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दलितों के मसीहा, सर्व समाज के हितैषी और प्रमुख स्वाधीनता सेनानी थे जयानंद भारती

-अनंत आकाश
आज 17 अक्टूबर 023 हमारे प्रदेश के एक जुझारू, समाजसेवी, जन नायक की “जयानंद भारती” की जयन्ती है । न्याय, इंसानियत और शोषणमुक्त समाज के लिए लड़ने वाले भारती जी के संघर्ष एवं बलिदान के सन्दर्भ में वर्तमान समाज को जानना आवश्यक है । भारती जी पहाड़ी समाज के लिए डा० अम्बेडकर जैसे ही थे , जो दलितों के मसीहा होने के साथ ही सर्वसमाज के महान हितैषी और उत्तराखंड के प्रमुख स्वाधीनता सेनानी भी थे।
श्री जयानन्द भारती का जन्म 17 अक्टूबर 1881 को  पौडी जिले के अरकण्डई ग्राम में हुआ था। उनके पिता श्री छवि लाल अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए खेती के साथ-साथ जागरी का काम भी करते थे। उन्हें जैबी के नाम से भी जाना जाता था। अपने पिता के साथ रहकर उन्होंने जागरी वृत्ति में भी महारत हासिल कर ली। 1912 में उन्होंने घर छोड़ दिया और नैनीताल और मसूरी में होटलों में काम किया। वह  गढ़वाल के आर्य समाजी श्री टीकाराम से प्रभावित हुए और स्वयं आर्य समाजी बन गये। उन्होंने आर्य समाज के माध्यम से अस्पृश्यता मुक्ति के लिए काम किया।
सन् 1914 से 1920 तक वे अंग्रेजी सैना में रहते हुए फ्रांस और जर्मन गये  । सेवानिवृत होने के बाद वे आर्यसमाज के पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में कार्य करते हुए उत्तराखंड में सामाजिक जागृति के लिए कार्य करने लगे. वैचारिक दासता और सामाजिक कुरीतियों से जकड़े हमारे पर्वतीय समाज से उन्हें अनेकों बार अपमानित होना पडा़ किन्तु वह निराश नहीं हुऐ ,अपनी दृढ़ संकल्पता के चलते  वह  मैदान में डटे रहे ।
उन्होंने गढ़वाल में सन् 1923 से सामाजिक समानता के लिए तकरीबन 20 वर्षों तक  डोला-पालकी आंदोलन का नेतृत्व   किया । उन दिनों शिल्पकार परिवार की बारात में डोला-पालकी का प्रयोग करना वर्जित था. जयानन्द भारती  ने जब इस कुप्रथा का सार्वजनिक विरोध किया तो सवर्ण समाज ने उन्हें तरह तरह से प्रताड़ित किया।
जयानन्द भारती ने कुप्रथा के बारे  में  महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, मदन मोहन मालवीय सहित अनेक बड़े नेताओ को बताया । उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सर्वणों की इस ज्यादती के खिलाफ मुकदमा दायर किया ।  निर्णय भारतीय के पक्ष में आने के बाद सरकारी कानून के माध्यम से शिल्पकारों के लिए वर्जित डोला-पालकी प्रथा का अंत हुआ था ।
देश की स्वाधीनता लड़ाई में जयानन्द भारतीय की सक्रियता हमेशा बनी रही ।  जयानंद भारती स्वतंत्रता के संघर्ष में वे अनेकों बार जेल गए।  28 अगस्त, 1930 को राजकीय विद्यालय, जहरीखाल में तिरंगा झंडा फहराकर उन्होने आजादी के लिए विद्यार्थियों को प्रेरित किया था । तीन माह के कारावास से रिहा होकर वह  फिर इन गतिविधियों में शामिल होते रहे ।1 फरवरी, 1932 को दुगड्डा में प्रतिबन्ध के बावजूद जनसभा करने के जुर्म में उन्हें  6 माह का कारावास हुआ । कोटद्वार में 11 अक्टूबर, 1940 को सैनिक टुकड़ी के सम्मुख सत्याग्रह करने के आरोप में उन्हें चार माह कारावास की सजा हुई । भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लेने के कारण 22 अप्रैल, 1943 को भारतीय जी को दो वर्ष का कठोर कारावास हुआ तथा बरेली जेल में रहते उन्होंने सजा के साथ ही  काफी अध्ययन किया ।
देश की आजादी के बाद जयानन्द भारतीय ने  अपने को पूर्णतः समाजसेवा के कार्यों के  लिये समर्पित किया । उनके संघर्षों कै परिणामस्वरूप अनेक स्थानों में धर्मशाला, अस्पताल और विद्यालयों की स्थापना हुई ।  सामाजिक सक्रियता और अनियमित जीवनचर्या के कारण वह  अपने स्वास्थ्य  पर समुचित ध्यान नहीं दे पाये,जीवन के अतिंम समय पैतृक गांव अरकंड़ाई में व्यतित रहने का फैसला लिया । अपनी जन्म स्थली में ही‌ 9 सितम्बर, 1952 को 71 वर्ष की आयु में  वह इस दुनिया से चल बसे।
उत्तराखंडी समाज के लिए जयानन्द भारतीय का योगदान एक समाज सुधारक, आर्यसमाज के प्रचारक, स्वतन्त्रता संग्रामी और सामाजिक अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले जुझारू व्यक्तित्व के रूप में हमेशा याद किया जाता रहेगा !उत्तराखंड के राजनेताओं, सरकारों यहां तक कि आमजन ने जयानन्द भारतीय जैसे अनेकों महान विभूतियों और उनके अमूल्य सामाजिक योगदान को भुला दिया है ,जो कि किसी भी सभ्य समाज कै लिये शुभ संकेत नहीं है ।   आज उत्तराखंडी जिस मुकाम पर हैं  ,उसके लिये जयानन्द भारतीय ,बीर चन्द्र सिंह गढवाली ,शहीद श्रीदेव सुमन ,नागेन्द्र सकलानी ,भोलूभरदारी ,गौरादेवी ,तिलू रोतैली ,शहीद केसरीचन्द,देश‌ की सीमाओं पर शहीद हुऐ सैनिकों ,राज्य आन्दोलन में शहीद हुऐ आन्दोलनकारियों तथा जनता लडाई में  अपने सम्पूर्ण जीवन लगा चुके लोगों का योगदान को नहीं भुलाया जा सकता ।

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