछड़ी जातियों की गणना की मांग कर रही है। इसके साथ ही भारत सरकार पर भी 2013 की सामाजिक और आर्थिक आधार पर की गयी जातीय गणना के नतीजे सार्वजनिक करने के लिये दबाव बढ़ रहाहै। चूंकि राजनीतिक दृष्टि से यह मामला भाजपा के हिन्दू कार्ड से कम असरदार नहीं है इसीलिये विपक्ष ने इसे आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ इस्तेमाल करने की ठान ली है और जो काफी असरदार भी हो सकता है। इसलिये भाजपा विपक्ष के इस हथियार की काट अवश्य ही ढूंढेगी और फिलहाल इसके लिये रोहिणी आयोग की रिपोर्ट उसकी अपनी ही जेब में पड़ी है।

ताजा जातीय गणना के अनुसार बिहार में अति पिछड़ी और पिछड़ी जातियों ( ओबीसी) की आबादी 63.13 प्रतिशत बतायी गयी है। मंडल कमीशन ने देश में पिछड़ी जातियों की आबादी 52 प्रतिशत मानी थी और उसी के आधार पर केंद्र सरकार की नौकरियों और उच्च शिक्षा में 27 फीसदी आरक्षण दिया जाता है। एक और अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 40 प्रतिशत से ज्यादा ओबीसी मतदाता हैं और चुनाव से पहले कोई भी पार्टी वोटों के सबसे बड़े ब्लॉक को छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकती है। भाजपा के लिये ओबीसी वोट बैंक कितना जरूरी है यह पिछले चुनावी नतीजों पर नजर डालने से साफ हो जाता है। वर्ष 2019 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने ओबीसी मतदाताओं के बीच बड़े पैमाने पर अपनी पैठ बनाकर क्षेत्रीय दलों के वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई थी। इस चुनाव में क्षेत्रीय दलों का ओबीसी वोटों में शेयर कम होकर 26.4 प्रतिशत रह गया, वहीं भारतीय जनता पार्टी ने बड़ी बढ़त हासिल करते हुए 44 फीसदी ओबीसी वोट हासिल किये थे। इसलिये भाजपा हर हाल में आबीसी के अपने इस वोट बैंक को बचाने के लिये प्रयास करेगी। इसलिये संभव है कि मोदी सरकार रोहिणी आयोग की कुछ संस्तुतियों को लागू करने की घोषणा कर विपक्ष पिछड़ी जातियों के चुनावी हथियार को कंुद करने का प्रयास करेगी।

दरअसल राहिणी आयोग का गठन ही भाजपा के ओबीसी वोट बैंक का सुरक्षित करने के लिये 2 अक्टूबर 2017 को किया गया था जिसने 13 विस्तारों के बाद अपनी रिपोर्ट 31 जुलाइ 2023 को राष्ट्रपति को सोंप दी थी। आयोग को जो जिम्मेदारी मिली थी उसमें ओबीसी के अंदर अलग-अलग जातियों और समुदायों को आरक्षण का लाभ कितने असमान तरीके से मिल रहा है, इसकी जांच करना और ओबीसी को सरकारी लाभ के बंटवारे के लिए तरीका, आधार और मानदंड तय करने के साथ ही ओबीसी के उपवर्गों में बांटने के लिए उनकी पहचान करना था। रोहिणी आयोग के गठन के पीछे तर्क यह था कि देश का एक बड़ा वर्ग ओबीसी का है जिसके अंदर हजारों जातियां हैं। ये हजारों जातियां भी सामाजिक विकास के क्रम में अलग-अलग स्थान पर हैं.। इनमें कुछ काफी आगे आ गयी तो कुछ पिछड़ी ही रह गयीं। केंद्र सरकार की ओबीसी लिस्ट में भी 3000 जातियां हैं। इनमें से कुछ जातियां ऐसी भी हैं जो आरक्षण के प्रावधानों का बेहतर उपयोग कर रही हैं। जबकि कुछ ऐसी जातियां हैं जो जरूरतमंद होने के बाद भी आरक्षण के लाभ से वंचित रह जाती हैं।

बिहार सरकार द्वारा जातीय गणना के नतीजे सार्वजनिक किये जाने के बाद अब कर्नाटक की सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार की बारी है। कर्नाटक में एच. कंथाराज के नेतृत्व में आयोग ने 2015-16 में सर्वेक्षण किया गया था। सिद्धारमैया पर सबसे अधिक अपनी ही पार्टी का दबाव होगा। कर्नाटक में दो प्रमुख जातीय समुह लिंगायत – वीरशैव और वोक्कालिंगा हैं, जिनकी जनसंख्या क्रमशः 14 और 11 प्रतिशत बतायी जाती है। लेकिन ये दोनों ही जातीय गणना के विरोध में हैं। अगर कर्नाटक ने भी आंकड़े सार्वजनिक कर दिये तो फिर मोदी सरकार पर भी दबाव बढ़ेगा। यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार ने लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे ओबीसी नेताओं के दबाव में 2011 में ‘‘सोसियो-इकनॉमिक कास्ट सेंसस’’ कराने का फैसला लिया था। यह गणना 2013 में पूरी भी हो गई थी। इसके जरिये जुटाए गए डाटा के आधार पर एक फाइनल रिपोर्ट तैयार होनी थी, मगर 2014 में सरकार बदल गयी। चूंकि भाजपा सरकार अपना हिन्दू वोट बैंक जातियों के आधार पर बिखरना नहीं देना चाहती इसलिये मनमोहन सरकार की गणना ठंडे बस्ते में डाल दी गयी।

कोई भी इंशान जाति या धर्म का टैग लगा कर पैदा नहीं होता है। प्राचीन काल में भी जातियां कर्म के अनुसार तय होती थी। सनातन धर्मावलम्बियों के अनुसार मानव जाति के पहले संविधान और धर्मशास्त्र ‘‘मनुस्मृति’’ में मनुष्यों के जिन चार वर्णाे का उल्लेख है उनका वर्गीकरण उनके कर्म के आधार पर किया गया है। (हालांकि लोग विभेदकारी उस मनुवादी वर्ण व्यवस्था की मुखालफत करने लगे हैं) चूंकि पैतृक व्यवसाय अपनाना भी एक परम्परा रही है और उसके लिये लोगों को वैसे ही दीक्षा और संस्कार पीढ़ी दर पीढ़ी मिलते रहे हैं, इसलिये पुश्तैनी व्यवसाय पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहे। अब व्यवसाय में बदलाव तो आ रहा है मगर पुरखों से बिरासत में मिली जातियां पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं। चूंकि तब समाज और राजे महाराजाओं की शासन व्यवस्था जातियों के आधार पर चलती थी। हालांकि आज भी कुछ लोग जाति के आधार पर स्केवंेजिंग के जैसे कार्य कर रहे हैं अन्यथा जातियों के आधार पर कर्म का निर्धारण का प्राचीन सिद्धान्त लगभग निरर्थक हो चुका है। यह सही है कि समाज में बहुत सारे मानव समूह जिन्हें आप जातियां या उप जातियां कह सकते हैं, अब भी संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र का नागरिक होने का फल नहीं चख पा रही हैं।

जातीय गणना से जुड़े सामाजिक बदलाव वाले दूसरे पहलू पर भी चर्चा की जानी चाहिये जो कि नहीं हो रही है। जिस 1931 की अंतिम जातीय गणना का बार-बार उल्लेख हो रहा है उसमें स्वयं इस तरह की गणना की सटीकता और प्रासंगिकता पर सवाल उठाये गये हैं। शायद इसीलिये 1931 के बाद अंग्रेजों ने भी जातीय गणना कराने की जरूरत नहीं समझी। जॉन हेनरी हट्टन के नेतृत्व में कराई गयी उस जनगणना रिपोर्ट के वाल्यूम-एक भाग-एक के पैरा 182 से आगे जातीय गणना पर कई संशय उठाये गये हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ प्रदेशों में एक जाति स्वयं को ब्राह्मण दर्ज कराती है तो दूसरे राज्य में उसी नाम की जाति स्वयं का राजपूत बताती है। यही नहीं 1921 की जनगणना में कुछ जातियों ने स्वयं को राजपूत बताया था लेकिन 1931 में उन्होंने स्वयं को ब्राह्मण दर्ज कराया है।

 

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